अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
अभिज्ञानशकुन्तलम् \qquad प्रस्तावना \qquad 81
ऐसा होना अनिवार्य है, क्योंकि समुच्चयार्थक “अपि च” का प्रयोग तभी हो सकता है जब प्रस्तुत विचार का दूसरा पहलू भी सम्मिलित करना हो। इस दृष्टि से सोचा जायेगा तो पहले श्लोक में शकुन्तला को ससुराल में सुख मिलने पर वह पिता को भूल जायेगी ऐसा कहा जाता है। तत्पश्चात् दूसरे ही श्लोक में कहा जाता है कि इन ऐहिक सुखों के बीच में भी शकुन्तला के हृदयाकाश में पिता के वार्धक्य को लेकर सदैव चिन्ता विद्यमान रहनेवाली है तो उसका निरसन करने के लिए क्रान्तद्रष्टा कालिदास ने ऋषि कण्व से निम्नोक्त दूसरा श्लोक कहलाया है:
अपि चेदमवधारय
यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वमेकान्तत एव भावि।
आहार्ययोगेन वियुज्यमानः परेण को नाम भवेद् विषादी।। 4-23
शकुन्तला—ताद वन्दामि। (पितुः पादयोः पतति।)
अर्थात् कण्व ने शकुन्तला को आश्वासन देते हुए “अपि च” से अवतारित 23 वें श्लोक से यह भी कह दिया है कि शरीर और शरीरी का पृथक्त्व अवश्यंभावी है। जैसे कोई नट अपने पहने हुए मुकुटादि आहार्य चीजों का त्याग करते समय दुःखी नहीं होता, (वैसे ही कल कण्वमुनि के देहावसान की खबर मिले तो भी शकुन्तला को दुःखी नहीं होना चाहिए)। यहाँ “अपि च” के प्रयोग का याथार्थ्य पूर्ण रूप से सिद्ध होता है। कण्व ने अपनी पुत्री को दो बातें कह कर उसे दोनों दृष्टियों से स्वस्थ मनःस्थितिवाली बनाया है। एक तो ससुराल में निरतिशय सुख एवं नयी जिम्मेवारियों को लेकर पिता की याद नहीं आयेगी, और दूसरा पिता का शरीर आहार्य चीज रूप है, जो एक दिन नष्ट होनेवाला है तो उसकी चिन्ता करना जरूरी नहीं है। आश्रम में पली ऋषिकन्या के लिए आरण्यक पिता का यह औपनिषदिक दर्शन इस स्थान पर एकदम सुसंगत प्रतीत होता है। और इस दृष्टि से देखा जायेगा तो “अपि च” का विनियोग भी समुच्चयार्थक के रूप में यहाँ सर्वथा चरितार्थ हो रहा है। अतः काश्मीरी और मैथिली वाचना में दृश्यमान यह दूसरा श्लोक मौलिक होने में संदेह नहीं रहता है।
उपर्युक्त दो श्लोकोंवाला काश्मीरी पाठ जो पहले मैथिली पाठ में संक्रान्त हुआ होगा वह वहाँ पर सुरक्षित रहा है। लेकिन तीसरे स्तर पर बंगाली एवं देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में से, “अपि च” से अवतारित दूसरा श्लोक हटाया गया होगा। इस प्रकार के संक्षिप्तीकरण से चतुर्थाङ्क का एक विशेष सौन्दर्य, जो दार्शनिक पिता के वचनों में से झलक रहा है उससे हम वंचित रह जाते हैं। कालिदास ने अपने अन्य काव्यों में भी औपनिषदिक दर्शन व्यक्त किया है और इस चतुर्थाङ्क में भी शकुन्तला जब पूछती है कि पिताजी इस तपोवन को मैं फिर से कब देख पाऊँगी? तब कण्व मुनि ने कहा है कि उत्तरावस्था में दौष्यन्ति (भरत) के कन्धों पर राज्यधुरा स्थापित करके शान्ति के लिए इस
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आश्रम में आना।$^{54}$ यहाँ पर शान्त्यै (शान्ति के लिए) को समझाते हुए टीकाकार चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-मोक्षार्थम्। दुष्यन्त-शकुन्तला जब आप्तकाम हो जाय तब मोक्षार्थ इस आश्रम में वापस आने को कहनेवाला तपस्वी तात कण्व “अपि च” से पूर्वोक्त श्लोक द्वारा पुत्री को शोक न करने का उपदेश दे वह सर्वथा मौलिक प्रतीत होता है। नाटक के अन्तिम भरत-वाक्य में भी कवि ने लिखा है कि “सरस्वती श्रुतिमहती/ श्रुतिमहतां महीयताम्।” इसको देखते हुए भी काश्मीरी वाचना का उपर्युक्त श्लोक मौलिक दिख रहा है एवं मैथिली वाचना को छोड़ कर अन्यत्र (बंगाली, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में) उसको बेशक हटाया गया है।
5-1-0 पञ्चमाङ्क का आरम्भ कहाँ से होता है, इस प्रश्न को लेकर बंगाली पाठ और देवनागरी के पाठ की वस्तुस्थिति का आकलन किया जाय तो (क) बंगाली पाठ में अंक कञ्चुकी की उक्ति से आरम्भ होता है, उसके बाद हंसवती का गीत आता है और तत्पश्चात् शकुन्तला-प्रत्याख्यान निरूपित किया गया है। (ख) देवनागरी पाठ में हंसपदिका के गीत से अंक आरम्भ होता है, द्वितीय क्रम में कञ्चुकी की उक्ति आती है, और तत्पश्चात् शकुन्तला-प्रत्याख्यान रखा गया है। अद्यावधि विद्वत्समूह ने इन दोनों तरह के पाठों की साहित्यिक-आलोचना की है। जैसे, शकुन्तला के प्रत्याख्यान की पार्श्वभूमिका में रखे गये हंसपदिका के गीत से दुष्यन्त के मन में जननान्तर सौहृद झंकृत होने पर पर्याकुल हुई मानसिकता को जिम्मेवार माना जाय या फिर वैतालिकों के गान से कर्तव्यनिष्ठ बनी राजा की मानसिकता को जिम्मेवार माना जाय। इन दोनों स्थितियों में से किसी एक का चयन किया जाय ऐसा कहना तो आसान है लेकिन इस तरह की साहित्यिक आलोचना के द्वारा पाठ की मौलिकता निश्चित नहीं की जा सकती क्योंकि उसमें विवेचक की आत्मलक्षिता सुतराम् प्रविष्ट होती है। यहाँ तो उपलब्ध द्विविध पाठों में से पूर्वापर स्थित वाक्यों की संगति का समीक्षण ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में निर्णायक बन सकता है।
निम्न स्तरीय पाठालोचना के फलस्वरूप हमें पूर्वोक्त दो तरह की पाठपरम्परा ज्ञात हुई है। प्रथम, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनानुसारी योजना में दुष्यन्त को देख कर कञ्चुकी जब बोलता है कि “तथापीदानीमेव धर्मासनाद् उत्थिताय पुनरुपरोधकारि कण्वशिष्यागमनमस्मै नोत्सहे निवेदयितुम्।” तब वह संगतिपूर्ण नहीं लगता है। राजा ने तो धर्मासन से उठ कर संगीतशाला में जाकर हंसपदिका का गीत सुना है। दूसरा, इस तरह की योजना में “रम्याणि वीक्ष्य०” सुनकर जननान्तर सौहृद का अनुभव करने के पश्चात् पर्याकुल स्थिति का अभिनय करते हुए राजा को बहुत देर तक रंगमंच पर खड़े रहना है क्योंकि उसके पीछे आ रही कञ्चुकी की उक्ति अनेक श्लोकों से एवं गद्य संवाद से भरी है। यहाँ बेचैन
- भूत्वा चिराय सदिगन्तमहीसपत्नी, दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं प्रसूय। तत्सन्निवेशितधुरेण सहैव भर्त्रा, शान्त्यै करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन्।। अ.शां. 4-22
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राजा के लिए रंगभूमि पर लम्बी देर तक खड़े रहना मंचन के अनुकूल नहीं है। इसके विपरीत, बंगाली पाठानुसार कञ्चुकी बहुत देर तक राजा को निवेदन करने के लिए योग्य क्षण की प्रतीक्षा में खड़ा रहे तो उस में कोई प्रतिकूलता या अनौचित्य नहीं है। तीसरा, बंगाली पाठ में वैतालिकों के गान को सुनकर दुष्यन्त “एतेन कार्यानुशासनपरिश्रान्ताः पुनर्नवीकृताः स्मः।” ऐसा बोले उसमें पूरा औचित्य दिखता है। किन्तु देवनागरी पाठ में वैतालिकों के गान को सुन कर दुष्यन्त “क्लान्तमनसः पुनर्नवीकृताः स्मः” कहे तो उसमें बिल्कुल औचित्य नहीं है। राजा का मन जननान्तर सौहृद की अज्ञात याद में पर्याकुल है और वैतालिकों ने जो गान किया है उसका प्रतिपाद्य विषय तो राजा की प्रजा सम्बन्धी कार्य करने की संनद्धता है। उपर्युक्त तीन कारणों से बंगाली पाठ की मौलिकता अधिक प्रीतिकर सिद्ध होती है।
5-1-1 बंगाली वाचना के पञ्चमाङ्क में शकुन्तला अपने को परभृता कहने वाले दुष्यन्त को “अनार्य” कहती है और प्रचण्ड कोप करते हुए दुष्यन्त को ताडित करती है। यहाँ पर शकुन्तला की कोपाविष्ट मुखमुद्रा को देखते हुए दुष्यन्त ने दो श्लोकों का उच्चारण किया है:
राजा – (स्वगतम्) वनवासाद् अविभ्रमः पुनरत्रभवत्याः कोपो लक्ष्यते। तथाहि
न तिर्यगवलोकितं, भवति चक्षुरालोहितं
वचोऽपि परुषाक्षरं न च पदेषु संसज्जते।
हिमार्त इव वेपते सकल एष बिम्बाधरः,
स्वभावविनते भ्रुवौ युगपदेव भेदं गते॥ 5-23
अथवा, संदिग्धबुद्धिं माम् अधिगत्वाकैतवच्छायया कोपोऽस्याः। तथाह्यनया–
मय्येव विस्मरणदारुणचित्तवृत्तौ,
वृत्तं रहः प्रणयम् अप्रतिपद्यमाने।
भेदाद् भ्रुवोः कुटिलयोरतिलोहिताक्ष्या
भग्नं शरासनमिवातिरुषा स्मरस्य॥ 5-24
(प्रकाशम्) भद्रे, प्रथितं दुःषन्तचरितम् प्रजासु। नापीदं दृश्यते।
यहाँ देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में केवल दूसरा श्लोक ही संचरित होकर आया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पहलेवाले (5-23) श्लोक को उनमें से हटाया गया है, ऐसा दिखता है। मैथिली वाचना के पाठ में भी यही दो श्लोक मिलते हैं, लेकिन वहाँ दूसरा श्लोक “अथवा” से अवतारित नहीं है। वहाँ “अपि च” निपात से दूसरे श्लोक को बाँधा गया है। अतः दो बातें परीक्षणीय हैं (1) क्या इन दोनों श्लोकों के प्रतिपाद्य विषय को प्रस्तुत करने के लिए यहाँ “अथवा” का प्रयोग उचित है या “अपि च” का प्रयोग सुसंगत
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लगता है? (2) इन दोनों में से कौन सा श्लोक मौलिक होगा अथवा कौन सा प्रक्षिप्त होगा?
