अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें92 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
को प्रेक्षक सुनता है तो, उसको उस विशिष्ट इच्छा के मूल कहाँ पर छुपे हैं यह समझ में ही नहीं आ सकता है।
7-0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल की बृहत्पाठ परम्परा एवं लघुपाठ परम्परा की पाँचो वाचनाओं में सप्तमाङ्क का पाठ प्रायः एक समान संचरित हुआ है। ध्यानास्पद जो भेद है, या कहें एकमात्र जो प्रक्षिप्तांश है वह केवल काश्मीरी वाचना के पाठ में मिलता है। वहाँ सप्तमाङ्क के आरम्भ में एक “प्रवेशक” है, जिसमें स्वर्गलोक की दो नाकलासिकायें रंगमंच पर आकर नृत्य करती हैं और प्रेक्षकवृन्द को यह बताती हैं कि इन्द्र को साहाय्य करके दुष्यन्त पृथिवीलोक की ओर वापस लौट रहा है। विद्वानों का मानना है कि यह प्रवेशक अकेले काश्मीरी पाठ में ही मिलता है, अन्यत्र कहीं पर भी नहीं है इसलिए वह प्रक्षेप ही है। किन्तु डॉ० एस. के. बेलवलकरजी का इस सन्दर्भ में विशेष मन्तव्य⁵⁸ है कि सप्तमांक का यह प्रवेशक मौलिक हो सकता है क्योंकि महाकवि कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र एवं विक्रमोर्वशीय नाटकों में भी नृत्य का दृश्य रखा है तो उसका स्थान यहाँ, शाकुन्तल में भी होना ही चाहिए। इस मन्तव्य का ऊहापोह अभी तक देखने में नहीं आया है।
7-1-1 बंगाली वाचना के सप्तमांक में कुल 35 श्लोक हैं। किन्तु देवनागरी, दाक्षिणात्य वाचनाओं में 34 श्लोक हैं। नाटक के अन्त भाग में दुष्यन्त को आशीर्वचन देते हुए मारीच ऋषि ने जो एक श्लोक बोला है वह बंगाली में अधिक है:
तव भवतु बिडौजाः प्राज्यवृष्टिः प्रजासु,
त्वमपि विततयज्ञो वज्रिणं प्रीणयालम्।
युगशतपरिवृत्तैरेवमन्योन्यकृत्यैर्नयतम्
उभयलोकानुग्रहश्लाघनीयौ ॥ 7-34
(इस श्लोक के साथ “अपि च” का विनियोग करते हुए मैथिली वाचना में एक तीसरा श्लोक भी प्राप्त हो रहा है
ऋतुभिरुचितभागांस्त्वं सुरान् प्रीणयालं,
सुरपतिरपि वृष्टिं त्वत्प्रजार्थं विधत्ताम्।
इति सममुपचारव्यञ्जितश्रीमहिम्नोर्व्रजतु
बहुतिथोऽयं सौहृदेनैव कालः॥ 7-35
यह श्लोक, कुछ शब्दों के परिवर्तन के साथ, काश्मीरी वाचना में भी दृष्टिपथ में आ रहा है। लेकिन वहाँ पर बंगाली वाचना का “तव भवतु बिडौजाः०” वाला श्लोक नहीं है।
- द्रष्टव्यः-Entract to 7 (Nataka and Nartan), Bulletin of Deccan College Research Institute, Poona, vol.-20, 1950, pp. 19-24