भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 262 में से

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पृष्ठ 86

72 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

उचित है। (2) यह दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त होने का प्रमाण यह भी है कि शुरू में बताया गया है कि शकुन्तला को (स्वयं) सौभाग्यदेवता अर्चन भी करना है इस लिए कुछ ज्यादा पुष्पों का चयन किया जाय। इस पूर्वोक्त सन्दर्भ के विरुद्ध जब बोला जाता है कि-एहि, देवकार्यं तावद् अस्याः (शकुन्तलायाः) निर्वर्तयाव। तब वह असंगत सिद्ध होता है। क्योंकि शकुन्तला के बदले में सहेलियाँ ही उसके लिए देवकार्य सम्पन्न करने के लिए उद्यत हो जाती हैं। और देवता के पास न जा कर वे दोनों पहुँचती तो वहीं हैं जहाँ शकुन्तला अन्यमनस्क होकर बैठी है! अतः, मैथिली वाचना में दोनों सहेलियों के रंगमंच पर परिक्रमण को दिखलाते हुए जो एक अधिक वाक्य मिलता है, वह प्रक्षिप्त ही है। जिसका अनुसरण करते हुए बंगाली वाचना में, (और तदनन्तर देवनागरी इत्यादि में भी) प्रियंवदा की उक्ति अनसूया की बन जाती है।

शाप-मोचन का उपाय माँग कर अनसूया वापस आकर सब बात बताती है तो प्रियंवदा कहती है कि दुष्पन्त ने हस्तिनापुर जाते समय शकुन्तला को अङ्गूठी दी है जिससे वह स्वाधीनोपाय है, अब चिन्ता का कोई कारण नहीं है। तब प्रियंवदा से यह बात जान कर अनसूया ने जरूर इतनी सावधानी बरती है कि उसने शकुन्तला से वह अङ्गूठी किसी भी तरह से प्राप्त करके सुरक्षित करली है, और चतुर्थाङ्क के अन्त में (दोनों वाचनाओं के पाठ के अनुसार) अभिज्ञानाभरण रूप उस राजमुद्रा को शकुन्तला के हाथ में अनसूया ने ही सौंप दिया है। क्योंकि उसी अनसूया ने दुर्वासा के मुख से प्रत्यक्ष में सुना था कि किसी अभिज्ञानाभरण से ही शाप की निवृत्ति होगी। इस लम्बी चर्चा से सारभूत बात यह निकलती है कि (1) शाप-मोचन माँगने के लिये अनसूया का जाना-वही मौलिक सिद्ध होता है तथा (2) शाप की बात छुपा के रखने का प्रस्ताव अनसूया का नहीं हो सकता, वह प्रियंवदा का ही है। बंगाली पाठ में पहली बात सुरक्षित रही है, लेकिन दूसरी अशुद्धि का प्रवर्त्तन मैथिली परम्परा में हुए प्रक्षेप के कारण हुआ है। परिणामतः तीसरे स्तर पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठों में दोनों तरह की अशुद्धियाँ संक्रान्त होकर सर्वत्र प्रसारित हो गयी होंगी।

अब एक छोटी सी आवश्यक स्पष्टता की जाती है: मौलिक पाठ में विचलन होने का क्रम काश्मीरी से शुरू करके, दूसरे स्तर पर मैथिली है और तदनन्तर तृतीय स्तर पर बंगाली वाचना है ऐसा मन्तव्य कहाँ से प्राप्त हुआ है? ऐसा प्रश्न किया जाय तो उसका सप्रमाण उत्तर अनुगामी अनुच्छेद में होने वाला है।

4-1-1 चतुर्थाङ्क में श्लोक-संख्या 21 से 26 तक की मिलती है। जैसे, मैथिली वाचना में 26 श्लोक हैं, तो बंगाली वाचना में 24 श्लोक हैं। किन्तु राघवभट्ट की देवनागरी वाचना में केवल 21 श्लोक प्राप्त होते हैं। इस तरह की कम-ज्यादा श्लोकसंख्या ही हमें विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि किस वाचना में मौलिक पाठ सुरक्षित रहा होगा,