अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 77
इस तरह से प्रातःकाल का वर्णन करने के बहाने चतुर्थाङ्क के प्रारम्भ में “अपि च” निपातों से जुड़ी चार श्लोकों वाली जो शृङ्खला मिल रही है उसका तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से शाकुन्तल की पाठपरम्परा में जो विचलन हुआ है उसका पौर्वापर्य निर्धारित किया जा सकता है। यह एक स्थान ऐसा पहली बार ध्यान में आ रहा है जिसके सहारे हम शाकुन्तल के मौलिक पाठ के विचलन के क्रम को समझ सकते हैं।
4-1-2 बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थाङ्क के पाठ में एक स्थान द्रष्टव्य हैः शकुन्तला की बिदाई के समय आश्रमस्थित सभी पेड़-पौधे और पशु-पक्षी आदि संतप्त हैं। यहाँ पर अनसूया कहती है कि इस आश्रम में ऐसा कोई नहीं है जो तेरे विरह से दुःखी न हो। देख यह चक्रवाक की स्थिति ..... इत्यादि। उसकी मूल प्राकृत उक्ति इस तरह की है “सहि, ण णो अस्समपदे अत्थि को वि चित्तवन्तो जो तए विरहीअन्तो अज्ज ण ऊसुओ ण किदो। पेक्ख,
पुड्डुंणिवत्तन्तरिदं वाहरिदो णाणुवाहरेइ पिअं।
मुहउव्वूढमृणालो तइ दिट्ठिं देइ चक्काओ॥ 4-18
(सखि, न नः आश्रमपदे अस्ति कोऽपि चित्तवान् यः त्वया विरह्यमाणः अद्य न उत्सुकः कृतः। प्रेक्षस्व-पुटकिनीपत्रान्तरिताम् व्याहतः नानुव्याहरति प्रियाम्। मुखोद्ध्यूढमृणालः त्वयि दृष्टिं ददाति चक्रवाकः।)
बंगाली पाठ में अनसूया के मुख में रखी चक्रवाक-सम्बद्ध यह एक ही उक्ति मिलती है। दूसरी ओर देवनागरी में इस सन्दर्भ में शकुन्तला एवं अनसूया के द्वारा बोली गयी दो उक्तियाँ मिलती हैं जो निम्न स्वरूप में हैं, यहाँ शकुन्तला की उक्ति से आरम्भ हो रहा हैः
शकुन्तला—हला, पश्य, नलिनीपत्रान्तरितमपि सहचरम् अपश्यन्त्यातुरा चक्रवाक्यारौति, दुष्करमहं करोमीति।
अनसूया—सखि, मा मैवम् मन्त्रय।
एसा वि पिएण विणा गमेइ रअणिं विसाअदीहअरं।
गरुअं पि विरहदुक्खं आसाबन्धो सहावेदि॥
(एषापि प्रियेण विना गमयति रजनीं विषाददीर्घतराम्।
गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्धः साहयति।।)
किन्तु इन दोनों में मूल पाठ्यांश में संक्षेप किया ही गया है। इसकी जानकारी हम जब काश्मीरी वाचना का पाठ देखते हैं तब मिलती है, क्योंकि उसमें तीनों उक्तियों वाला अखण्ड पाठ सुरक्षित रहा है, जो निम्नोक्त हैः
अनसूया—सहि, ण सो अस्समपदे अत्थि को वि चित्तवन्तो जो तए विरहअन्तीए ण उस्सुओ किदो अज्ज। पेक्ख दाव,