अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें78 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
पुड्डणिवत्तन्तरिदं वाहरिदो णाणुवाहरेइ पिअं।
मुहउव्वूढमृणालो तइ दिट्टिं देइ चक्काओ।।4-18
(सखि, न सः आश्रमपदे अस्ति कोऽपि चित्तवान् यः त्वया विरह्यमाणया न उत्सुकः कृतः अद्य। पश्य तावत्-पद्मिनीपत्रान्तरिताम् व्याहतः नानुव्याहरति प्रियाम्। मुखोढूढमृणालः त्वयि दृष्टिं ददाति चक्रवाकः।।)।
शकुन्तला- (जनान्तिकम्) हला पेक्ख, नलिनीपत्तन्तरिदंपि सहअरं अदेक्खन्ती आदुरं चक्कवाई आरडइ। दुक्करं खु अहं करेमिति। (हला, पश्य, नलिनीपत्रान्तरितमपि सहचरम् अपश्यन्त्यातुरा चक्रवाक्याटति, दुष्करं खलु अहं करोमीति।)
प्रियंवदा- सहि, मा एव्वं मन्तेहि। (सखि, मा मैवम् मन्त्रय।)
एस वि पिएण विणा गमेइ रअणिं विसूरणादीहं।
गरुअं पि विरहदुक्खं आसाबन्धः सहावेदि।।
(एषापि प्रियेण विना गमयति रजनीं विसूरणादीर्घाम्।
गुर्वपि विरहदुःखम् आशाबन्धः साहयति।।)
इस तरह चक्रवाकी से सम्बद्ध तीनों उक्तियाँ काश्मीरी में सुरक्षित रही हैं। तथा मैथिली वाचना में भी ये तीनों सुरक्षित रही हैं, और हम तक पहुँची भी हैं$^{51}$ जिसका उल्लेख डॉ० बेलवलकरजी ने नहीं किया है।$^{52}$ यद्यपि चक्रवाक की उक्तियों में कटौती हुई है इसकी ओर सबसे पहले ध्यान आकृष्ट करनेवाले मूर्धन्य विद्वान् एस. के. बेलवलकर जी ही थे। (निसर्ग कन्या शकुन्तला, 1962 (वि. सं. 2019) उन्होंने शकुन्तला की एक “निसर्ग कन्या” के रूप में पहचान प्रस्थापित करके ऐसी अपेक्षा व्यक्त की है कि शकुन्तला जब पतिगृह की ओर प्रस्थान कर रही है तब भले ही सहेलियों ने एवं पिता कण्व ने दुर्वासा के शाप की जानकारी शकुन्तला को न दी हो, किन्तु प्रकृति-समस्त में से किसी वनस्पति ने या पशु-पक्षी ने क्यों शकुन्तला को इस शाप के सन्दर्भ में सावधान नहीं किया? यही एक बड़ी समस्या है। ऐसा कुछ होना न केवल अपेक्षित था, अनिवार्य भी था। काश्मीरी वाचना में, चक्रवाकवाले प्रसंग में यह आकारित किया गया है। किन्तु दुर्भाग्य से बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में कुल तीन उक्तियों में से एक एवं दो उक्तियाँ ही हम तक संचरित हो कर आई हैं। यदि काश्मीरी वाचना की (तथा मैथिली वाचना की) पाण्डुलिपियाँ प्राप्त करके देखा जाय तो तीनों उक्तियों वाला पूर्ण संवाद, जो उपर्युक्त अवतरण में दिया गया है
- द्रष्टव्य-मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा से प्रकाशित श्रीरमानाथ झा द्वारा संपादित-अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ. 75
- लेकिन चक्रवाक सम्बन्धी जो तीन उक्तियाँ काश्मीरी में होने के साथ साथ मैथिली में भी मिल रही हैं वह इसी बात का साक्ष्य दे रहा है कि शाकुन्तल की उपलब्ध पाठ परम्परा काश्मीरी वाचना में से पहले मैथिली वाचना में गयी होगी और तदनन्तर ही वह पाठ बंगाली में गया होगा।