अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् \qquad प्रस्तावना \qquad 81
ऐसा होना अनिवार्य है, क्योंकि समुच्चयार्थक “अपि च” का प्रयोग तभी हो सकता है जब प्रस्तुत विचार का दूसरा पहलू भी सम्मिलित करना हो। इस दृष्टि से सोचा जायेगा तो पहले श्लोक में शकुन्तला को ससुराल में सुख मिलने पर वह पिता को भूल जायेगी ऐसा कहा जाता है। तत्पश्चात् दूसरे ही श्लोक में कहा जाता है कि इन ऐहिक सुखों के बीच में भी शकुन्तला के हृदयाकाश में पिता के वार्धक्य को लेकर सदैव चिन्ता विद्यमान रहनेवाली है तो उसका निरसन करने के लिए क्रान्तद्रष्टा कालिदास ने ऋषि कण्व से निम्नोक्त दूसरा श्लोक कहलाया है:
अपि चेदमवधारय
यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वमेकान्तत एव भावि।
आहार्ययोगेन वियुज्यमानः परेण को नाम भवेद् विषादी।। 4-23
शकुन्तला—ताद वन्दामि। (पितुः पादयोः पतति।)
अर्थात् कण्व ने शकुन्तला को आश्वासन देते हुए “अपि च” से अवतारित 23 वें श्लोक से यह भी कह दिया है कि शरीर और शरीरी का पृथक्त्व अवश्यंभावी है। जैसे कोई नट अपने पहने हुए मुकुटादि आहार्य चीजों का त्याग करते समय दुःखी नहीं होता, (वैसे ही कल कण्वमुनि के देहावसान की खबर मिले तो भी शकुन्तला को दुःखी नहीं होना चाहिए)। यहाँ “अपि च” के प्रयोग का याथार्थ्य पूर्ण रूप से सिद्ध होता है। कण्व ने अपनी पुत्री को दो बातें कह कर उसे दोनों दृष्टियों से स्वस्थ मनःस्थितिवाली बनाया है। एक तो ससुराल में निरतिशय सुख एवं नयी जिम्मेवारियों को लेकर पिता की याद नहीं आयेगी, और दूसरा पिता का शरीर आहार्य चीज रूप है, जो एक दिन नष्ट होनेवाला है तो उसकी चिन्ता करना जरूरी नहीं है। आश्रम में पली ऋषिकन्या के लिए आरण्यक पिता का यह औपनिषदिक दर्शन इस स्थान पर एकदम सुसंगत प्रतीत होता है। और इस दृष्टि से देखा जायेगा तो “अपि च” का विनियोग भी समुच्चयार्थक के रूप में यहाँ सर्वथा चरितार्थ हो रहा है। अतः काश्मीरी और मैथिली वाचना में दृश्यमान यह दूसरा श्लोक मौलिक होने में संदेह नहीं रहता है।
उपर्युक्त दो श्लोकोंवाला काश्मीरी पाठ जो पहले मैथिली पाठ में संक्रान्त हुआ होगा वह वहाँ पर सुरक्षित रहा है। लेकिन तीसरे स्तर पर बंगाली एवं देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में से, “अपि च” से अवतारित दूसरा श्लोक हटाया गया होगा। इस प्रकार के संक्षिप्तीकरण से चतुर्थाङ्क का एक विशेष सौन्दर्य, जो दार्शनिक पिता के वचनों में से झलक रहा है उससे हम वंचित रह जाते हैं। कालिदास ने अपने अन्य काव्यों में भी औपनिषदिक दर्शन व्यक्त किया है और इस चतुर्थाङ्क में भी शकुन्तला जब पूछती है कि पिताजी इस तपोवन को मैं फिर से कब देख पाऊँगी? तब कण्व मुनि ने कहा है कि उत्तरावस्था में दौष्यन्ति (भरत) के कन्धों पर राज्यधुरा स्थापित करके शान्ति के लिए इस