भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 262 में से

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90 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

देवनागरी वाचना में चेटी वर्तिका करण्डक को लाने के लिए जाती है तब उस चित्रपट को विदूषक के हाथ में सौंपना चाहती है। लेकिन राजा तुरन्त कहता है कि मैं ही उस चित्र को पकड़ कर रखूँगा (अहमेवैनमवलम्बे।), और उसके बाद वह निःश्वासपूर्वक यह श्लोक बोलता है। जिसके अनुसन्धान में विदूषक कहता है कि एषोऽत्रभवान् नदीमतिक्रम्य मृगतृष्णिकां संक्रान्तः। विदूषक की यह आत्मगत या अपवार्य उक्ति बंगाली पाठ में नहीं है। इस श्लोक का इस तरह का स्थानान्तरण हुआ है, जिसके कारण विदूषक के मुख में पूर्वोक्त एक उक्ति अधिक है इतना उल्लिखित करके इस चर्चा को रोक लेते हैं। क्योंकि यहाँ मुख्य रूप से श्लोकों के प्रक्षेपों पर ही विचारणा करना अभीष्ट है।

6-1-4 बंगाली वाचना के षष्ठांक के अन्त में मातलि ने विदूषक को पकड़कर मारना शुरू किया। उस प्रसंग का निवेदन करने के लिए पार्वतायन नामका कञ्चुकी आता है। उसको देखते हुए राजा ने कञ्चुकी की कम्पमान स्थिति का एक श्लोक में निरूपण किया है

प्रागेव जरसा कम्पः सविशेषेण संप्रति।
आविष्करोति सर्वाङ्गम् अश्वत्थमिव मारुतः॥6-29

यहाँ प्रासंगिक सन्दर्भ देख कर लगता है कि राजा के मुख में इस तरह की श्लोकात्मक अभिव्यक्ति ठीक नहीं है। आतङ्क की स्थिति में श्लोक एवं उसका गान नाट्यानुकूल नहीं होने से मौलिक नहीं लगता है। विदूषक, जो शकुन्तला का चित्र वसुमती के देखने में न आ जाय इस लिए द्रुतपद से भागा था, और मेघच्छन्न नामक प्रासाद की अट्टालिका में जा पहुँचा है वहाँ पर मातलि ने उसे पकड़ा है और मारना शुरू किया है। विदूषक की आपत्ति का कारण कोई जानता ही नहीं है, क्योंकि मातलि अदृश्य है। अतः चिन्ता का विशेष कारण है। ऐसी स्थिति में राजा कञ्चुकी की कम्पमान स्थिति का निरूपण करने के लिए एक श्लोक का गान करे वह किसी भी दृष्टि से वास्तविक नहीं है, शोभास्पद नहीं है। अतः यह श्लोक निश्चित रूप से प्रक्षिप्त ही होगा। लघुपाठ परम्परा का संचरण करने वाली देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में इस श्लोक का होना तो किसी भी तरह से सम्भवित है ही नहीं।

6-1-5 बंगाली वाचना (एवं मैथिली वाचना) में मातलि ने जब विदूषक को पकड़ कर मारना शुरू किया तब राजा कञ्चुकी से पूछता है कि माधव्य को क्या हुआ है? तब उसके प्रत्युत्तर में निम्नोक्त श्लोक बोला जाता है:-

तस्याग्रभागाद् गृहनीलकण्ठैरनेकविश्रामविलङ्घ्यशृङ्गात्।
सखा प्रकाशेतरमूर्तिना ते केनापि सत्त्वेन निगृह्य नीतः॥6-30

यहाँ पर भी पूर्वोक्त तर्क से ही, प्रकृत सन्दर्भ में श्लोकात्मक अभिव्यक्ति प्रसंग के अनुरूप है। अतः मौलिक नहीं है। यहाँ वस्तुतः क्या होना चाहिए, ऐसी जिज्ञासा की जाय

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