कालिदास जिस सन्दर्भ में “अथवा” का विनियोग करते हैं वह बहुशः दुष्यन्त जब निषेधात्मक विचार पहले प्रस्तुत कर देता है वहाँ तुरन्त ही उसी विचार को छोड़ कर कुछ सकारात्मक / आशाजनक विचार को कहना चाहता है तब “अथवा” से उसका अवतार करता है। कोशकार “अथवा” को पक्षान्तर का वाचक कहते हैं। उदाहरण के लिए
शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति च बाहुः कुतः फलमिहास्ति।
अथवा भवितव्यानां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र⁵⁵।। 1-15
इस दृष्टि से देखें तो पञ्चमाङ्क के उपर्युक्त सन्दर्भ में (बंगाली पाठ में) तो “अथवा” का प्रयोग पक्षान्तर को प्रस्तुत करने के लिए नहीं हुआ है। उसी तरह से मैथिली वाचना में इन श्लोकों को “अपि च” से संलग्न किया गया है। किन्तु वहाँ पर भी “अपि च” का प्रयोग समुच्चयार्थक के स्वारस्य को प्रकट नहीं करता है क्योंकि यहाँ दोनों ही श्लोकों में भिन्न भिन्न शब्दों में शकुन्तला की भ्रुकुटि का ही चित्र वर्णित किया गया है, अर्थात् एक ही विचार पुनरुक्त हो रहा है। अतः इतना तो पहले सिद्ध हो ही जाता है कि इन दोनों में से कोई एक श्लोक प्रक्षिप्त होने की पूरी सम्भावना है। अब सोचना है कि इनमें से कौन सा श्लोक प्रक्षिप्त माना जाय? देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में केवल दूसरे श्लोक का ही स्वीकार हुआ है, उसको देखकर कोई कहेगा कि उनकी दृष्टि में वही मौलिक होगा। किन्तु देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में स्वीकार्य होने से वही मौलिक होगा, ऐसा निर्णय देना भी तार्किक नहीं है। इसकी परीक्षा करने के लिए इस प्रसंग का पूर्वापर सन्दर्भ देखना बहुत जरूरी है।
दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्याख्यात करने के लिए “प्राग् अन्तरिक्षगमनात् स्वम् अपत्यजातम् अन्यद्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति।।” (5-22) ऐसा बोल दिया है। इसको सुनते ही शकुन्तला ने दुष्यन्त को “अनार्य” कहकर भारी कोपवचन कहे हैं। जिसको सुनते सुनते दुष्यन्त ने स्वगत उक्ति के रूप में उपर्युक्त दो श्लोक बोले हैं। पहलेवाले श्लोक में दुष्यन्त ने निरीक्षण किया है कि वनवास के कारण शकुन्तला का कोप बिलकुल स्वाभाविक-अविभ्रम-है। उसमें कोई कृत्रिमता, विलासादि हावभाव नहीं थे और उसका अधरोष्ठ वेपमान होने के साथ विनीत भ्रुकुटियाँ भी एकसाथ वक्रता को धारण करती हैं। फिर वह दूसरे श्लोक में पुनरपि कहता है कि उसकी दोनों कुटिल भ्रुकुटियाँ एकदम भग्न होने से ऐसा लगता है कि मानों कामदेव का शरासन भग्न हो गया। इस वर्णन को देख कर
- द्रष्टव्यः रघुवंश में - क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः। तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्। अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः। (सर्गः 1, श्लो. 2, 4)
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अनुमान किया जा सकता है कि दुष्यन्त कितना संवेदना विहीन व्यक्ति है क्योंकि एक ओर शकुन्तला के जीवन पर वज्राघात किया गया है और दूसरी ओर नायक उसकी भ्रुकुटियों का विविध रूप में निरूपण कर रहा है। पहले श्लोक में दुष्यन्त के चित्त में यह प्रतीति उदित हो जाती है कि शकुन्तला का कोप तात्त्विक-अकृत्रिम-ही है। बस प्रस्तुत सन्दर्भ में इतना ही पर्याप्त है, सह्य है। इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन दूसरे श्लोक में दुष्यन्त शकुन्तला की भग्न भृकुटी के लिए जो उपमान का प्रयोग करता है, वह काव्यत्व से मण्डित होते हुए भी पूर्वापर सन्दर्भ में सर्वथा अयुक्तियुक्त है। और यहाँ (दूसरे श्लोक की) पहली दो पङ्क्तियों में दुष्यन्त अपना ही दोष देखने लगा है ऐसा कथन है, जो भी असंगत है। यदि वह इस बात से सहमत है कि मैं विस्मृत चित्तवृत्तिवाला हो गया हूँ और एकान्त में किये प्रणय को नहीं स्वीकारता हूँ तो प्रत्याख्यान करने की मति से उसे विरत हो जाना चाहिए। अतः इस दूसरे श्लोक को ही प्रक्षिप्त मानना होगा। प्रो. शारदारञ्जन राय (1908) ने भी इसी श्लोक को प्रक्षिप्त मानने का अभिप्राय दिया था$^{56}$।
5-1-2 उपर्युक्त दोनों श्लोकों के नीचे शकुन्तला की एक उक्ति बंगाली पाण्डुलिपियों में प्रवर्तमान है जिसमें शकुन्तला ने कहा है कि क्या आप ही केवल प्रमाणज्ञ हैं और आप ही अकेले लोकमान्य धर्मस्थिति को जानते हैं तथा लज्जाशील महिलायें क्या कुछ जानती ही नहीं है:
तुम्हे ज्जेव पमाणं जाणध धम्मत्थिदिञ्ज लोअस्स।
लज्जाविणिज्जिदाओ जाणन्ति ण किं पि महिलाओ।। 5-26अर्थात्-यूयमेव प्रमाणं जानीथ धर्मस्थितिञ्च लोकस्य।
लज्जाविनिर्जिता जानन्ति न खलु किमपि महिलाः।।
यह श्लोक रिचर्ड पिशेल की आवृत्ति में ग्राह्य नहीं बना है। बंगाली वाचना के पाठ पर टीका लिखनेवाले और प्रमाणभूत माने गये टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने इस श्लोक को “पुराणप्रसिद्धा गाथेयम्” कहा है। लेकिन बंगाली पाण्डुलिपियों में यह श्लोक संचरित होता रहा है इस लिए डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने उसे स्वीकारा है। काश्मीरी एवं मैथिली वाचना में भी यह श्लोक संचरित हुआ दिख रहा है। किन्तु इस श्लोक को मौलिक मानना मुश्किल है, क्योंकि यह तो शकुन्तला के व्यक्तित्व का दूसरा ही रूप प्रकट करता है, जो समग्र नाटक में आलिखित शकुन्तला के स्वरूप से भिन्न है तथा प्रत्याख्यान-जनित करुणता के प्रभाव का अपकर्ष करनेवाला सिद्ध होता है। इस लिए इसकी मौलिकता पर प्रश्न चिह्न लगता है।
इन दो श्लोकों के अलावा पञ्चमाङ्क के अन्यान्य श्लोकों की स्वीकृति सभी वाचनाओं में एक समान है।
- द्रष्टव्यः उनका सम्पादित किया गया अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ. 514-515
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5-2-1 देवनागरी पाठपरम्परा में कञ्चुकी की उक्ति का एक श्लोक हटाया गया है जो इस प्रकार है-भोश्चित्रमेतत्।
क्षणात् प्रबोधमायाति लंघ्यते तमसा पुनः।
निर्वांस्यतः प्रदीपस्य शिखेव जरतो मतिः॥5-2
ऐसा संक्षेप करना आवश्यक था क्योंकि देवनागरी पाठ में, राजा पर्याकुल मनःस्थिति में रंग पर कहीं अकेला खड़ा है। उसको ज्यादा समय पर्याकुलता के हावभाव के साथ खड़ा रहना रंगमंच के अनुकूल नहीं है। अतः यह एक श्लोक हटाया गया दिखता है। वस्तुतः बंगाली पाठ में, पञ्चमाङ्क के प्रारम्भ में कञ्चुकी वार्धक्य के कारण बीच बीच में भूल जाता है ऐसा दिखा कर दुष्यन्त की विस्मृति का अभिव्यंजन किया जा रहा है। इसमें नाटकीयता अधिक है। किन्तु देवनागरी पाठ में से कञ्चुकी के इस श्लोक को हटाया गया है।
