भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 262 में से

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पृष्ठ 88

74 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

सोऽयं चन्द्रः पतति गगनादल्पशेषैर्मयूखै-
रत्यारूढिर्भवति महतामप्यपभ्रंशनिष्ठा⁵⁰ ।। 4-5
(द्विवेदी, 2008)

बंगाली वाचना के पूर्वनिर्दिष्ट चार श्लोकों का एक साथ होना सम्भव नहीं लगता है, क्योंकि नाटक जैसी समय सीमा में आबद्ध कला में इतना लम्बा वर्णन असह्य होता है। एवमेव, यहाँ तो कण्वाश्रम का शिष्य केवल प्रभातकाल का आकलन करने के लिए इन श्लोकों का गान करता है। इस सन्दर्भ को देखते हुए यहाँ चार चार श्लोकों का होना सम्भव नहीं है। मतलब कि यहाँ बंगाली वाचना पाठ मौलिकता के नजदीक नहीं लगता है। अतः अन्य वाचनाओं में इस स्थान की क्या स्थिति है? इसको ध्यान में लेकर पाठालोचना शुरू करनी होगी। जैसे, उपर्युक्त चार श्लोकों में से पहले दो “याति”० एवं “अन्तर्हिते”० श्लोकों को देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं ने मान्य किया है। तथा काश्मीरी वाचना ने केवल “कर्कन्धूनाम्”० और “पादन्यासं”० को ही मान्य किया है। अर्थात् इन दोनों वाचनाओं में केवल दो दो श्लोकों को ही स्थान मिल पाया है। परन्तु दोनों वाचनाओं ने जिन दो श्लोकों को मान्य रखा है वे दोनों भिन्न-भिन्न श्लोक हैं। अलबत्ता चार चार श्लोकों को स्वीकारनेवाली बंगाली पाठपरम्परा की अपेक्षा से केवल दो ही श्लोकों को मान्य करनेवाली वाचनाओं को ही बेहतर मानना होगा। अतः यहाँ सोचना होगा कि केवल दो दो श्लोकों को प्रस्तुत करनेवाली देवनागरी एवं काश्मीरी जैसी वाचनाओं में से किस का पाठ मौलिक, अर्थात् कालिदास-प्रणीत होगा?

देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में जिन दो श्लोकों को (“याति”० एवं “अन्तर्हिते”०) स्थान मिला है, उन दोनों में शकुन्तला के भावी दुर्दैव का सूचन रखा गया है, किन्तु किसी भी नाट्यकृति में विचारों की पुनरुक्ति करने में समय की हानि होती है, जो नाट्यकला में असह्य मानी गयी है। दूसरा, इन दोनों श्लोकों को “अपि च” निपात से बाँधा गया है, लेकिन “अपि च” के विनियोग का पूर्वोक्त स्वारस्य यहाँ घटित नहीं होता है। तीसरा, इन श्लोकों में जो वसन्ततिलका छन्द का विनियोग हुआ है, वह विरह, करुणा, दुःख भरे भावों की अभिव्यक्ति के लिए संगत नहीं बैठता है। इन श्लोकों में तो शकुन्तला के भावी दुःख का सूचन किया जा रहा है, अतः यहाँ वसन्ततिलका जैसे छन्द को देख कर भी यह सूचित होता है कि ये कालिदास-प्रणीत नहीं हो सकते हैं।

इसी तरह से, भूतकाल में आचार्य शरदरञ्जन राय (राय, 1908) ने भी इन दोनों को


50. (अनुवाद)– जिस (इन्द्र) ने पर्वतराज सुमेरु के सिर पर पादन्यास पर अँधियारी दूर करते हुए भगवान् विष्णु के दूसरे धाम पर विचरण किया था वही चन्द्र अब बहुत कम बची किरणों के साथ आकाश से गिर रहा है। अत्यारूढि बड़ों को भी पतन का मुख दिखलाती है। –कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2) अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जयिनी, 2008, पृ. 398