अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 75
प्रक्षिप्त मानना चाहिए ऐसी बात कही थी। उनका कहना था कि पूर्वार्ध में जो वर्णन है वह प्राभातिक समय का आकलन करने के लिए उपयुक्त नहीं है। यदि सूर्य आविष्कृत हो ही गया है तो फिर “होमवेला हो गयी है, चलो गुरु को उसका निवेदन किया जाय” ऐसा कहना सुसंगत नहीं है। यदि इस श्लोक में “आविष्कृतारुण” ऐसे सामासिक शब्द को पाठान्तर के रूप में लिया जाय तो व्यसनोदय के यौगपद्य का कथन दूषित होता है। तथा इस श्लोक में प्रक्रमभङ्ग दोष भी हो रहा है, इस लिए इन दोनों श्लोकों का मौलिक होना सम्भव नहीं है।
दूसरे पक्ष में, याने काश्मीरी वाचनानुसारी पाठ में अन्य दो (कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं०) श्लोकों को स्वीकार किया गया है। यहाँ सब से पहले यह कहना होगा कि ब्राह्मी लिपि से निकली हुई अन्यान्य लिपियों में शारदा लिपि का क्रम बंगालीलिपि की अपेक्षा से पहले है। अतः उसमें संचरित हुई पाठपरम्परा को अधिक श्रद्धेय एवं प्राचीनतम मानना होगा। फिर भी इसकी मौलिकता पर तर्कपूर्ण विचार करना होगा। देवनागरी की तुलना में देखा जाय तो काश्मीरी वाचनावाले दोनों श्लोकों में मन्दाक्रान्ता छन्द का प्रयोग हुआ है, जो उस श्लोक में प्रकट किये गये शकुन्तला के भावी दुःख भरे दिवसों के साथ सुसंगत है। दूसरा, इन दोनों श्लोकों को भी “अपि च” निपात से बाँधा गया है, तथापि इन दो श्लोकों की निरूप्यमाण विषयवस्तु में पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि कर्कन्धूनाम्० वाले श्लोक की प्रासंगिकता जाँची जाय तो (= प्रभात के समय का आकलन करना) स्वयं स्पष्ट है, तथा पादन्यासं क्षितिधरगुरोः० वाले दूसरे श्लोक से प्राकरणिक अर्थ (=शकुन्तला की भावी अवदशा) का सूचन हो रहा है, और उसके साथ अनसूया की उक्ति का अनुसन्धान भी हो जाता है। परिणामतः यहाँ इन दोनों श्लोकों के बीच में जो “अपि च” का विनियोग हुआ है, वह भी समुच्चयार्थक के रूप में सुसंगत बैठता है। कण्वाश्रम के शिष्य ने पहले श्लोक में, यज्ञवेदी के प्राङ्गण में अपने सम्मुख जो चहलपहल हो रही है उसका चित्र खींचा है। दूसरे श्लोक में शिष्य ने ऊर्ध्व दृष्टि करके देखा तो चन्द्रमा का पतन हो रहा है, उसका वर्णन किया है। कालिदास किसी भी दृश्य की द्विपार्श्वी रमणीयता को वर्णित करने के लिये “अपि च” का प्रयोग करते हैं, ऐसा जो पहले कहा गया है उसका चारितार्थ्य इन दो श्लोकों में ही सिद्ध होता है। इस दृष्टि से इन (कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं०) दोनों श्लोकों की ही मौलिकता सिद्ध होती है।
पूर्वोक्त चार श्लोकों में से (देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में जिन दोनों को मान्यता मिली है वे) दो श्लोक प्रक्षिप्त होने के प्रमाण मिल रहे हैं और अन्य दो श्लोकों (जिनको काश्मीरी वाचना में मान्यता मिली है उन)का मौलिक होना प्रतीत होता है तो अब प्रश्न होगा कि यह बात कैसे बनी कि बंगाली वाचना में चारों श्लोक एक स्थान पर हाजिर हो गये? इस प्रश्न का उत्तर बंगाली वाचना में से नहीं मिल सकता है। उसके लिए तो इस