अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशाकुन्तलम् प्रस्तावना 63
“जीवितेश्वरी” और “आर्यपुत्रः” कहा है, वह क्षण दाम्पत्य भाव का अनुभव प्रदर्शित करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आगे चल कर जब षष्ठाङ्क में (दुष्यन्त-नामधेयाङ्किता मुद्रिका मिल जाने के बाद) अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों के सामने दुष्यन्त के मुख से कदाचित् “गोत्र-स्खलन” हो जाता है, ऐसा निरूपण आता है⁴⁴, तो वह बिलकुल निराधार नहीं लगता।
किन्तु देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तो यह मृणाल-वलय का प्रसंग नहीं है। अतः वहाँ षष्ठाङ्क में गोत्र-स्खलन का जब निर्देश आता है तब उसका कोई पूर्व-निर्दिष्ट आधार नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यही है कि बंगाली वाचना में मृणाल-वलय का प्रसंग है और उस प्रसंग के निमित्त से दोनों के चित्त में जो सहज दाम्पत्यभाव प्रकट हुआ था उससे ही षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से अनजान में होनेवाले गोत्र-स्खलन की स्वाभाविकता प्रतीतिकर बनती है। इस तरह षष्ठाङ्क में आनेवाले गोत्र-स्खलन का निर्देश हमारे लिये मृणाल-वलय के प्रसंग का समर्थक प्रमाण बनता है।
3-1-8 (ग) बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में प्रक्षिप्त माने गये दूसरे प्रसंग की, अर्थात् शकुन्तला की दृष्टि पुष्परज से कलुषित होने पर दुष्यन्त द्वारा अपने वदन-मारुत से निर्मल करने के प्रसंग की मौलिकता भी कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य से समर्थित होती है। यहाँ प्रथमतः यही बात विचारणीय है कि शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने जैसे किसी प्रसंग की हम अपेक्षा रख सकते हैं या नहीं? प्रथमाङ्क में वृक्षसेचन के दौरान परिश्रान्त हुई शकुन्तला का वर्णन करते हुए दुष्यन्त ने कहा है, स्रस्तं कर्णाशिरीषरोधि वदने घर्माम्भसां जालकं, बन्धे स्रंसिनि चैकहस्तयमिताः पर्याकुला मूर्धजाः (शाकु. 1-26, राघवभट्ट, पृ. 47) अर्थात् शकुन्तला अपने कर्णों में शिरीष पुष्पों को लगाती थी। इसीलिये षष्ठाङ्क में शकुन्तला का चित्र अंकित करते हुए दुष्यन्त ने फिर कहा है, कृतं न कर्णापितबन्धनं सखे, शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम्। न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे।। (शाकु. 6-18, राघवभट्ट, पृ. 213) इस तरह शकुन्तला अपने कानों में प्रसाधन के रूप में पुष्प लगाती थी, और इसी लिये कदाचित् उसके नेत्र में पुष्परेणु गिरने की सम्भावना (एवं नाटकीय अपेक्षा) थी। लेकिन यहाँ ऐसा प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या ऐसा कोई प्रसंग महाकवि ने ही अपने हाथों से लिखा होगा? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उच्च स्तरीय समीक्षा को मान्य हो ऐसा कोई प्रमाण देना आवश्यक है।
महाकवि कालिदास ने इस नाट्यकृति की दृश्यावली में सर्वत्र एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की जिस कलात्मक सर्जनविधा का साद्यन्त विनियोग किया है उसकी ओर सब का ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत है। उदाहरण के रूप में-प्रथमाङ्क में
- दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा, गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्।
शाकु. 6-5 (राघवभट्ट, पृ० 195)