अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें86 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
5-2-1 देवनागरी पाठपरम्परा में कञ्चुकी की उक्ति का एक श्लोक हटाया गया है जो इस प्रकार है-भोश्चित्रमेतत्।
क्षणात् प्रबोधमायाति लंघ्यते तमसा पुनः।
निर्वांस्यतः प्रदीपस्य शिखेव जरतो मतिः॥5-2
ऐसा संक्षेप करना आवश्यक था क्योंकि देवनागरी पाठ में, राजा पर्याकुल मनःस्थिति में रंग पर कहीं अकेला खड़ा है। उसको ज्यादा समय पर्याकुलता के हावभाव के साथ खड़ा रहना रंगमंच के अनुकूल नहीं है। अतः यह एक श्लोक हटाया गया दिखता है। वस्तुतः बंगाली पाठ में, पञ्चमाङ्क के प्रारम्भ में कञ्चुकी वार्धक्य के कारण बीच बीच में भूल जाता है ऐसा दिखा कर दुष्यन्त की विस्मृति का अभिव्यंजन किया जा रहा है। इसमें नाटकीयता अधिक है। किन्तु देवनागरी पाठ में से कञ्चुकी के इस श्लोक को हटाया गया है।
5-2-2 पञ्चमाङ्क के प्रथम दृश्य के आरम्भिक सोपान को बदलने से बंगाली वाचना में एक वाक्य जो विदूषक के मुख में रखा गया है-भो गोविन्दारक इति भणितस्य ऋषभस्य परिश्रमो नश्यति। उसे देवनागरी पाठ में से हटाया गया है। क्योंकि देवनागरी पाठ में हंसपदिका गीत को प्राथम्य देने से विदूषक को सब से पहले वसुमती के पास भेज दिया गया है। इसके विपरीत, बंगाली पाठ में तो विदूषक वैतालिकों के गान के समय तक वहीं खड़ा था और तत्पश्चात् ही हंसवती का गान शुरू होता है। सूक्ष्म विश्लेषण से मालूम होता है कि देवनागरी के संक्षिप्त किये गये पाठ में विदूषक का स्वरूप भी बदल दिया गया है। बंगाली पाठपरम्परा में विदूषक का जो स्वरूप है, उससे भिन्न स्वरूप देवनागरी पाठपरम्परा में दिख रहा है।
6-1-0 बंगाली वाचना (और मैथिली वाचना) के षष्ठांक में कुल मिला कर 38 श्लोक हैं। किन्तु काश्मीरी, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में सर्वत्र केवल 32 श्लोक संचरित होकर हम तक पहुँचे हैं। अतः पाँच श्लोकों के कम-ज्यादा होने का क्या कारण हो सकता है, यह विचारणीय है। एवमेव, इन दोनों पाठपरम्पराओं में से कहाँ पर मौलिकता झलक रही है वह भी गवेषणीय है।
6-1-1 बंगाली वाचना के षष्ठाङ्क में आरम्भ में ही एक श्लोक का प्रक्षेप है कृशकुन्तला के हाथ से बिछड़ गयी अङ्गूठी राजा को प्राप्त हो जाने के बाद, वह विरहावस्था में कहता है कि एक रन्ध्र हो जाने पर अनर्थों की परम्परा शुरू हो ही जाती है। इस बात का समर्थन करते हुए दुष्यन्त के मुख में निम्नोक्त दो श्लोक रखे गये हैं
मुनिसुताप्रणयस्मृतिरोधिना मम च मुक्तमिदं तमसा मनः।
मनसिजेन सखे प्रहरिष्यता धनुषि चूतशरश्च निवेशितः॥ 6-8
अपि च