अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें80 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
कण्वः- वत्से, किमेवं कातरासि।
अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजं न त्वं वत्से शुचं गणयिष्यसि।। 4-22
अपि च, इदमवधारय
यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वमेकान्तत एव भावि।
आहार्ययोगेन वियुज्यमानः परेण को नाम भवेद् विषादी।। 4-23
शकुन्तला- (पितुः पादयोः पतित्वा) ताद वन्दामि।
यहाँ श्लोक 22 के नीचे, “अपि च” निपात से बाँधा गया एक श्लोक-23 दिख रहा है, जो केवल काश्मीरी एवं मैथिली वाचना के पाठ में ही उपलब्ध होता है। बंगाली, देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं में वह नहीं मिलता है। डॉ० एस. के. बेलवलकरजी के द्वारा सम्पादित अभिज्ञानशाकुन्तल में भी वह श्लोक नहीं मिलता है, किन्तु ऑक्सफर्ड लाईब्रेरी में सुरक्षित दो शारदा पाण्डुलिपियों में यह श्लोक “अपि च” निपात से अवतारित किया गया है। अतः विचारणीय है कि क्या दूसरा श्लोक “अपि च” के विनियोग से काश्मीरी-मैथिली में प्रक्षिप्त किया गया होगा या फिर मौलिक होते हुए भी बंगाली, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से उसे हटाया गया है? यहाँ पूर्वधारणा के रूप में मान लिया जाय कि मूल पाठ में पहलेवाला एक ही श्लोक रचा गया था। अब, पहले श्लोक 22 में शकुन्तला को पिता की याद नहीं आयेगी उसके लिए बहुत प्रीतिकारक कारण पेश किये गये हैं। फिर भी यह चिन्त्य तो है ही कि पुत्री को ससुराल में कितना भी सुख मिल जाय तो भी क्या वह अपने पिता को भुला सकती है? सब का अनुभवजन्य उत्तर यही है कि ढेर सारे सुख में भी पुत्री अपने पिता को कदापि नहीं भुला सकती है। अतः प्रश्न होगा ही कि क्रान्तद्रष्टा महाकवि ने यहाँ सर्वजनानुभव-विरुद्ध क्यों लिखा है? क्या सचमुच में शकुन्तला सुखातिशय में भी पिता कण्व को भुला देगी? वृद्ध पिता की कोई चिन्ता उसे नहीं सताती रहेगी? इस प्रश्न का एक ही उत्तर सभी रसिकों के मन में होगा कि शकुन्तला अपने पिता को हरगिज नहीं भूल सकती है। यह बात कण्व भी जानते होंगे, अतः यहाँ उनको कुछ अधिक कहने की आवश्यकता होगी। यदि मूल पाठ में पहलेवाला एक ही श्लोक था ऐसी पूर्वधारणा को छोड़कर, काश्मीरी और मैथिली वाचना में आया हुआ दूसरा श्लोक भी मूल में होगा ऐसा स्वीकारते हैं तो उपर्युक्त क्षति का विसर्जन होता है।
प्रस्तुत चर्चा में पहले कहा गया है कि इस नाट्यकृति में एक श्लोक के बाद “अपि च” से अवतारित दूसरे श्लोक में प्रवर्तमान दृश्य या विचार का दूसरा पहलू रखा जाता है।