अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 93
इस “तव भवतु बिडौजाः०” श्लोक को देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना में से हटाया गया है। अर्थात् उसमें एक श्लोक का संक्षेप किया गया है। यहाँ इस श्लोक का संक्षेप किया गया है इतना कहने से बात पूरी नहीं होनी चाहिए। वस्तुतः नाटक में उसकी कोई विशेष उपयोगिता भी नहीं है। इस लिए वह प्रक्षिप्त होने की सम्भावना ही अधिक है। और इस सम्भावना का समर्थन इस बात से होता है कि बंगाली वाचना के श्लोक के स्थान में काश्मीरी वाचना में कोई दूसरा ही श्लोक चल रहा है तथा मैथिली वाचना ने बंगाली वाचना के श्लोक को स्वीकार करने के साथ साथ काश्मीरी वाचना का श्लोक भी स्वीकारा है। अतः इन दोनों श्लोकों को प्रक्षिप्त मानना युक्तियुक्त है। इस सन्दर्भ के अलावा बंगाली और देवनागरी वाचनाओं में सप्तमाङ्क का पाठ प्रायः एक समान प्रवर्तमान है।
उपसंहारः—देवनागरी वाचना ही अधिकाधिक श्रद्धेय (एवं मौलिक) है इस प्रकार की मान्यतावाले विद्वानों ने बंगाली पाठ में प्रक्षेप है ऐसा पूर्वाग्रह बनाकर उसकी नितान्त उपेक्षा की है। दूसरी ओर जिन विद्वानों ने अनेक पाण्डुलिपियों का आलोडन करके बंगाली वाचना के पाठ की समीक्षावृत्ति प्रकाशित की है, उन्होंने बंगाली पाठ ही प्राचीनतर (एवं मौलिक) होने का मताग्रह दृढ कर लिया है। परिणामतः बंगाली पाठ प्राचीनतर या मौलिकता के नजदीक होते हुए भी उसमें प्रकट रूप से दिख रहे प्रक्षेपों का अन्वेषण करने का प्रयास हुआ ही नहीं है। निम्न स्तरीय पाठालोचना के फलस्वरूप बंगाली वाचना की समीक्षावृत्ति का पाठ तैयार हो जाने के बाद, उस पाठ की उच्च स्तरीय आलोचना भी अपेक्षित थी जिसकी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत आलेख में की गयी है।
तथा च, देवनागरी वाचना का पाठ ही व्यंजना से युक्त है, अतः वही कालिदासीय पाठ हो सकता है ऐसा माननेवालों ने कभी यह सोचा ही नहीं कि देवनागरी के (विशेष रूप से तृतीयांक के) पाठ में समयनिर्देशन की उक्तियों में पूर्वापर विसंगति है, अतः देवनागरी का पाठ संक्षिप्त किया गया पाठ हो सकता है। देवनागरी वाचना में चल रहा पाठ तो कम समय में पूरे नाटक की प्रस्तुति करने के आशय से अनेक स्थानों पर कटौती किया गया पाठ है। लेकिन राघव भट्ट ने उस संक्षिप्त पाठ में भी सभी सन्धि-सन्ध्यङ्ग को सिद्ध होते हुए दिखाया है इस लिए उसका सर्वाधिक प्रचार हो गया। डॉ० बेलवलकर जी के विविध शोधलेखों के प्रकाशन के बावजूद देवनागरी पाठ के पक्षधर विद्वानों ने अपने पूर्वाग्रहों को पहचाना नहीं। कालिदासीय पाठालोचना की उभयथा दुर्भाग्यपूर्ण इस स्थिति में कुछ बदलाव हो यही अभ्यर्थना है।