अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 83
राजा के लिए रंगभूमि पर लम्बी देर तक खड़े रहना मंचन के अनुकूल नहीं है। इसके विपरीत, बंगाली पाठानुसार कञ्चुकी बहुत देर तक राजा को निवेदन करने के लिए योग्य क्षण की प्रतीक्षा में खड़ा रहे तो उस में कोई प्रतिकूलता या अनौचित्य नहीं है। तीसरा, बंगाली पाठ में वैतालिकों के गान को सुनकर दुष्यन्त “एतेन कार्यानुशासनपरिश्रान्ताः पुनर्नवीकृताः स्मः।” ऐसा बोले उसमें पूरा औचित्य दिखता है। किन्तु देवनागरी पाठ में वैतालिकों के गान को सुन कर दुष्यन्त “क्लान्तमनसः पुनर्नवीकृताः स्मः” कहे तो उसमें बिल्कुल औचित्य नहीं है। राजा का मन जननान्तर सौहृद की अज्ञात याद में पर्याकुल है और वैतालिकों ने जो गान किया है उसका प्रतिपाद्य विषय तो राजा की प्रजा सम्बन्धी कार्य करने की संनद्धता है। उपर्युक्त तीन कारणों से बंगाली पाठ की मौलिकता अधिक प्रीतिकर सिद्ध होती है।
5-1-1 बंगाली वाचना के पञ्चमाङ्क में शकुन्तला अपने को परभृता कहने वाले दुष्यन्त को “अनार्य” कहती है और प्रचण्ड कोप करते हुए दुष्यन्त को ताडित करती है। यहाँ पर शकुन्तला की कोपाविष्ट मुखमुद्रा को देखते हुए दुष्यन्त ने दो श्लोकों का उच्चारण किया है:
राजा – (स्वगतम्) वनवासाद् अविभ्रमः पुनरत्रभवत्याः कोपो लक्ष्यते। तथाहि
न तिर्यगवलोकितं, भवति चक्षुरालोहितं
वचोऽपि परुषाक्षरं न च पदेषु संसज्जते।
हिमार्त इव वेपते सकल एष बिम्बाधरः,
स्वभावविनते भ्रुवौ युगपदेव भेदं गते॥ 5-23
अथवा, संदिग्धबुद्धिं माम् अधिगत्वाकैतवच्छायया कोपोऽस्याः। तथाह्यनया–
मय्येव विस्मरणदारुणचित्तवृत्तौ,
वृत्तं रहः प्रणयम् अप्रतिपद्यमाने।
भेदाद् भ्रुवोः कुटिलयोरतिलोहिताक्ष्या
भग्नं शरासनमिवातिरुषा स्मरस्य॥ 5-24
(प्रकाशम्) भद्रे, प्रथितं दुःषन्तचरितम् प्रजासु। नापीदं दृश्यते।
यहाँ देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में केवल दूसरा श्लोक ही संचरित होकर आया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पहलेवाले (5-23) श्लोक को उनमें से हटाया गया है, ऐसा दिखता है। मैथिली वाचना के पाठ में भी यही दो श्लोक मिलते हैं, लेकिन वहाँ दूसरा श्लोक “अथवा” से अवतारित नहीं है। वहाँ “अपि च” निपात से दूसरे श्लोक को बाँधा गया है। अतः दो बातें परीक्षणीय हैं (1) क्या इन दोनों श्लोकों के प्रतिपाद्य विषय को प्रस्तुत करने के लिए यहाँ “अथवा” का प्रयोग उचित है या “अपि च” का प्रयोग सुसंगत