अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें88 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
(इस दूसरे श्लोक को रिचर्ड पिशेल ने मान्य नहीं रखा है। किन्तु डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने लिखा है कि उपर्युक्त 6-15क श्लोक पाँच वंगीय पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ है।) इन दोनों श्लोकों की प्रामाणिकता विषयक चर्चा करने के लिए, इसके अनुगामी संवाद की ओर ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। इस दूसरे श्लोक के नीचे विदूषक की उक्ति निम्नोक्त शब्दों में है: (विलोक्य) भो, भावमधुरा रेखा। स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुप्रवेशशङ्कया आलपनकुतूहलं मे जनयति। इस उक्ति का सीधा सम्बन्ध 6-15क श्लोक के साथ ही यह निःशङ्क है। अर्थात् रिचर्ड पिशेल ने दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलं० 6-15 के नीचे जो विदूषक की उक्ति के रूप में वाक्य दिया है, उसका सम्बन्ध तो मात्र 6-15क श्लोक के साथ ही सुसंगत बैठता है। इसी दूसरे श्लोक में उत्तुङ्ग स्तन और निम्न नाभि का उल्लेख है, जिसके साथ “स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु।” इन शब्दों का सन्धान दिखता है। (6-15 के साथ उसका सम्बन्ध कथमपि नहीं बैठता है।) अब स्मर्त्तव्य हैं चन्द्रशेखर के शब्द, जिसमें कहा है कि यह (6-15क) पद्य अनतिमधुर है, अर्थात् सुरुचि का भङ्ग करनेवाला है तथा वह केवल दाक्षिणात्य पाठपरम्परा में ही मिलता है। इस लिए वह दूसरा श्लोक तो निश्चित रूप से प्रक्षिप्त मानना चाहिए।
अब दीर्घापाङ्गविसारिनेत्रयुगलम्० (6-15) श्लोक की प्रामाणिकता को लेकर चर्चा करना आवश्यक है, क्योंकि वह श्लोक देवनागरी या दाक्षिणात्य वाचनाओं में नहीं है, (और वह काश्मीरी वाचना में भी नहीं है)। यदि यह श्लोक मौलिक है, ऐसा सिद्ध होता है तो कहना होगा कि देवनागरी पाठ में से उसको हटा कर संक्षेप किया गया है। उससे विपरीत यदि ऐसा सिद्ध होता है कि यह श्लोक मौलिक नहीं है, तो बंगाली में उसका प्रक्षेप हुआ है यह मानना होगा।
राजा ने श्लोक-14 में अङ्गुलीयक को उलाहना दिया, फिर “अथवा” शब्द से पक्षान्तर का आश्रयण करता हुआ अपने आपको ही दोषी सिद्ध किया है। लेकिन इस श्लोक-14 में कहे शब्दों से वह भारी उद्विग्न हुआ है। वह वर्तमान स्थल-काल को भूल कर ही बोलता है कि जिसने बिना कोई वजह तुम्हारा त्याग कर दिया है और जो व्यक्ति आज पश्चात्ताप से दग्ध हृदयवाला हुआ है उसके उपर अनुकम्पा दिखाते हुए, हे प्रिये ! दर्शन दो। इसी क्षण चेटी “ये रही चित्रगता भट्टिनी शकुन्तला” ऐसा बोलती हुई सहसा रंगभूमि पर शकुन्तला का चित्र लेकर प्रवेश करती है। इस पूर्वापर सन्दर्भ को देखते हुए उचित नहीं लगता है कि राजा अपने ही चित्रित किये चित्र का बखान शुरू कर दे। रंगभूमि पर चित्र प्रदर्शित होते ही वह तुरंत “अहो रूपमालेख्यस्य। तथा हि” कहता हुआ प्रकृत श्लोक का गान शुरू करता है। यहाँ विचारणीय यह भी है कि (1) श्लोक-15 के द्वितीय चरण में “दन्तान्तःपरिकीर्ण-हासकिरणज्योत्स्नाभिषिक्ताधरम्” जैसे शब्दों से “हास्य के किरणों की