5-2-2 पञ्चमाङ्क के प्रथम दृश्य के आरम्भिक सोपान को बदलने से बंगाली वाचना में एक वाक्य जो विदूषक के मुख में रखा गया है-भो गोविन्दारक इति भणितस्य ऋषभस्य परिश्रमो नश्यति। उसे देवनागरी पाठ में से हटाया गया है। क्योंकि देवनागरी पाठ में हंसपदिका गीत को प्राथम्य देने से विदूषक को सब से पहले वसुमती के पास भेज दिया गया है। इसके विपरीत, बंगाली पाठ में तो विदूषक वैतालिकों के गान के समय तक वहीं खड़ा था और तत्पश्चात् ही हंसवती का गान शुरू होता है। सूक्ष्म विश्लेषण से मालूम होता है कि देवनागरी के संक्षिप्त किये गये पाठ में विदूषक का स्वरूप भी बदल दिया गया है। बंगाली पाठपरम्परा में विदूषक का जो स्वरूप है, उससे भिन्न स्वरूप देवनागरी पाठपरम्परा में दिख रहा है।
6-1-0 बंगाली वाचना (और मैथिली वाचना) के षष्ठांक में कुल मिला कर 38 श्लोक हैं। किन्तु काश्मीरी, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में सर्वत्र केवल 32 श्लोक संचरित होकर हम तक पहुँचे हैं। अतः पाँच श्लोकों के कम-ज्यादा होने का क्या कारण हो सकता है, यह विचारणीय है। एवमेव, इन दोनों पाठपरम्पराओं में से कहाँ पर मौलिकता झलक रही है वह भी गवेषणीय है।
6-1-1 बंगाली वाचना के षष्ठाङ्क में आरम्भ में ही एक श्लोक का प्रक्षेप है कृशकुन्तला के हाथ से बिछड़ गयी अङ्गूठी राजा को प्राप्त हो जाने के बाद, वह विरहावस्था में कहता है कि एक रन्ध्र हो जाने पर अनर्थों की परम्परा शुरू हो ही जाती है। इस बात का समर्थन करते हुए दुष्यन्त के मुख में निम्नोक्त दो श्लोक रखे गये हैं
मुनिसुताप्रणयस्मृतिरोधिना मम च मुक्तमिदं तमसा मनः।
मनसिजेन सखे प्रहरिष्यता धनुषि चूतशरश्च निवेशितः॥ 6-8
अपि च
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 87
उपहितस्मृतिरङ्गुलिमुद्रया प्रियतमाम् अनिमित्तनिराकृताम्।
अनुशयादनुरोदिमि चोत्सुकः सुरभिमाससुखं समुपस्थितम्।। 6-9
यहाँ पर दोनों श्लोकों को “अपि च” निपात से सम्बद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। अतः सब से पहले उसके विनियोग का पूर्वोक्त स्वारस्य घटित होता है कि नहीं यह देखना होगा। पहले श्लोक में शापमुक्ति के बाद की स्थिति का कथन है, दूसरे में शाप के प्रभाव में क्या अनर्थ हो गया उसका कथन है। एवमेव, पहले श्लोक में आम्रमञ्जरी के बाण का उल्लेख करने के बाद दूसरे श्लोक में सुरभिमास उपस्थित होने का कथन स्पष्टतया व्युत्क्रम ही है। वर्णनीय वस्तु में व्युत्क्रम होने से इसकी मौलिकता संशयग्रस्त होती है। इसमें सूक्ष्म रूप से पुनरुक्ति होने से दोनों श्लोकों के मध्य में “अपि च” निपात का विनियोग भी सही अर्थ में समुच्चयार्थक सिद्ध नहीं होता है। इस दृष्टि से दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त सिद्ध होता है।
बंगाली एवं मैथिली वाचना में इस दूसरे श्लोक का प्रक्षेप करने का क्या कारण हो सकता है, ऐसा प्रश्न यदि किया जाय तो राजा की उक्ति में कहा गया है “वयस्य, रन्ध्रोपनिपातिनोऽनर्था इति यदुच्यते, तदव्यभिचारि।” इस वाक्य में, एक छिद्र होने पर अनेक अनर्थों का होना उल्लिखित होने से किसी अज्ञात कविंमन्यमान व्यक्ति ने दूसरे श्लोक की रचना की होगी। काश्मीरी, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में यह श्लोक नहीं है।
6-1-2 रंगमंच पर जब चेटी के द्वारा शकुन्तला का चित्र प्रस्तुत होता है तब उसको देखते हुए राजा ने एक श्लोक का उच्चार किया है। जैसे कि-
दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलं लीलाञ्चितभ्रूलतं
दन्तान्तःपरिकीर्णहासकिरणज्योत्स्नाभिषिक्ताधरम्।
कर्कन्धूद्युतिपाटलोष्ठरुचिरं तस्यास्तदेतन्मुखं
चित्रेप्यालपतीव विभ्रमलसत् प्रोद्भिन्नकान्तिद्रवम्।। 6-15
यहाँ पर, बंगाली वाचना पर टीका लिखनेवाले चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने ऐसा अङ्गुलिनिर्देश भी किया है कि “तस्याः०।। तुङ्गमिव रेखानिपुणतया तथा भानात्। एवमग्रेपि। पद्यमिदमनतिमधुरं दाक्षिणात्य-पुस्तकेष्वेव दृश्यते”।। मतलब कि उपर्युक्त श्लोक के बाद एक और नया श्लोक भी दाक्षिणात्य(उत्कलीय) पाठपरम्परा में है, जैसे कि
तस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धः स्वभावश्चिरं
प्रेम्ना मन्मुखचन्द्रमीक्षत इव स्मेरेव वक्तीव च।। 6-15क
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(इस दूसरे श्लोक को रिचर्ड पिशेल ने मान्य नहीं रखा है। किन्तु डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने लिखा है कि उपर्युक्त 6-15क श्लोक पाँच वंगीय पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ है।) इन दोनों श्लोकों की प्रामाणिकता विषयक चर्चा करने के लिए, इसके अनुगामी संवाद की ओर ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। इस दूसरे श्लोक के नीचे विदूषक की उक्ति निम्नोक्त शब्दों में है: (विलोक्य) भो, भावमधुरा रेखा। स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुप्रवेशशङ्कया आलपनकुतूहलं मे जनयति। इस उक्ति का सीधा सम्बन्ध 6-15क श्लोक के साथ ही यह निःशङ्क है। अर्थात् रिचर्ड पिशेल ने दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलं० 6-15 के नीचे जो विदूषक की उक्ति के रूप में वाक्य दिया है, उसका सम्बन्ध तो मात्र 6-15क श्लोक के साथ ही सुसंगत बैठता है। इसी दूसरे श्लोक में उत्तुङ्ग स्तन और निम्न नाभि का उल्लेख है, जिसके साथ “स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु।” इन शब्दों का सन्धान दिखता है। (6-15 के साथ उसका सम्बन्ध कथमपि नहीं बैठता है।) अब स्मर्त्तव्य हैं चन्द्रशेखर के शब्द, जिसमें कहा है कि यह (6-15क) पद्य अनतिमधुर है, अर्थात् सुरुचि का भङ्ग करनेवाला है तथा वह केवल दाक्षिणात्य पाठपरम्परा में ही मिलता है। इस लिए वह दूसरा श्लोक तो निश्चित रूप से प्रक्षिप्त मानना चाहिए।
अब दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलम्० (6-15) श्लोक की प्रामाणिकता को लेकर चर्चा करना आवश्यक है, क्योंकि वह श्लोक देवनागरी या दाक्षिणात्य वाचनाओं में नहीं है, (और वह काश्मीरी वाचना में भी नहीं है)। यदि यह श्लोक मौलिक है, ऐसा सिद्ध होता है तो कहना होगा कि देवनागरी पाठ में से उसको हटा कर संक्षेप किया गया है। उससे विपरीत यदि ऐसा सिद्ध होता है कि यह श्लोक मौलिक नहीं है, तो बंगाली में उसका प्रक्षेप हुआ है यह मानना होगा।
