अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् \hspace{3cm} प्रस्तावना \hspace{3cm} 85
अनुमान किया जा सकता है कि दुष्यन्त कितना संवेदना विहीन व्यक्ति है क्योंकि एक ओर शकुन्तला के जीवन पर वज्राघात किया गया है और दूसरी ओर नायक उसकी भ्रुकुटियों का विविध रूप में निरूपण कर रहा है। पहले श्लोक में दुष्यन्त के चित्त में यह प्रतीति उदित हो जाती है कि शकुन्तला का कोप तात्त्विक-अकृत्रिम-ही है। बस प्रस्तुत सन्दर्भ में इतना ही पर्याप्त है, सह्य है। इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन दूसरे श्लोक में दुष्यन्त शकुन्तला की भग्न भृकुटी के लिए जो उपमान का प्रयोग करता है, वह काव्यत्व से मण्डित होते हुए भी पूर्वापर सन्दर्भ में सर्वथा अयुक्तियुक्त है। और यहाँ (दूसरे श्लोक की) पहली दो पङ्क्तियों में दुष्यन्त अपना ही दोष देखने लगा है ऐसा कथन है, जो भी असंगत है। यदि वह इस बात से सहमत है कि मैं विस्मृत चित्तवृत्तिवाला हो गया हूँ और एकान्त में किये प्रणय को नहीं स्वीकारता हूँ तो प्रत्याख्यान करने की मति से उसे विरत हो जाना चाहिए। अतः इस दूसरे श्लोक को ही प्रक्षिप्त मानना होगा। प्रो. शारदारञ्जन राय (1908) ने भी इसी श्लोक को प्रक्षिप्त मानने का अभिप्राय दिया था$^{56}$।
5-1-2 उपर्युक्त दोनों श्लोकों के नीचे शकुन्तला की एक उक्ति बंगाली पाण्डुलिपियों में प्रवर्तमान है जिसमें शकुन्तला ने कहा है कि क्या आप ही केवल प्रमाणज्ञ हैं और आप ही अकेले लोकमान्य धर्मस्थिति को जानते हैं तथा लज्जाशील महिलायें क्या कुछ जानती ही नहीं है:
तुम्हे ज्जेव पमाणं जाणध धम्मत्थिदिञ्ज लोअस्स।
लज्जाविणिज्जिदाओ जाणन्ति ण किं पि महिलाओ।। 5-26अर्थात्-यूयमेव प्रमाणं जानीथ धर्मस्थितिञ्च लोकस्य।
लज्जाविनिर्जिता जानन्ति न खलु किमपि महिलाः।।
यह श्लोक रिचर्ड पिशेल की आवृत्ति में ग्राह्य नहीं बना है। बंगाली वाचना के पाठ पर टीका लिखनेवाले और प्रमाणभूत माने गये टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने इस श्लोक को “पुराणप्रसिद्धा गाथेयम्” कहा है। लेकिन बंगाली पाण्डुलिपियों में यह श्लोक संचरित होता रहा है इस लिए डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने उसे स्वीकारा है। काश्मीरी एवं मैथिली वाचना में भी यह श्लोक संचरित हुआ दिख रहा है। किन्तु इस श्लोक को मौलिक मानना मुश्किल है, क्योंकि यह तो शकुन्तला के व्यक्तित्व का दूसरा ही रूप प्रकट करता है, जो समग्र नाटक में आलिखित शकुन्तला के स्वरूप से भिन्न है तथा प्रत्याख्यान-जनित करुणता के प्रभाव का अपकर्ष करनेवाला सिद्ध होता है। इस लिए इसकी मौलिकता पर प्रश्न चिह्न लगता है।
इन दो श्लोकों के अलावा पञ्चमाङ्क के अन्यान्य श्लोकों की स्वीकृति सभी वाचनाओं में एक समान है।
- द्रष्टव्यः उनका सम्पादित किया गया अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ. 514-515