भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 262 में से

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पृष्ठ 98

84 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

लगता है? (2) इन दोनों में से कौन सा श्लोक मौलिक होगा अथवा कौन सा प्रक्षिप्त होगा?

कालिदास जिस सन्दर्भ में “अथवा” का विनियोग करते हैं वह बहुशः दुष्यन्त जब निषेधात्मक विचार पहले प्रस्तुत कर देता है वहाँ तुरन्त ही उसी विचार को छोड़ कर कुछ सकारात्मक / आशाजनक विचार को कहना चाहता है तब “अथवा” से उसका अवतार करता है। कोशकार “अथवा” को पक्षान्तर का वाचक कहते हैं। उदाहरण के लिए

शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति च बाहुः कुतः फलमिहास्ति।
अथवा भवितव्यानां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र⁵⁵।। 1-15

इस दृष्टि से देखें तो पञ्चमाङ्क के उपर्युक्त सन्दर्भ में (बंगाली पाठ में) तो “अथवा” का प्रयोग पक्षान्तर को प्रस्तुत करने के लिए नहीं हुआ है। उसी तरह से मैथिली वाचना में इन श्लोकों को “अपि च” से संलग्न किया गया है। किन्तु वहाँ पर भी “अपि च” का प्रयोग समुच्चयार्थक के स्वारस्य को प्रकट नहीं करता है क्योंकि यहाँ दोनों ही श्लोकों में भिन्न भिन्न शब्दों में शकुन्तला की भ्रुकुटि का ही चित्र वर्णित किया गया है, अर्थात् एक ही विचार पुनरुक्त हो रहा है। अतः इतना तो पहले सिद्ध हो ही जाता है कि इन दोनों में से कोई एक श्लोक प्रक्षिप्त होने की पूरी सम्भावना है। अब सोचना है कि इनमें से कौन सा श्लोक प्रक्षिप्त माना जाय? देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में केवल दूसरे श्लोक का ही स्वीकार हुआ है, उसको देखकर कोई कहेगा कि उनकी दृष्टि में वही मौलिक होगा। किन्तु देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में स्वीकार्य होने से वही मौलिक होगा, ऐसा निर्णय देना भी तार्किक नहीं है। इसकी परीक्षा करने के लिए इस प्रसंग का पूर्वापर सन्दर्भ देखना बहुत जरूरी है।

दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्याख्यात करने के लिए “प्राग् अन्तरिक्षगमनात् स्वम् अपत्यजातम् अन्यद्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति।।” (5-22) ऐसा बोल दिया है। इसको सुनते ही शकुन्तला ने दुष्यन्त को “अनार्य” कहकर भारी कोपवचन कहे हैं। जिसको सुनते सुनते दुष्यन्त ने स्वगत उक्ति के रूप में उपर्युक्त दो श्लोक बोले हैं। पहलेवाले श्लोक में दुष्यन्त ने निरीक्षण किया है कि वनवास के कारण शकुन्तला का कोप बिलकुल स्वाभाविक-अविभ्रम-है। उसमें कोई कृत्रिमता, विलासादि हावभाव नहीं थे और उसका अधरोष्ठ वेपमान होने के साथ विनीत भ्रुकुटियाँ भी एकसाथ वक्रता को धारण करती हैं। फिर वह दूसरे श्लोक में पुनरपि कहता है कि उसकी दोनों कुटिल भ्रुकुटियाँ एकदम भग्न होने से ऐसा लगता है कि मानों कामदेव का शरासन भग्न हो गया। इस वर्णन को देख कर


  1. द्रष्टव्यः रघुवंश में - क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः। तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्। अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः। (सर्गः 1, श्लो. 2, 4)