राजा ने श्लोक-14 में अङ्गुलीयक को उलाहना दिया, फिर “अथवा” शब्द से पक्षान्तर का आश्रयण करता हुआ अपने आपको ही दोषी सिद्ध किया है। लेकिन इस श्लोक-14 में कहे शब्दों से वह भारी उद्विग्न हुआ है। वह वर्तमान स्थल-काल को भूल कर ही बोलता है कि जिसने बिना कोई वजह तुम्हारा त्याग कर दिया है और जो व्यक्ति आज पश्चात्ताप से दग्ध हृदयवाला हुआ है उसके उपर अनुकम्पा दिखाते हुए, हे प्रिये ! दर्शन दो। इसी क्षण चेटी “ये रही चित्रगता भट्टिनी शकुन्तला” ऐसा बोलती हुई सहसा रंगभूमि पर शकुन्तला का चित्र लेकर प्रवेश करती है। इस पूर्वापर सन्दर्भ को देखते हुए उचित नहीं लगता है कि राजा अपने ही चित्रित किये चित्र का बखान शुरू कर दे। रंगभूमि पर चित्र प्रदर्शित होते ही वह तुरंत “अहो रूपमालेख्यस्य। तथा हि” कहता हुआ प्रकृत श्लोक का गान शुरू करता है। यहाँ विचारणीय यह भी है कि (1) श्लोक-15 के द्वितीय चरण में “दन्तान्तःपरिकीर्ण-हासकिरणज्योत्स्नाभिषिक्ताधरम्” जैसे शब्दों से “हास्य के किरणों की
श्लोक की रचना कालिदासीय नहीं हो सकती है। लेकिन यह तर्क आत्मलक्षिता के दोष से
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ज्योत्स्ना” कहना उचित होगा, या फिर “हास्य की ज्योत्स्ना” ही पर्याप्त है? अर्थात् इस श्लोक की रचना कालिदासीय नहीं हो सकती है। लेकिन यह तर्क आत्मलक्षिता के दोष से ग्रस्त हो सकता है। अतः अनुगामी संवाद भी परीक्षणीय बनते हैं। जैसे कि (2) इस श्लोक में राजा ने पहले अपने चित्रित किये चित्र की प्रशंसा करने के पश्चात् श्लोक-16 में जो नम्रता दिखायी है, और शकुन्तला के लावण्य की कुछ लकीर ही वह खींच पाया है ऐसा कह कर शकुन्तला के निरतिशय सौन्दर्य की ओर सूचन किया है वह परस्पर संगत नहीं बैठता है। इस चित्र में अभी भी बहुत कुछ चित्रित करना अवशिष्ट है वह बात भी अनुगामी संवादों में दो-तीन बार कही जानेवाली है, उसको देखते हुए श्लोक-15, जिसमें शकुन्तला की भ्रूलता, दन्तावली, अधरोष्ठ सहित का पूरा मुखमण्डल बारीकी से वर्णित है, वह किसी भी तरह से कविप्रणीत नहीं लगता है। (3) उचित तो यही लगता है कि चेटी के द्वारा लाये गये शकुन्तला के चित्र को देख कर रंगमंच पर जो दो पात्र उपस्थित हैं-विदूषक और मिश्रकेशी-वे ही उसको देखते हुए कुछ प्रतिभाव व्यक्त करें। इन दोनों के संवादों में भी, विदूषक के मुख में, “अहो भावमधुरा रेखा। सत्त्वानुप्रवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।” इतने शब्द ही हो, “स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु”-जैसी सुरुचि का भङ्ग करनेवाली उक्ति नहीं होनी चाहिए।$^{57}$ यह उक्ति तो “तस्यास्तनयुग्ममिव स्तनद्वयमिदम्०” वाले श्लोक के शब्दों को देख कर किये गये प्रक्षेप का परिणाम है। (अतः यह अंश निष्कास्य है।) विदूषक के प्रतिभाव के बाद मिश्रकेशी भी उस चित्र को देख कर मौन नहीं रह सकती है। इस लिए उसका तो होना आवश्यक है। तत्पश्चात् (अर्थात् विदूषक की उक्ति को सुन कर) राजा अपने चित्रित किये हुए चित्र में बार बार सुधार करने पर भी शकुन्तला का लावण्य कुछ हद तक ही रेखाङ्कित हो पाया है-ऐसा कहे वह प्रसंगोचित है, तथा उसके धीरोदात्त चरित के अनुरूप है। अतः श्लोक-15 का भी मूल में होना सम्भव नहीं दिखता है।
6-1-3 बंगाली पाठ में “साक्षात्प्रियामुपगतामपहाय पूर्वं०।” श्लोक-17 के मौलिक होने न होने का संशय नहीं है, क्योंकि यह श्लोक सभी वाचनाओं में संचरित हुआ है। किन्तु बृहत्पाठ परम्परा में और लघुपाठ परम्परा में उसका उपस्थितिक्रम भिन्न भिन्न दिख रहा है। जैसे, यहाँ बंगाली पाठ में, राजा जब कहता है कि चित्र में बार बार सुधार करने के बावजूद शकुन्तला का लावण्य रेखाओं से कुछ कुछ ही अङ्कित हो सका है। उसके बाद, उसका मन निःश्वास के साथ कहने लगता है कि प्रिया जब प्रत्यक्ष आयी तो मैंने उसे ठुकरा दिया, और अब चित्र में अंकित प्रिया को मैं बहुमान दे रहा हूँ। मानों स्रोतोवहा नदी को लाँघ कर (उसमें से बिना जल पीये), अब मैं मृगतृष्णिका में से जल पीना चाहता हूँ। किन्तु
- काश्मीरी वाचना के पाठ को सुरक्षित रखनेवाली ऑक्सफोर्ड की शारदा पाण्डुलिपियों (क्रमांक-1247 एवं 159) में यह उक्ति नहीं है, यह भी हमारे विचार को प्रमाणित करती है।
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देवनागरी वाचना में चेटी वर्तिका करण्डक को लाने के लिए जाती है तब उस चित्रपट को विदूषक के हाथ में सौंपना चाहती है। लेकिन राजा तुरन्त कहता है कि मैं ही उस चित्र को पकड़ कर रखूँगा (अहमेवैनमवलम्बे।), और उसके बाद वह निःश्वासपूर्वक यह श्लोक बोलता है। जिसके अनुसन्धान में विदूषक कहता है कि एषोऽत्रभवान् नदीमतिक्रम्य मृगतृष्णिकां संक्रान्तः। विदूषक की यह आत्मगत या अपवार्य उक्ति बंगाली पाठ में नहीं है। इस श्लोक का इस तरह का स्थानान्तरण हुआ है, जिसके कारण विदूषक के मुख में पूर्वोक्त एक उक्ति अधिक है इतना उल्लिखित करके इस चर्चा को रोक लेते हैं। क्योंकि यहाँ मुख्य रूप से श्लोकों के प्रक्षेपों पर ही विचारणा करना अभीष्ट है।
6-1-4 बंगाली वाचना के षष्ठांक के अन्त में मातलि ने विदूषक को पकड़कर मारना शुरू किया। उस प्रसंग का निवेदन करने के लिए पार्वतायन नामका कञ्चुकी आता है। उसको देखते हुए राजा ने कञ्चुकी की कम्पमान स्थिति का एक श्लोक में निरूपण किया है
प्रागेव जरसा कम्पः सविशेषेण संप्रति।
आविष्करोति सर्वाङ्गम् अश्वत्थमिव मारुतः॥6-29
यहाँ प्रासंगिक सन्दर्भ देख कर लगता है कि राजा के मुख में इस तरह की श्लोकात्मक अभिव्यक्ति ठीक नहीं है। आतङ्क की स्थिति में श्लोक एवं उसका गान नाट्यानुकूल नहीं होने से मौलिक नहीं लगता है। विदूषक, जो शकुन्तला का चित्र वसुमती के देखने में न आ जाय इस लिए द्रुतपद से भागा था, और मेघच्छन्न नामक प्रासाद की अट्टालिका में जा पहुँचा है वहाँ पर मातलि ने उसे पकड़ा है और मारना शुरू किया है। विदूषक की आपत्ति का कारण कोई जानता ही नहीं है, क्योंकि मातलि अदृश्य है। अतः चिन्ता का विशेष कारण है। ऐसी स्थिति में राजा कञ्चुकी की कम्पमान स्थिति का निरूपण करने के लिए एक श्लोक का गान करे वह किसी भी दृष्टि से वास्तविक नहीं है, शोभास्पद नहीं है। अतः यह श्लोक निश्चित रूप से प्रक्षिप्त ही होगा। लघुपाठ परम्परा का संचरण करने वाली देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में इस श्लोक का होना तो किसी भी तरह से सम्भवित है ही नहीं।
