भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 262 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

अभिज्ञानशकुन्तलम्      प्रस्तावना      79


वह हम तक संचरित होकर आया ही है। चक्रवाक के इस प्रसंग में (तीनों संवादों के द्वारा) शकुन्तला को दुष्यन्त की ओर से नकारात्मक प्रतिभाव ही मिलेगा और शकुन्तला को कुछ कालावधि तक पुनर्मिलन की प्रतीक्षा करनी होगी ऐसा व्यंजित किया गया है।

श्री बेलवलकरजी के शब्दों में देखें तो—“यहाँ पर पूरी घटना शकुन्तला को यह समझाने के लिए लायी गयी है कि आगे तुम्हारे भाग्य में क्या बदा है। चकवी पुकारती है किन्तु चक्रवाक उत्तर नहीं देता, क्योंकि उत्तर न देने के कारणों पर उसका कोई वश नहीं है, उसका हृदय शकुन्तला के वियोग से भरा हुआ है। इसी प्रकार शीघ्र ही शकुन्तला भी पुकारेगी और दुष्यन्त भी उसका उत्तर नहीं देगा। अनसूया अपनी सखी को सान्त्वना देती है और वह विश्वास के साथ सान्त्वना दे भी सकती थी क्योंकि उसके हाथ में शाप का अन्त करानेवाली अँगुठी तो थी ही। इसीलिए ठीक इस घटना से अगले संवाद में ये सखियाँ शकुन्तला को अँगूठी का स्मरण करा देती हैं। दूसरी दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कण्व ने अपने जिस शोक को प्रकट नहीं होने दिया उसी को चक्रवाक ने एक प्रकार के दैवी परिज्ञान से समझकर शकुन्तला को भावी विपत्ति और दुःख की चेतावनी दे दी।$^{53}$” इस उच्च स्तरीय पाठालोचना से यह सुदृढ हो जाता है कि बंगाली वाचना में और देवनागरी वाचना में संचरित होकर जो पाठ हम तक पहुँचा है वह प्रकृत सन्दर्भ में संक्षिप्त किया गया पाठ है।

4-1-3 बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थांक के पाठ में दूसरे स्थान पर एक श्लोक का जो संक्षेप मिलता है वह इस तरह का हैः-शकुन्तला पतिगृह की ओर प्रस्थान कर रही है तब (बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थांक के पाठ में) इस तरह का संवाद हैः शकुन्तला कण्व से पूछती है कि मैं पति के घर जा रही हूँ, लेकिन पिताजी आपका विरह कैसे सह पाऊँगी? तब पिता कण्व श्लोक 4-22 से उत्तर देते हैं कि कुलीन व्यक्ति के घर में गृहिणी पद प्राप्त होने के बाद तू बहुविध कार्यकलाप में व्यस्त हो जायेगी और तेरे अङ्क में पुत्र का आगमन हो जाने के बाद तो सुख ही सुख होने से तू मेरे विरह से उत्पन्न होनेवाले दुःख को भूल जायेगी। इतना सुनने के बाद शकुन्तला पिता के चरणों में प्रणाम करती है (ऐसी रंगसूचना है)। अर्थात् बंगाली में कण्वमुनि एक ही श्लोक बोलते हैं। किन्तु इस सन्दर्भ का काश्मीरी एवं मैथिली पाठ निम्नोक्त है, जिसमें कण्व दो श्लोक बोलते हैं:

शकुन्तला—कधं तादस्स अङ्कादो परिब्भट्ठा मलअपव्वदुम्मूलिदा विअ चन्दणलदा देसन्तरे जीविदं धारइस्सं। (इति रोदिति) (कथं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टा मलयपवनोन्मूलिता इव चन्दनलता देशान्तरे जीवितं धारयिष्ये।)


  1. निसर्ग कन्या शकुन्तला-शीर्षकवाला आलेख, जो कालिदास-ग्रन्थावली (तीसरा खण्ड, समीक्षा निबन्ध, पृ. 59 से 70), अनुवादक-सीताराम चतुर्वेदी ने अलीगढ से 1962 में प्रकाशित किया है वह बार बार द्रष्टव्य है।