भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 262 में से

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पृष्ठ 85

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 71

पाठालोचना के अनुसार तो बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतर है। और कश्मीर की शारदा लिपि में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतम होने का दावा करता है, क्योंकि बंगाली-लिपि से पहले शारदा-लिपि का प्रचलन हुआ था। किन्तु लिपियों की ऐतिहासिकता से बाहर निकलकर सोचा जाय तो भी यहाँ पर अनसूया का स्वभाव अधिक स्थिर और काबिल होने से वही दुर्वासा के पास पहुँचे उसमें औचित्य है। देवनागरी पाठ के अनुसार यदि अनसूया के द्वारा प्रियंवदा को इस कार्य के लिए भेजा जाता है तो वह उसके नटखट चरित्र के साथ संगत नहीं होता है। अतः शाप-मोचन के लिए, बंगाली पाठानुसार अनसूया को ही भेजा जाय वही मौलिक प्रतीत होता है। और इसके प्रतिपक्ष में, याने देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में, शाप-मोचन की याचना के लिये प्रियंवदा का जाना पाठ-विकृति का परिणाम लगता है। क्योंकि वह प्रियंवदा के चरित्र के अनुरूप नहीं है।

इस प्रसंग का पूर्वार्द्ध बंगाली पाठ में भले ही सुरक्षित रहा हो, किन्तु जैसे ही हम आगे चल कर देखते हैं तो उसमें भी इस प्रसंग का उत्तरार्ध दूषित हुआ है ऐसा दिख रहा है। जैसे, शकुन्तला को जो शाप मिला है उसको छुपा कर रखने का प्रस्ताव अनसूया ने रखा है। यह बात अनसूया की प्रकृति के अनुरूप नहीं लगता है। इस विसंगति को समझने के लिए अवशिष्ट रही मैथिली एवं काश्मीरी वाचना के पाठ को देखना होगा। मैथिली में तो बंगाली पाठ जैसा ही चित्र है। केवल काश्मीरी पाठ में ऐसा है कि दुर्वासा के शाप की बात दो सहेलियों के बीच संगोपित रखने का प्रस्ताव प्रियंवदा के द्वारा रखा जाता है। तुलनात्मक अभ्यास से यह बात साफ प्रकट होती है कि काश्मीरी पाठ में शापमोचन के लिए अनसूया जाती है और शाप को छुपा कर रखने की बात प्रियंवदा कहती है। लेकिन इस काश्मीरी पाठ का जब मैथिली में संक्रमण हुआ होगा तब अनसूया के मुख में एक अधिक उक्ति का प्रक्षेप किया गया है: “एहि देवदाकज्जं दाव णिव्वुत्तमह। (इति परिक्रामतः।)” । (अर्थात् चलो हम दोनों उसका यानि शकुन्तला का देवकार्य सम्पन्न करें। ऐसा एक अधिक वाक्य बोलकर दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करती हैं।) किन्तु इस नये अधिक वाक्य के कारण उसके पीछे आ रही तीनों उक्तियों की वक्ता उलटा-पुलटा हो जाती हैं। जिसके कारण शाप को छुपा के रखने की बात, जो मूल में प्रियंवदा ने की थी, वह अनसूया के मुख में आ जाती है। मैथिली वाचना में मिल रहा उपर्युक्त एक अधिक वाक्य प्रक्षिप्त है ऐसा मानने का आधार क्या है? तो उसके दो समाधान हैं: (1) दुर्वासा का शाप मिलने जैसी भूकम्पीय घटना आकारित हो जाने के बाद उसकी छाया से बाहर निकलकर क्या अनसूया देवता-कार्य के निर्वर्तन को याद करने की मानसिकता में रह सकती है? यह सम्भव ही नहीं है। अतः काश्मीरी वाचना के पाठ में जैसे प्रियंवदा कहती है कि हमारी सखी को राजा ने अङ्गूठी दे रखी है, उससे वह स्वाधीनोपाय है। तब दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करके सीधा उसी कुटीर पर जाय (जहाँ शकुन्तला अपने प्रिय के विचारों में खोई खोई बैठी है) वही