भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 262 में से

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अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 89

ज्योत्स्ना” कहना उचित होगा, या फिर “हास्य की ज्योत्स्ना” ही पर्याप्त है? अर्थात् इस श्लोक की रचना कालिदासीय नहीं हो सकती है। लेकिन यह तर्क आत्मलक्षिता के दोष से ग्रस्त हो सकता है। अतः अनुगामी संवाद भी परीक्षणीय बनते हैं। जैसे कि (2) इस श्लोक में राजा ने पहले अपने चित्रित किये चित्र की प्रशंसा करने के पश्चात् श्लोक-16 में जो नम्रता दिखायी है, और शकुन्तला के लावण्य की कुछ लकीर ही वह खींच पाया है ऐसा कह कर शकुन्तला के निरतिशय सौन्दर्य की ओर सूचन किया है वह परस्पर संगत नहीं बैठता है। इस चित्र में अभी भी बहुत कुछ चित्रित करना अवशिष्ट है वह बात भी अनुगामी संवादों में दो-तीन बार कही जानेवाली है, उसको देखते हुए श्लोक-15, जिसमें शकुन्तला की भ्रूलता, दन्तावली, अधरोष्ठ सहित का पूरा मुखमण्डल बारीकी से वर्णित है, वह किसी भी तरह से कविप्रणीत नहीं लगता है। (3) उचित तो यही लगता है कि चेटी के द्वारा लाये गये शकुन्तला के चित्र को देख कर रंगमंच पर जो दो पात्र उपस्थित हैं-विदूषक और मिश्रकेशी-वे ही उसको देखते हुए कुछ प्रतिभाव व्यक्त करें। इन दोनों के संवादों में भी, विदूषक के मुख में, “अहो भावमधुरा रेखा। सत्त्वानुप्रवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।” इतने शब्द ही हो, “स्खलतीव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु”-जैसी सुरुचि का भङ्ग करनेवाली उक्ति नहीं होनी चाहिए।$^{57}$ यह उक्ति तो “तस्यास्तनयुग्ममिव स्तनद्वयमिदम्०” वाले श्लोक के शब्दों को देख कर किये गये प्रक्षेप का परिणाम है। (अतः यह अंश निष्कास्य है।) विदूषक के प्रतिभाव के बाद मिश्रकेशी भी उस चित्र को देख कर मौन नहीं रह सकती है। इस लिए उसका तो होना आवश्यक है। तत्पश्चात् (अर्थात् विदूषक की उक्ति को सुन कर) राजा अपने चित्रित किये हुए चित्र में बार बार सुधार करने पर भी शकुन्तला का लावण्य कुछ हद तक ही रेखाङ्कित हो पाया है-ऐसा कहे वह प्रसंगोचित है, तथा उसके धीरोदात्त चरित के अनुरूप है। अतः श्लोक-15 का भी मूल में होना सम्भव नहीं दिखता है।

6-1-3 बंगाली पाठ में “साक्षात्प्रियामुपगतामपहाय पूर्वं०।” श्लोक-17 के मौलिक होने न होने का संशय नहीं है, क्योंकि यह श्लोक सभी वाचनाओं में संचरित हुआ है। किन्तु बृहत्पाठ परम्परा में और लघुपाठ परम्परा में उसका उपस्थितिक्रम भिन्न भिन्न दिख रहा है। जैसे, यहाँ बंगाली पाठ में, राजा जब कहता है कि चित्र में बार बार सुधार करने के बावजूद शकुन्तला का लावण्य रेखाओं से कुछ कुछ ही अङ्कित हो सका है। उसके बाद, उसका मन निःश्वास के साथ कहने लगता है कि प्रिया जब प्रत्यक्ष आयी तो मैंने उसे ठुकरा दिया, और अब चित्र में अंकित प्रिया को मैं बहुमान दे रहा हूँ। मानों स्रोतोवहा नदी को लाँघ कर (उसमें से बिना जल पीये), अब मैं मृगतृष्णिका में से जल पीना चाहता हूँ। किन्तु


  1. काश्मीरी वाचना के पाठ को सुरक्षित रखनेवाली ऑक्सफोर्ड की शारदा पाण्डुलिपियों (क्रमांक-1247 एवं 159) में यह उक्ति नहीं है, यह भी हमारे विचार को प्रमाणित करती है।
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