भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 262 में से

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पृष्ठ 105

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 91

तो उसका उत्तर लघुपाठ परम्परा के शाकुन्तल में मिलता है। देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में, इसी श्लोकार्थ को व्यक्त करने के लिए एक गद्य वाक्य को ही रखा गया है। तद्यथा-अदृष्टरूपेण केनापि सत्त्वेन आक्रम्य मेघप्रतिच्छन्नस्य प्रासादस्य अग्रभूमिम् आरोपितः माणवकः माधव्यः। विदूषक के परित्राण का उपाय जल्दी हो जाय इस लिए उसका निवेदन गद्य वाक्य में ही होना मौलिक प्रतीत होता है।

6-2-1 बंगाली पाठ की अपेक्षा से देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के षष्ठांक के पाठ में कुल मिला कर पाँच श्लोक कम हैं। किन्तु संक्षिप्त की गयी इन दोनों वाचनाओं के पाठ में कुत्रचित् गद्य वाक्यों का प्रक्षेप भी हुआ है ऐसा दिख रहा है। उदाहरण के रूप में, इस अङ्क में सानुमती की उक्तियाँ जहाँ पर हैं वह बंगाली वाचना के पाठ्यांश के साथ पूर्ण रूप से ताल-मेल में नहीं है। दुष्यन्त को याद आ रहा है वह क्षण जब शकुन्तला को उसने तो ठुकराया ही था, लेकिन शार्ङ्गरवादि ऋषिकुमारों ने भी उसे उनके पीछे आने से रोक दिया था। उस समय निःसहाय शकुन्तला ने दुष्यन्त की ओर जो वक्रतापूर्ण दृष्टि डाली थी वह क्षण सविष शल्य की तरह दुष्यन्त को दाह दे रहा है। (मयि क्रूरे यत्तत्सविषमिव शल्यं दहति माम्।। 6-9) इसको सुन कर सानुमती बोलती है "अहो ईदृशी स्वकार्यपरता। अस्य संतापेनाहं रमे।।" यह दूसरा वाक्य बंगाली, मैथिली एवं काश्मीरी वाचनाओं के पाठ में नहीं है। देवनागरी में यह वाक्य प्रक्षिप्त ही किया गया है, उसका प्रमाण यही है कि उसी ने कुछ ही क्षण पहले यह कहा है कि मैं राजा का बहुमुख अनुराग देख कर अपनी प्रियसखी को उसका निवेदन करूँगी। उसका यहाँ आने का मूल प्रयोजन याद करने से मालूम होता है कि वह राजा की संतप्त दशा को देख कर उसका आनन्द उठाने नहीं आयी है। एवमेव, इस दृश्य के अन्त भाग में भी राजा की सन्तापजनित मूर्च्छित दशा को देख कर उसको एक क्षण के लिए ऐसा विचार भी आता है कि चलो, जाकर मैं ही राजा के पास पूरी बात का राज खोल दूँ और उसे आश्वस्त कर दूँ। अर्थात् वह राजा के दुःख में आनन्दित होने के लिए नहीं आयी थी यह बात निश्चित है। अतः पूर्वोक्त वाक्य को प्रक्षिप्त मानना चाहिए।

6-3 अनेक विद्वानों ने कहा है कि षष्ठांक बहुत लम्बा है। ऐसा कहने में इतनी लम्बाई की ओर अरुचि इङ्गित करना अभिप्रेत है। किन्तु किसी ने यह सोचने का कष्ट नहीं उठाया कि वह लम्बा है या फिर लम्बा है ऐसा महसूस हो रहा है?। सच बात तो यह है कि तृतीयाङ्क के मूल पाठ में कटौती करके उसे संक्षिप्त किया गया, अतः षष्ठाङ्क लम्बा है, ऐसा लगता है। वस्तुतः यह अङ्क लम्बा नहीं है, इस दीर्घ पाठ में तो उसके प्रमाण निहित है कि तृतीयाङ्क का मूल पाठ भी लम्बा ही था। बंगाली पाठ के तृतीयाङ्क में दुष्यन्त ने जो शकुन्तला के कलुषित नेत्र को वदनमारुत से स्वच्छ कर दिया था, उसीका प्रतिरूप खड़ा करते हुए कालिदास ने इस षष्ठाङ्क में "कण्डूयमानाम् मृगीम्" को चित्रित करने की चाहत व्यक्त की है। देवनागरी के संक्षिप्त किये गये पाठ में जब इस चित्र के अभिलषित विषय

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