6-1-5 बंगाली वाचना (एवं मैथिली वाचना) में मातलि ने जब विदूषक को पकड़ कर मारना शुरू किया तब राजा कञ्चुकी से पूछता है कि माधव्य को क्या हुआ है? तब उसके प्रत्युत्तर में निम्नोक्त श्लोक बोला जाता है:-
तस्याग्रभागाद् गृहनीलकण्ठैरनेकविश्रामविलङ्घ्यशृङ्गात्।
सखा प्रकाशेतरमूर्तिना ते केनापि सत्त्वेन निगृह्य नीतः॥6-30
यहाँ पर भी पूर्वोक्त तर्क से ही, प्रकृत सन्दर्भ में श्लोकात्मक अभिव्यक्ति प्रसंग के अनुरूप है। अतः मौलिक नहीं है। यहाँ वस्तुतः क्या होना चाहिए, ऐसी जिज्ञासा की जाय
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तो उसका उत्तर लघुपाठ परम्परा के शाकुन्तल में मिलता है। देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में, इसी श्लोकार्थ को व्यक्त करने के लिए एक गद्य वाक्य को ही रखा गया है। तद्यथा-अदृष्टरूपेण केनापि सत्त्वेन आक्रम्य मेघप्रतिच्छन्नस्य प्रासादस्य अग्रभूमिम् आरोपितः माणवकः माधव्यः। विदूषक के परित्राण का उपाय जल्दी हो जाय इस लिए उसका निवेदन गद्य वाक्य में ही होना मौलिक प्रतीत होता है।
6-2-1 बंगाली पाठ की अपेक्षा से देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के षष्ठांक के पाठ में कुल मिला कर पाँच श्लोक कम हैं। किन्तु संक्षिप्त की गयी इन दोनों वाचनाओं के पाठ में कुत्रचित् गद्य वाक्यों का प्रक्षेप भी हुआ है ऐसा दिख रहा है। उदाहरण के रूप में, इस अङ्क में सानुमती की उक्तियाँ जहाँ पर हैं वह बंगाली वाचना के पाठ्यांश के साथ पूर्ण रूप से ताल-मेल में नहीं है। दुष्यन्त को याद आ रहा है वह क्षण जब शकुन्तला को उसने तो ठुकराया ही था, लेकिन शार्ङ्गरवादि ऋषिकुमारों ने भी उसे उनके पीछे आने से रोक दिया था। उस समय निःसहाय शकुन्तला ने दुष्यन्त की ओर जो वक्रतापूर्ण दृष्टि डाली थी वह क्षण सविष शल्य की तरह दुष्यन्त को दाह दे रहा है। (मयि क्रूरे यत्तत्सविषमिव शल्यं दहति माम्।। 6-9) इसको सुन कर सानुमती बोलती है "अहो ईदृशी स्वकार्यपरता। अस्य संतापेनाहं रमे।।" यह दूसरा वाक्य बंगाली, मैथिली एवं काश्मीरी वाचनाओं के पाठ में नहीं है। देवनागरी में यह वाक्य प्रक्षिप्त ही किया गया है, उसका प्रमाण यही है कि उसी ने कुछ ही क्षण पहले यह कहा है कि मैं राजा का बहुमुख अनुराग देख कर अपनी प्रियसखी को उसका निवेदन करूँगी। उसका यहाँ आने का मूल प्रयोजन याद करने से मालूम होता है कि वह राजा की संतप्त दशा को देख कर उसका आनन्द उठाने नहीं आयी है। एवमेव, इस दृश्य के अन्त भाग में भी राजा की सन्तापजनित मूर्च्छित दशा को देख कर उसको एक क्षण के लिए ऐसा विचार भी आता है कि चलो, जाकर मैं ही राजा के पास पूरी बात का राज खोल दूँ और उसे आश्वस्त कर दूँ। अर्थात् वह राजा के दुःख में आनन्दित होने के लिए नहीं आयी थी यह बात निश्चित है। अतः पूर्वोक्त वाक्य को प्रक्षिप्त मानना चाहिए।
6-3 अनेक विद्वानों ने कहा है कि षष्ठांक बहुत लम्बा है। ऐसा कहने में इतनी लम्बाई की ओर अरुचि इङ्गित करना अभिप्रेत है। किन्तु किसी ने यह सोचने का कष्ट नहीं उठाया कि वह लम्बा है या फिर लम्बा है ऐसा महसूस हो रहा है?। सच बात तो यह है कि तृतीयाङ्क के मूल पाठ में कटौती करके उसे संक्षिप्त किया गया, अतः षष्ठाङ्क लम्बा है, ऐसा लगता है। वस्तुतः यह अङ्क लम्बा नहीं है, इस दीर्घ पाठ में तो उसके प्रमाण निहित है कि तृतीयाङ्क का मूल पाठ भी लम्बा ही था। बंगाली पाठ के तृतीयाङ्क में दुष्यन्त ने जो शकुन्तला के कलुषित नेत्र को वदनमारुत से स्वच्छ कर दिया था, उसीका प्रतिरूप खड़ा करते हुए कालिदास ने इस षष्ठाङ्क में "कण्डूयमानाम् मृगीम्" को चित्रित करने की चाहत व्यक्त की है। देवनागरी के संक्षिप्त किये गये पाठ में जब इस चित्र के अभिलषित विषय
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को प्रेक्षक सुनता है तो, उसको उस विशिष्ट इच्छा के मूल कहाँ पर छुपे हैं यह समझ में ही नहीं आ सकता है।
7-0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल की बृहत्पाठ परम्परा एवं लघुपाठ परम्परा की पाँचो वाचनाओं में सप्तमाङ्क का पाठ प्रायः एक समान संचरित हुआ है। ध्यानास्पद जो भेद है, या कहें एकमात्र जो प्रक्षिप्तांश है वह केवल काश्मीरी वाचना के पाठ में मिलता है। वहाँ सप्तमाङ्क के आरम्भ में एक “प्रवेशक” है, जिसमें स्वर्गलोक की दो नाकलासिकायें रंगमंच पर आकर नृत्य करती हैं और प्रेक्षकवृन्द को यह बताती हैं कि इन्द्र को साहाय्य करके दुष्यन्त पृथिवीलोक की ओर वापस लौट रहा है। विद्वानों का मानना है कि यह प्रवेशक अकेले काश्मीरी पाठ में ही मिलता है, अन्यत्र कहीं पर भी नहीं है इसलिए वह प्रक्षेप ही है। किन्तु डॉ० एस. के. बेलवलकरजी का इस सन्दर्भ में विशेष मन्तव्य⁵⁸ है कि सप्तमांक का यह प्रवेशक मौलिक हो सकता है क्योंकि महाकवि कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र एवं विक्रमोर्वशीय नाटकों में भी नृत्य का दृश्य रखा है तो उसका स्थान यहाँ, शाकुन्तल में भी होना ही चाहिए। इस मन्तव्य का ऊहापोह अभी तक देखने में नहीं आया है।
7-1-1 बंगाली वाचना के सप्तमांक में कुल 35 श्लोक हैं। किन्तु देवनागरी, दाक्षिणात्य वाचनाओं में 34 श्लोक हैं। नाटक के अन्त भाग में दुष्यन्त को आशीर्वचन देते हुए मारीच ऋषि ने जो एक श्लोक बोला है वह बंगाली में अधिक है:
तव भवतु बिडौजाः प्राज्यवृष्टिः प्रजासु,
त्वमपि विततयज्ञो वज्रिणं प्रीणयालम्।
युगशतपरिवृत्तैरेवमन्योन्यकृत्यैर्नयतम्
उभयलोकानुग्रहश्लाघनीयौ ॥ 7-34
(इस श्लोक के साथ “अपि च” का विनियोग करते हुए मैथिली वाचना में एक तीसरा श्लोक भी प्राप्त हो रहा है
ऋतुभिरुचितभागांस्त्वं सुरान् प्रीणयालं,
सुरपतिरपि वृष्टिं त्वत्प्रजार्थं विधत्ताम्।
इति सममुपचारव्यञ्जितश्रीमहिम्नोर्व्रजतु
बहुतिथोऽयं सौहृदेनैव कालः॥ 7-35
यह श्लोक, कुछ शब्दों के परिवर्तन के साथ, काश्मीरी वाचना में भी दृष्टिपथ में आ रहा है। लेकिन वहाँ पर बंगाली वाचना का “तव भवतु बिडौजाः०” वाला श्लोक नहीं है।
- द्रष्टव्यः-Entract to 7 (Nataka and Nartan), Bulletin of Deccan College Research Institute, Poona, vol.-20, 1950, pp. 19-24
