अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 87
उपहितस्मृतिरङ्गुलिमुद्रया प्रियतमाम् अनिमित्तनिराकृताम्।
अनुशयादनुरोदिमि चोत्सुकः सुरभिमाससुखं समुपस्थितम्।। 6-9
यहाँ पर दोनों श्लोकों को “अपि च” निपात से सम्बद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। अतः सब से पहले उसके विनियोग का पूर्वोक्त स्वारस्य घटित होता है कि नहीं यह देखना होगा। पहले श्लोक में शापमुक्ति के बाद की स्थिति का कथन है, दूसरे में शाप के प्रभाव में क्या अनर्थ हो गया उसका कथन है। एवमेव, पहले श्लोक में आम्रमञ्जरी के बाण का उल्लेख करने के बाद दूसरे श्लोक में सुरभिमास उपस्थित होने का कथन स्पष्टतया व्युत्क्रम ही है। वर्णनीय वस्तु में व्युत्क्रम होने से इसकी मौलिकता संशयग्रस्त होती है। इसमें सूक्ष्म रूप से पुनरुक्ति होने से दोनों श्लोकों के मध्य में “अपि च” निपात का विनियोग भी सही अर्थ में समुच्चयार्थक सिद्ध नहीं होता है। इस दृष्टि से दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त सिद्ध होता है।
बंगाली एवं मैथिली वाचना में इस दूसरे श्लोक का प्रक्षेप करने का क्या कारण हो सकता है, ऐसा प्रश्न यदि किया जाय तो राजा की उक्ति में कहा गया है “वयस्य, रन्ध्रोपनिपातिनोऽनर्था इति यदुच्यते, तदव्यभिचारि।” इस वाक्य में, एक छिद्र होने पर अनेक अनर्थों का होना उल्लिखित होने से किसी अज्ञात कविंमन्यमान व्यक्ति ने दूसरे श्लोक की रचना की होगी। काश्मीरी, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में यह श्लोक नहीं है।
6-1-2 रंगमंच पर जब चेटी के द्वारा शकुन्तला का चित्र प्रस्तुत होता है तब उसको देखते हुए राजा ने एक श्लोक का उच्चार किया है। जैसे कि-
दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलं लीलाञ्चितभ्रूलतं
दन्तान्तःपरिकीर्णहासकिरणज्योत्स्नाभिषिक्ताधरम्।
कर्कन्धूद्युतिपाटलोष्ठरुचिरं तस्यास्तदेतन्मुखं
चित्रेप्यालपतीव विभ्रमलसत् प्रोद्भिन्नकान्तिद्रवम्।। 6-15
यहाँ पर, बंगाली वाचना पर टीका लिखनेवाले चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने ऐसा अङ्गुलिनिर्देश भी किया है कि “तस्याः०।। तुङ्गमिव रेखानिपुणतया तथा भानात्। एवमग्रेपि। पद्यमिदमनतिमधुरं दाक्षिणात्य-पुस्तकेष्वेव दृश्यते”।। मतलब कि उपर्युक्त श्लोक के बाद एक और नया श्लोक भी दाक्षिणात्य(उत्कलीय) पाठपरम्परा में है, जैसे कि
तस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धः स्वभावश्चिरं
प्रेम्ना मन्मुखचन्द्रमीक्षत इव स्मेरेव वक्तीव च।। 6-15क