अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 73
या किस में प्रक्षेप हुआ होगा, अथवा किस वाचना के पाठ में संक्षेप हुआ होगा?। बंगाली वाचना के पाठ में, चतुर्थाङ्क के आरम्भ में प्रभात वेला का आकलन करने के लिए शिष्य पर्णकुटीर से बाहर निकल कर जिन चार श्लोकों का गान करता है, वे निम्नोक्त हैं
यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीनाम्,
आविष्कृतोऽरुणपुरःसर एकतोऽर्कः।
तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां,
लोको नियम्यत इवैष दशान्तरेषु⁴⁷।।4-2
अपि च-
अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे
दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।
इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनेन
दुःखानि नूनमतिमात्रदुरुद्वहानि⁴⁸।।4-3
अपि च-
कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रञ्जयत्यग्रसन्ध्या
दार्भं मुञ्चत्युटजपटलं वीतनिद्रो मयूरः।
वेदिप्रान्तात् खुरविलिखिताद् उत्थितश्चैष सद्यः,
पश्चादुच्चैर्भवति हरिणः स्वाङ्गमायच्छमानः⁴⁹।।4-4
अपि च-
पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि कृत्वा सुमेरोः
क्रान्तं येन क्षयिततमसा मध्यमं धाम विष्णोः।
- (अनुवाद)-एक ओर चन्द्रमण्डल अस्तशिखर को पहुँच रहा है और एक ओर अरुण को आगे किये उदित हो रहा है सूर्य। दो तेज और दोनों का एक साथ व्यसन (अस्त) तथा अभ्युदय। इनसे लोक को शिक्षा मिलती है अपनी दशा बदलने की। कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
- (अनुवाद)-चन्द्र डूब गया तो वही कुमुद्वती अब आँखों को आनन्दित नहीं कर रही है। इष्ट (प्रिय) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अबलाओं को अत्यन्त दुःसह होते हैं।-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
- (अनुवाद)-और देखो बेरों के ऊपर पड़ी ओस को उषाकाल रंग रहा है, जागा मोर लकड़ी के उटज पटल को छोड़ रहा है, खुरों से खुदे वेदिका के छोर से हाल ही उठ खड़ा हुआ मृग अपने शरीर को लम्बा खींचते हुए पिछले भाग से ऊँचा हो रहा है-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 398