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इस “तव भवतु बिडौजाः०” श्लोक को देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना में से हटाया गया है। अर्थात् उसमें एक श्लोक का संक्षेप किया गया है। यहाँ इस श्लोक का संक्षेप किया गया है इतना कहने से बात पूरी नहीं होनी चाहिए। वस्तुतः नाटक में उसकी कोई विशेष उपयोगिता भी नहीं है। इस लिए वह प्रक्षिप्त होने की सम्भावना ही अधिक है। और इस सम्भावना का समर्थन इस बात से होता है कि बंगाली वाचना के श्लोक के स्थान में काश्मीरी वाचना में कोई दूसरा ही श्लोक चल रहा है तथा मैथिली वाचना ने बंगाली वाचना के श्लोक को स्वीकार करने के साथ साथ काश्मीरी वाचना का श्लोक भी स्वीकारा है। अतः इन दोनों श्लोकों को प्रक्षिप्त मानना युक्तियुक्त है। इस सन्दर्भ के अलावा बंगाली और देवनागरी वाचनाओं में सप्तमाङ्क का पाठ प्रायः एक समान प्रवर्तमान है।
उपसंहारः—देवनागरी वाचना ही अधिकाधिक श्रद्धेय (एवं मौलिक) है इस प्रकार की मान्यतावाले विद्वानों ने बंगाली पाठ में प्रक्षेप है ऐसा पूर्वाग्रह बनाकर उसकी नितान्त उपेक्षा की है। दूसरी ओर जिन विद्वानों ने अनेक पाण्डुलिपियों का आलोडन करके बंगाली वाचना के पाठ की समीक्षावृत्ति प्रकाशित की है, उन्होंने बंगाली पाठ ही प्राचीनतर (एवं मौलिक) होने का मताग्रह दृढ कर लिया है। परिणामतः बंगाली पाठ प्राचीनतर या मौलिकता के नजदीक होते हुए भी उसमें प्रकट रूप से दिख रहे प्रक्षेपों का अन्वेषण करने का प्रयास हुआ ही नहीं है। निम्न स्तरीय पाठालोचना के फलस्वरूप बंगाली वाचना की समीक्षावृत्ति का पाठ तैयार हो जाने के बाद, उस पाठ की उच्च स्तरीय आलोचना भी अपेक्षित थी जिसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत आलेख में की गयी है।
तथा च, देवनागरी वाचना का पाठ ही व्यंजना से युक्त है, अतः वही कालिदासीय पाठ हो सकता है ऐसा माननेवालों ने कभी यह सोचा ही नहीं कि देवनागरी के (विशेष रूप से तृतीयांक के) पाठ में समयनिर्देशन की उक्तियों में पूर्वापर विसंगति है, अतः देवनागरी का पाठ संक्षिप्त किया गया पाठ हो सकता है। देवनागरी वाचना में चल रहा पाठ तो कम समय में पूरे नाटक की प्रस्तुति करने के आशय से अनेक स्थानों पर कटौती किया गया पाठ है। लेकिन राघव भट्ट ने उस संक्षिप्त पाठ में भी सभी सन्धि-सन्ध्यङ्ग को सिद्ध होते हुए दिखाया है इस लिए उसका सर्वाधिक प्रचार हो गया। डॉ० बेलवलकर जी के विविध शोधलेखों के प्रकाशन के बावजूद देवनागरी पाठ के पक्षधर विद्वानों ने अपने पूर्वाग्रहों को पहचाना नहीं। कालिदासीय पाठालोचना की उभयथा दुर्भाग्यपूर्ण इस स्थिति में कुछ बदलाव हो यही अभ्यर्थना है।
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चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
।। अभिज्ञानशकुन्तलम् ।।
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रसन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः।। 1-1।।
[नान्द्यन्ते]
सूत्रधारः—अलमतिविस्तरेण। (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) आर्ये, यदि नेपथ्यविधानम् अध्यवसितं तदिहागम्यताम्।
नटी—(प्रविश्य) अज्ज, इमं म्हि। आणवेदु अज्जो, को णिओओ अणुचिट्ठीअदु त्ति। (आर्ये, इयम् अस्मि। आज्ञापयतु आर्यः, कः नियोगः अनुष्ठीयताम् इति।)
।। ॐ नमो गणेशाय।।
श्रीचन्द्रशेखरपदाम्बुरुहे महेन्द्रश्रीचन्द्रशेखरकृतावनती प्रणम्य।
श्रीचन्द्रशेखरकृती वितनोति वृत्तिं शा(श)कुन्तलस्य विलसत्तनुचित्तवृत्तिम्।।
प्रारि(री)प्सितस्य निर्विघ्नपरिसमाप्तिकामः कविकल्पलताराम¹ वाग्देवता-विश्राम (धाम)² श्रीकालिदासः सकलान्तरायोत्सारण-कारण-स्मरणस्य भगवतः शशधरशिरोमणेरष्टमूर्ति-वर्णनरूपाम् आशीर्वादात्मिकां नान्दीं प्रकाशयति।।
या सृष्टिरिति।। (1-1) ईशः परमैश्वर्यवान् महादेवस्ताभिस्तनुभि-र्मूर्तिर्भिर्वो युष्मान् अवतु रक्षतु। ताभिः काभिः? या सृष्टिः स्रष्टुः स्थावर-जङ्गमात्मक-जगद्विधातुराद्या प्रथमा सृष्टिः। प्रथमतॊ या ब्रह्मणा विहितेति भावः। सा तनुर्जलरूपा।। या हविर्हवनीयद्रव्यं घृतादिकं वहति। हविः कीदृशम्? विधिहूतं, वेदविधानेनाग्नौ क्षिप्तम्। साऽग्निरूपा।। या होत्री यजमानरूपा।। ये द्वे तनू कालं दिवारात्रिरूपम् समयं विधत्तः कुरुतः। ते चन्द्रार्क-रूपे। एतेन दिक्कालात्मव्यावृत्तिः³।। या जगद्⁴ व्याप्य, स्थावरजङ्गमात्मकं जगदाक्रम्य स्थिता वर्तमाना। सा कीदृशी? श्रुतेःकर्णस्य⁵ विषयो गोचरो
- मातृका 4117 इत्यत्र कविकल्पलताराम-वाग्देवताविश्रामश्रीकालिदासः इति पठ्यते।
- मातृका 4118 इत्यत्र फलकाद् बहिः लिखितम्।
- वाक्यमेतत् मातृकयोः (4117-4118) “साकाशरूपे”ति प्राक् पठ्यते, किन्तु स्थानपरिवर्तनं द्वयोर्लिपिकारयोः प्रमादः।
- मातृका 4117 इत्यत्र “जगत” पाठो न समीचीनः प्रतिभाति।
- मातृका 4117 इत्यत्र वर्णस्य इति दृश्यते।
96 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
सूत्रधारः- आर्ये, अभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। तस्यां च श्रीकालिदासग्रथितवस्तुना नवेनाभिज्ञानशकुन्तलनाम्ना नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः। तत्प्रतिपात्रमाधीयतां यत्नः।
नटी- सुविहिदप्पओअदाए अज्जस्स ण किं पि परिहाइस्सादि।
(सुविहितप्रयोगतया आर्यस्य न किमपि परिहास्यते।)
सूत्रधारः- (सस्मितम्) आर्ये, कथयामि ते भूतार्थम्।
गुणः शब्दो यस्याः सा तथा⁶। साऽऽकाशरूपा।। यां तनुं सर्व्वेषां बीजानां व्रीह्यादीनां प्रकृतिरुत्पत्तिस्थानम् इति कृत्वा आहुः। पुराविदः पण्डिताः वदन्तीत्यर्थः। सा पृथिवीरूपा।। निदाने प्रकृतिः स्त्रियामिति व्याडिः। यया मूर्त्या प्राणिनो मनुष्यादयः प्राणवन्तः, सा वायुरूपा।। प्राणोपान इत्यमरः। तनुभिः कीदृशीभिः? प्रत्यक्षाभिः। योग्ययोगीन्द्र-ज्ञानग्राह्याभिरित्यर्थः। ईशः कीदृशः? प्रसन्नः सन्तुष्टः।।
नान्द्यन्त इति। नान्दीलक्षणञ्च आशीर्यरथ नमस्क्रिया तु शशिनः सङ्कीर्तनं, वस्तुनो निर्देशो गुरुसंस्तुतिर्मधुलिहां मोदाय पुष्पाञ्जलिः। उच्चैः द्वादशभिः पदैरथ समैर्याष्टभिस्तूर्य्यकैः सद्वृत्तेन सुगन्धिना च कथिता नान्दीति सर्व्वागमे इति त्रिलोचनमिश्रादयः। नान्दीं पदैर्द्वा(र्द्वा)दशभिरष्ट्याभिः संस्कृताम्, तां षोडशपदम् एके, केचिदाहुश्चतुष्पदाम्(म्)। सुप्-तिङन्तं पदं, श्लोकतुर्य्यांशश्चेति पक्षयोः(पादयोः)।। “न मुनेः स्वरसः, किं तु गतानुगतिकादरः” इति वामदेवादयः। अन्ये तु पत्रावली⁷ माङ्गलिनो तथा सा नमस्कृतिश्चेति वदन्ति नान्दीम्। शो(श्लो)कस्य पादैरथ सुप्तिङन्तैः कार्य्याऽष्टभिर्द्वादशभिः पदैः स्वेति(श्चेति) नान्द्याश्चातुर्विध्यमाहुः।। तदियं नान्दी। एतदन्ते सूत्रधारो वदति, नान्दीं पठित्वाऽन्यद् वदतीति वाक्यार्थः। तल्लक्षणञ्च नर्तनीय-कथासूत्रं प्रथमं येन सूच्यते। रङ्गभूमिं समाक्रम्य सूत्रधारः स उच्यते⁸। सूत्रधारः पठेन्नान्दीं प्रथमं स्वरमाश्रित इति नयेन नान्द्यन्ते सूत्रधारप्रवेशोऽपास्त इति प्राज्ञः। केचित्तु सूत्रधारः पठेद् एनाम् अन्यो वा रङ्गभूमिग इति पठन्ति। तन्मते स्वर्गादौ(रूपकादौ?) सूत्रधारपदेन लक्ष्णया स्थापकनामपात्रमुक्तम्। तेन नान्द्यन्ते सूत्रधारः स्थापकः प्रविशतीत्यर्थः। काव्यार्थस्थापनात् स्थापकं(कः)। तदुक्तम्-
