अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें64 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मृगया-विहारी दुष्यन्त का कण्वमुनि के आश्रम में प्रवेश होते ही-न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन्... शब्द सुनायी पड़ते हैं, वैसे ही सप्तमाङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त मारीच के आश्रम में प्रवेश करता है और वहाँ “मा चापलम् कुरु। कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम्,” ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। यहाँ प्रथमाङ्क में शिकारी दुष्यन्त का जो एक रूप प्रस्तुत किया था, उसका ही दूसरा प्रतिरूप सिंहबाल के साथ खेल रहे सर्वदमन का खड़ा किया गया है। इस तरह महाकवि ने सम्पूर्ण कृति में एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप (एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिदृश्य) खड़ा करने की स्पृहणीय नाट्य-शैली का मार्ग अपनाया है। यह नाट्य-शैली भी हमारे लिये कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य बन सकती है और उसके आधार पर बंगाली (मैथिली और काश्मीरी) वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला की दृष्टि कर्णोत्पल रेणु से कलुषित होने का जो प्रसंग वर्णित किया गया है उसका समर्थन किया जा सकता है। जैसे तृतीयाङ्क में दुष्यन्त ने अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि निर्मल कर दी थी, उसी एक दृश्य के सामने, षष्ठाङ्क में कवि ने दूसरा प्रतिदृश्य भी खड़ा किया है। धीवर के पास से जब मुद्रिका मिल जाती है और दुष्यन्त को शकुन्तला का पुनःस्मरण हो जाता है तब शकुन्तला का चित्रांकन करते हुए वह एक श्लोक बोलता हैः
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
<p align="right">6-17</p>
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निर्मातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
इसमें कहा गया है कि मुझे (दुःषन्त को) इस चित्र में बह रही मालिनी नदी की बालुका में बैठा एक हंस-मिथुन आकारित करना है। हिमालय की उपत्यका में बैठे चमरों के समूह को बनाना है। वृक्ष की डालियों पर कुछ वल्कल वस्त्र टँगे हों एवं उस वृक्ष के अधो भाग में कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई एक हरिणी भी चित्रित करने की चाहत हो रही है। यहाँ “कण्डूयमानां मृगीम्” का जो चित्र बनाने की इच्छा प्रकट की गयी है वह निरतिशय व्यञ्जनापूर्ण है। षष्ठाङ्क में वर्णित इस प्रसंग का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से तृतीयाङ्क में निरूपित शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने के प्रसंग के साथ ही है। वहाँ पर दुष्यन्त ने जब अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि को निर्मल कर देने का प्रस्ताव रखा था, तब शकुन्तला ने कहा था कि मेरे मन में तुम्हारे लिये विश्वास नहीं है। किन्तु अब दुष्यन्त इस चित्र से व्यंजित करना चाहता है कि वह अब शिकारी के रूप में शकुन्तला को प्राप्त करना नहीं चाहता अपितु हरिणीस्वरूपा शकुन्तला का सगन्ध और विश्वसनीय हरिण बनके, शकुन्तला का जीवनाधार बनना चाहता है। दुष्यन्त ने तृतीयाङ्क के उसी प्रसंग को स्मरण-पट पर रख कर एक प्रतिदृश्य के रूप में, यह “कण्डूयमानां मृगीम्” का चित्र बनाने