अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें82 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
आश्रम में आना।$^{54}$ यहाँ पर शान्त्यै (शान्ति के लिए) को समझाते हुए टीकाकार चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-मोक्षार्थम्। दुष्यन्त-शकुन्तला जब आप्तकाम हो जाय तब मोक्षार्थ इस आश्रम में वापस आने को कहनेवाला तपस्वी तात कण्व “अपि च” से पूर्वोक्त श्लोक द्वारा पुत्री को शोक न करने का उपदेश दे वह सर्वथा मौलिक प्रतीत होता है। नाटक के अन्तिम भरत-वाक्य में भी कवि ने लिखा है कि “सरस्वती श्रुतिमहती/ श्रुतिमहतां महीयताम्।” इसको देखते हुए भी काश्मीरी वाचना का उपर्युक्त श्लोक मौलिक दिख रहा है एवं मैथिली वाचना को छोड़ कर अन्यत्र (बंगाली, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में) उसको बेशक हटाया गया है।
5-1-0 पञ्चमाङ्क का आरम्भ कहाँ से होता है, इस प्रश्न को लेकर बंगाली पाठ और देवनागरी के पाठ की वस्तुस्थिति का आकलन किया जाय तो (क) बंगाली पाठ में अंक कञ्चुकी की उक्ति से आरम्भ होता है, उसके बाद हंसवती का गीत आता है और तत्पश्चात् शकुन्तला-प्रत्याख्यान निरूपित किया गया है। (ख) देवनागरी पाठ में हंसपदिका के गीत से अंक आरम्भ होता है, द्वितीय क्रम में कञ्चुकी की उक्ति आती है, और तत्पश्चात् शकुन्तला-प्रत्याख्यान रखा गया है। अद्यावधि विद्वत्समूह ने इन दोनों तरह के पाठों की साहित्यिक-आलोचना की है। जैसे, शकुन्तला के प्रत्याख्यान की पार्श्वभूमिका में रखे गये हंसपदिका के गीत से दुष्यन्त के मन में जननान्तर सौहृद झंकृत होने पर पर्याकुल हुई मानसिकता को जिम्मेवार माना जाय या फिर वैतालिकों के गान से कर्तव्यनिष्ठ बनी राजा की मानसिकता को जिम्मेवार माना जाय। इन दोनों स्थितियों में से किसी एक का चयन किया जाय ऐसा कहना तो आसान है लेकिन इस तरह की साहित्यिक आलोचना के द्वारा पाठ की मौलिकता निश्चित नहीं की जा सकती क्योंकि उसमें विवेचक की आत्मलक्षिता सुतराम् प्रविष्ट होती है। यहाँ तो उपलब्ध द्विविध पाठों में से पूर्वापर स्थित वाक्यों की संगति का समीक्षण ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में निर्णायक बन सकता है।
निम्न स्तरीय पाठालोचना के फलस्वरूप हमें पूर्वोक्त दो तरह की पाठपरम्परा ज्ञात हुई है। प्रथम, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनानुसारी योजना में दुष्यन्त को देख कर कञ्चुकी जब बोलता है कि “तथापीदानीमेव धर्मासनाद् उत्थिताय पुनरुपरोधकारि कण्वशिष्यागमनमस्मै नोत्सहे निवेदयितुम्।” तब वह संगतिपूर्ण नहीं लगता है। राजा ने तो धर्मासन से उठ कर संगीतशाला में जाकर हंसपदिका का गीत सुना है। दूसरा, इस तरह की योजना में “रम्याणि वीक्ष्य०” सुनकर जननान्तर सौहृद का अनुभव करने के पश्चात् पर्याकुल स्थिति का अभिनय करते हुए राजा को बहुत देर तक रंगमंच पर खड़े रहना है क्योंकि उसके पीछे आ रही कञ्चुकी की उक्ति अनेक श्लोकों से एवं गद्य संवाद से भरी है। यहाँ बेचैन
- भूत्वा चिराय सदिगन्तमहीसपत्नी, दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं प्रसूय। तत्सन्निवेशितधुरेण सहैव भर्त्रा, शान्त्यै करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन्।। अ.शां. 4-22