“रङ्गपूजां विधायादौ सूत्रधारे विनिर्गते।
स्थापकः प्रविशेत् तत्र सूत्रधारगुणाकृतिः॥”
इति। त्रिलोचनमिश्रैस्तु(?) सूत्रधार इति क्रियापदमुक्तम्। सूत्रं भूमिकां धारयतीति⁹ सूत्रधारः स्थापक इत्यर्थः। अन्यस्त्वाहुः नान्दी नान्दीपाठकः अन्ते शेषे इदं प्रयोजितवान्। तदुक्तं भरतेन “अथ पात्राणि तत्रादौ नान्दी। नान्दीस्तु यः पठेद्” इति। चतुर्भुजमिश्रास्तु नान्द्यन्त इत्यस्यायमर्थः। इयं नान्दी, नान्दीति ज्ञातव्यम् अन्ते सूत्रधार प्रविशतीत्याहुः। नव्यास्तु नेयं नान्दी, किन्तु पूर्वरङ्गस्य रङ्गत्वयामाख्या(?) रङ्गमिदम्। तदुक्तं यस्मादभिनयो ह्यत्र प्राथमिक्यादेवतार्थयते। रङ्गत्यावमतो ज्ञेयं वागङ्गाभिनयात्मकमिति नान्द्यास्तु रङ्गद्वारात् प्राङ् नित्यमिति कर्तव्यतया न मुनिना निर्देशः कृतः। “वेदान्तेषु यमाहुरित्यादौ नान्दी लक्षणाद्योगात्। नान्दी-लक्षणन्तु द्वादशाष्टपदपरिच्छिन्नाऽऽशीरादिषु
- मातृका 4117 इत्यत्र “ग(गो) चराचरागुणः शब्दो यस्याज्ञ(श्च) सा तथा” इति पठ्यते।
- मातृका 4117 इत्यत्र “त पात्रावलिनी”, तन्न समीचीनम्।
- शिवानन्दकरी नान्दी, नान्दी विघ्नोपशान्तये इति 4117 इत्यात्राधिकं काकपदेन फलकाद् बहिर्लिखितम्।
- शब्दोऽयं 4117 इत्यत्र मातृकायां नास्ति।
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रथमोऽङ्कः 97
आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।
बलवदपि शिक्षितानाम् आत्मन्यप्रत्ययं चेतः।।1-2।।
नटी- एवं णेदं। अणन्तरकरणीयं दाणिं आणवेदु अज्जो। (एवं नु एतत्। अनन्तरकरणीयम् इदानीम् आज्ञापयतु आर्यः।)
सूत्रधारः- आर्ये, किमन्यदस्याः परिषदः श्रुतिप्रसादहेतोर्गीतादनन्तरकरणीयमस्ति।
नटी- अध कदरं उण उदुं समस्सइअ गाइस्सं। (अथ कतरम् पुनः ऋतुम् समाश्रित्य गास्यामि।)
सूत्रधारः- आर्ये, नन्विममेव तावन्नातिचिरप्रवृत्तमुपभोगक्षमं ग्रीष्मसमयमाश्रित्य गीयताम्। सम्प्रति हि-
सुभगसलिलावगाहाः पाटलीसंसर्गसुरभिवनवाताः।
प्रच्छायसुलभनिद्रा दिवसाः परिणामरमणीयाः।।1-3।।
युक्तं पदानीति। तदुक्तं रङ्गद्वारमारभ्य कविः कुर्यादिति। तेन नान्द्यन्ते सूत्रधार इदं प्रयोजितवान्। इतः प्रभृति मया नाटकमुपादीयते इति कवेरभिप्रायः। अत एव प्राचीनग्रन्थे विक्रमोर्वश्यां नान्द्यन्त इत्यनन्तरमेव “वेदान्तेषु यमाहुरि” त्यादि पद्यं दृश्यत इत्यर्थः।।
अलमिति। अलं निष्फलम्। तदुक्तं निष्फलपर्यायैर्भर्तृ(?)हरिमिश्रैः। भवति हि तृतीयान्तेन समर्थितमिति। आवश्यके नान्दीकृता अनावश्यकैः प्रत्यहोरात्रादि प्रपञ्चैः फलाभावैः सदस्यवैरस्यादिति भावः। तदुक्तं-
“यद्यप्यङ्गानि भूयांसि पूर्वरङ्गस्य नाटके।
तथाप्यवश्यं कर्तव्या नान्दी विघ्नोपशान्तये।”
पूर्वरङ्गस्तु नाट्यवस्तुनः पूर्वरङ्गविघ्नोपशान्तये। कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः स उच्यते।। नेपथ्यं भूषणस्थानम् इति कोषः। रङ्गाद् बहिस्तु नेपथ्यमिति मुनिः।।
आर्ये इति नाट्ये नटी-सूत्रधारावार्य्य नाम्ना परस्परमिति भरतः। नेपथ्यवेशः। आकल्पवेषो नेपथ्यम् इत्यमरः। अध्यवसितं निर्व्यूढम्। पाठान्तरे-नेपथ्ये यद् विधीयते तन्नेपथ्यविधानं नृत्यम्। अध्यवसितमिष्टम्। आर्य इयम् अस्मि। आज्ञापयत्वार्य्यः, को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति। रसभावदीक्षागुरोः^{10} श्रीसाहसाङ्कस्या-ऽभिरूपभूयिष्ठा परिषदिति क्वचित् पाठः^{11}। अभिरूपः पण्डितः। वस्त्वितिवृत्तं शकुन्तलादुःषन्त^{12} सम्बन्धिरूपम् अभिज्ञायते स्मर्य्यतेऽनेनेत्यैभिज्ञानचिह्नाङ्गुरीयकम्, तेन स्मृता शकुन्तला, अभिज्ञानशकुन्तला। शाकपार्थिवादिः। तामधिकृत्य कृतो ग्रन्थ इत्यर्थेऽपनायकार्य्यं नाटकस्य गृह्यता(गृहीता)र्थप्रकाशनमिति भरतः।।
- रसभावदीक्षादीक्षागुरोः इति 4118 अत्र दृश्यते। रङ्गभावः दीक्षा दीक्षागुरोः इति मातृका 4117 इत्यत्र पठ्यते।
- मैथिली पाठपरम्परायां “रसभावविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यस्य साहसाङ्कस्याभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। “इति वाक्यमुपलभ्यते। उत्कलीय पाठपरम्परायां “श्रीविक्रमादित्यस्य” इत्याधिकं प्राप्यते।
- शकुन्तलाम्बः सन्त इति मातृका 4117 इत्यत्र पठ्यते।
98 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
नटी- (गायति)
खणचुम्बिआइँ भमरेहिँ उअह सुउमारकेसरसिहाइँ।
अवअंसअन्ति सदअं सिरीसकुसुमाइँ पमआओ।। 1-4।।
(क्षणचुम्बितानि भ्रमरैः ऊहत सुकुमारकेसरशिखानि।
अवतंसयन्ति सदयं शिरीषकुसुमानि प्रमदाः।।)
ना(नायिके)त्युत्कण्ठातिशयाय$^{13}$। नाटकेति। तल्लक्षणञ्च-
नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात् पञ्चसन्धिसमन्वितम्। पञ्चाधिका दशपरास्तत्राङ्काः परिकीर्तिताः।।
प्रख्यातवंशो राजर्षिर्धीरोदात्तः प्रतापवान्। दिव्योऽथ दिव्यादिव्यो वा गुणवान् नायको मतः।।
एक एव भवेद्ङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा। अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कार्यो निर्वहणेऽद्भुतः।।
इदञ्च रूपकम्। तदुक्तम्- “नाटकम् अथ प्रकरणं भाण-व्यायोग-समरकाव-(समवकार)-डिमाः। ईहामृगाङ्क-वीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दशेति”। अपि च, विष्कम्भकादावपि नो बोधो वाच्यविकारिणः। न चातिरसो वस्तु दुरं विच्छिन्नतां नयेत्। रसं वा न तिरोदध्याद्द्रस्तु अलङ्कारलक्षणैः। घटितं त्रिंशल्लक्षणान्यत्र नाट्यालङ्कृतयस्तथा। त्रयस्त्रिंशत् प्रयोज्यानि वीथ्यङ्गानि त्रयोदश।।
सन्धयश्च [मु]ख$^{14}$-प्रतिमुख-गर्भ-विमर्श-निर्वहणाख्याः। तदङ्गानि चोपक्षेप्यादीनि प्रकारेभ्योऽवसेयानि। एतानि च यथास्थानं किञ्चिदेव वक्ष्यन्ते, विस्तरभयादिति।। आधीयताम् आरोप्यतां यथा कोऽपि स्वर-तालादि-भङ्गो न स्यादिति भावः। स्वविहित-प्रयोगतयाऽभ्यस्तनृत्यतया परिहास्यते। परिहीणं भविष्यति।। सस्मितमिति। सङ्गीतप्राविण्याभिधानात् नटीकृतप्रशंसा जातईर्ष्यादिति शङ्करः। स्मिताख्यहसितश्रोतमानाम्। तल्लक्षणञ्च-ईषद्विकसितैर्गण्डैः कटाक्षैः सौष्ठवान्वितैः। अदृष्ट-दन्तमुकुलैरुतमानां स्मितं भवेत्।।
भूतार्थं सत्यम्।
आपरे०। (1-2) प्रयोगविज्ञानं नृत्यकौशलं बलवत् सुष्ठु की(कि)मुत अत्यतीव च निर्भरे इत्यमरः। शिक्षितानाम् अभ्यस्तविद्यानाम्, अर्थान्तरन्यासः। एवमेतत् अनन्तरकरणीयम् अव्यवधानकर्तव्यम् इदानीम् आज्ञापयत्वार्यः। उत्तरीयानि सरोजेष्विति प्राकृतसूत्रम्। करणिज्जं करणीयमिति द्वयमेव साधु। दानि-शब्द इदानीमर्थे।। ऋतुञ्च कञ्चित्, प्रायेण भारतीं वृत्तिमाश्रित इति नियमाद् आह। कदरमिति कतरम्। पुनर्रृतुम् समाश्रित्य गास्यामि। ननु-शब्दोऽत्रानुज्ञायाम्। ननु-प्रश्नेऽप्यनुनयेऽनुज्ञायामपीति मेदिनी। सम्प्रति हीति, हि-पादपूरणे हेतौ तथा प्रश्नेऽवधारणे इति कोषः।
सुभग०।। (1-3) सुभगं रम्यं, “पाटलैः” पुष्पभेदः। प्रकृष्ट्याच्छाया आतपाभावो यत्र देशे स प्रच्छायः। प्रच्छया प्रच्छायम्। विभाषा सेने (पा. सू. 2-4-25)त्यादिना क्लीबैकत्वमिति शङ्करः, तच्चिन्त्यम्। जात्यलङ्कारः।।
खण०।। (1-4) क्षणचुम्बितानि भ्रमरैः, उअ अपश्यते(दि)त्यर्थः। उअअ (ऊहत)$^{15}$
- नायिकोत्कण्ठाः तिशयाय इति मातृका 4118 इत्यत्र पठ्यते।
- अस्य स्थाने “सन्धयश्च रथ खप्रतिमुख०” इति 4117 इत्यत्र पठ्यते।
- मिथिलातः प्रकाशिते शङ्कर-नरहरीटकाद्वयसहितेनाभिज्ञानशाकुन्तले तु “ऊहत” इति लिखितं वर्तते।
अभिज्ञानशकुन्तलम् \qquad प्रथमोऽङ्कः \qquad 99
सूत्रधारः—आर्ये, साधु गीतम्। असौ हि रागापहृतचित्तवृत्तिरालिखित इव भाति सर्वतो रङ्गः। तत्कतमं प्रयोगमाश्रित्यैनमाराधयामः।
नटी—णं पढमं जेव अज्जेण आणत्तं आहिण्णाणसउन्तलं णाम अउव्वं णाडअं अहिणीअदु त्ति। (ननु प्रथममेव आर्येणाज्ञप्तम् अभिज्ञानशकुन्तलम् नाम अपूर्वम् नाटकम् अभिनीयताम् इति।)
सूत्रधारः—आर्ये, सम्यगवबोधितोऽस्मि। अस्मिन्क्षणे विस्मृतं खलु मयैतत्। कुतः-
तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः।
एष राजेव दुःषन्तः सारङ्गेणातिरंहसा।।1-5।।
(इति निष्क्रान्तौ)
।। प्रस्तावना ।।
इति शङ्करप्रमादः। सुकुमारकेशरशिखानि। अवतंसयन्ति सदयं शिरीषकुसुमानि प्रमदाः।। पुंस्युत्तंसावतंसौ द्वौ कर्णपूरे च शेखरे इत्यमरः। सदयम् इत्यतिकोमलत्वाद् भङ्गाशङ्कयेति भावः।। रागः स्वरः। रङ्गो रङ्गस्थलम्।। ननु प्रथममेवार्येणाज्ञप्तम् “अभिज्ञानशकुन्तलम्”$^{16}$ नामापूर्वं नाटकम् अभिधी(नी)यतामिति।
सूत्रधारो वदतीति शेषः। एवमन्यत्रापि।
विस्मरणहेतुमाह—तवास्मि०।। (1-5)। प्रसभं बलात् हृतोऽस्वाधीनः कृतोऽस्मि। हारिणा मनोहारिणा। वस्तुस्वरूपं सूचयन्नाह—एष इति। सारङ्गो मृगः। रंहो वेगः। नासूचितस्य पात्रस्य प्रवेशः क्वचिदिष्यत इति भरतः। निष्क्रान्तौ नटी-सूत्रधारावित्यर्थः। इयं प्रस्तावना जातेत्यर्थः। तल्लक्षणञ्च—
“नटी विदूषको वाऽपि पारिपार्श्वक एव वा।
सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते।।
चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्या .... प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः।
आमुखं तत्तु विज्ञेयं बुधैः प्रस्तावनापि सा।।
उद्घातकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा।
प्रवर्तकावलगिते पञ्च प्रस्तावनाभेदाः।।
तत्रेयम् अवलगित-नाम्नी प्रस्तावना। तदुक्तम् यत्रैकत्र समावेशात् कार्यमन्यत् प्रसाध्यते। प्रयोगे खलु तज्ज्ञेयं नाम्नाऽवलगितं बुधैरिति। सूचयेद् वस्तुबीजं वा मुखं(मुख्य)पात्रम्, अथापि वेति वचनात् पात्रसूचनमिदम्। धीरोदात्तो धीरोद्ध[त]स्तथा धीरललितः। धीरप्रशान्त इत्ययमुक्तः। प्रथमं चतुर्भेद इति नायकभेदाश्चत्वारः। तत्रायं धीरोदात्तः। तदुक्तं अवि(धि)क-क्षमावान् अतिगम्भीरो महासत्त्वः। स्थेयाननिगूढमानो धीरोदात्तो दृढव्रतः कथित इति। अङ्गी चात्र शृङ्गारः। यद्वा देवा धीरोद्धता ज्ञेया, ललितास्तु नृपादया इति दर्शनाद् धीरललित एवायम्। तल्लक्षणञ्च निश्चितो मृदुरनिशं कलापरो धीरललितः स्यात्। शस्वंति०। तदुक्तं भरतेन, वेशः सांग्रामिकश्चैव भूषणं परिकीर्तितः$^{17}$।
$^{16.}$ अभिज्ञानशकुन्तला नामापूर्वम् इति 4118 इत्यत्र पठ्यते।
$^{17.}$ मातृका 4117 इत्यत्र परिकीर्तितम् इति पठ्यते।
100 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
(ततः प्रविशति रथारूढः सशरचापहस्तो मृगमनुसरन् राजा सूतश्च।)
सूतः- (राजानं मृगं चावलोक्य) आयुष्मन्- कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि चाधित्यकार्मुके। मृगानुसारिणं साक्षात्पश्यामीव पिनाकिनम्।।1-6।।
राजा- सूत ...... सूत ....., दूरममुना सारङ्गेन वयमाकृष्टाः। सोऽयमिदानीं ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टिः पश्चार्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद्भूयसा पूर्वकायम्। शष्पैरर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीर्णवर्त्मा पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति।।1-7।।
(सविस्मयम्) कथमनुपतत एव मे प्रयत्नप्रेक्षणीयः संवृत्तः।
सूतः- आयुष्मन्, उद्घातिनी भूमिरिति रश्मिसंयमनाद्रथस्य मन्दीभूतो वेगः। तेन मृग एष विप्रकृष्टः संवृत्तः। संप्रति समदेशवर्ती न ते दुरासदो भविष्यति।
राजा- तेन हि विमुच्यन्तामभीषवः।
सूतः- यथाज्ञापयत्यायुष्मान्। (रथवेगं रूपयित्वा) आयुष्मन्, पश्य, एते हि- मुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्वकायाः स्वेषामपि प्रसरतां रजसामलङ्घ्याः। निष्कम्पचामरशिखाश्च्युतकर्णभङ्गा धावन्ति वर्त्मनि तरन्ति नु वाजिनस्ते।।1-8।।
विचित्र-शस्त्र-कवचो रङ्गगुणो धनुर्धर इति। आयुष्मन्निति वदेद्, राज्ञीं च चेटीज्ञ “भवति!” “इति विदूषकः। “आयुष्मान्” रथिनं सूतो, वृद्धं “तात” इति चेतन इति भरतनियमात्।।
कृष्ण(सारे)०।।(1-6) चक्षुरिति जात्यपेक्षया। साक्षात् प्रत्यक्षं पिनाकिनमिवेत्युत्प्रेक्षालङ्कारः। पिनाकिपदं साभिप्रायम्। “सूत सूते”ति विस्मये। विषादे विस्मये हर्षे कोपे दैन्येऽवधारणे। प्रसादनेऽनुकम्पायां द्वित्रिरुक्तं न दुष्यतीति काव्यमीमांसकाः। संभ्रमे यावद् बोधं वेति च।।
ग्रीवा(भङ्गाभिरामम्) ।।(1-7) अनुपतति पश्चादागच्छति। मुहुः प्रेरितनयनः। पश्चार्धम् अपरार्द्धे अर्धार्च्छरीरस्य अर्द्धोत्तरपदस्य दिग्वाच्यपरस्य पश्चभावो वक्तव्य इत्यपरपदस्य पश्चभावः। शष्पं बालतृणम्। पश्येति वाक्यार्थ-कर्मकम्। उदग्रं विपुलं प्लुतम् गतिभेदः। अत्र भङ्गपदस्यासभ्य-स्मारकत्वेनाभिरामपदस्य समभिव्याहारत्वे विप्रतिपत्तिः, जातिरलङ्कारः। उद्घातिनी निम्नोन-नत्वात्पादस्खलनवती। उद्घातस्तु पुमान् पादस्खलने समुपक्रमे इति मेदिनी। रश्मीति रज्जुसमाकर्षणात्, विप्रकृष्टो दूरस्थः।
अभीषुः प्रग्रहे रश्मावित्यमरः।।
मुक्तेषु।। (1-8) निरायतेति अतिदीर्घशरीराग्रभागाः। स्वेषां निजखुरोद्धूतानां प्रसरतां पुरोगच्छताम् अन्यथा निर्वेगस्याप्यश्वस्य वाताल्लङ्घनाभावाद् गुणाभावः। इदानीञ्जानुकुलो वातः