अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 65
की इच्छा प्रकट की है। इस तरह एक दृश्य के सामने दूसरा परिदृश्य खड़ा करने की जो निरूपण-शैली समग्र कृति में बार बार दिखायी देती है उसको तार्किक रूप से ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में स्वीकारना चाहिए। इस आधार पर पुष्परज से शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने का जो प्रसंग है वह प्रक्षिप्त नहीं है, बल्कि सर्वथा मौलिक है ऐसा मानना ही चाहिए।
3-1-9 तृतीयांक के अन्त भाग में भी एक उपान्त्य श्लोक का प्रक्षेप दिख रहा है। शकुन्तला को ले कर गौतमी चली गयी। दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलयाच्छादित वेतसगृह में खड़ा खड़ा उसके मन्मथलेख इत्यादि पर सानुराग दृष्टि से झाँक रहा है और कहता है कि मुझसे इस वेतसगृह से बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसी प्रेमासक्त दशा में फँसे नायक को रंगमंच से निकालने के लिए नाट्यकार कालिदास उसके वीरत्व को ही टटोलते हैं। अतः नेपथ्योक्ति है “भो भो राजन्, सायन्तने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते०” (श्लोक-41) अर्थात् सायंकाल होते ही यज्ञकर्म में बाधा डालने के लिए काले-पीले वर्ण के राक्षसों की छायायें आकाश में मंडराने लगी हैं। इसको सुनते ही दुष्यन्त के वीरत्व को चुनौती मिलती है और वह रंग से बाहर दौड़ जाता है। कालिदासीय नाटकों में अन्यत्र भी दिखनेवाली यह पद्धति पूर्ण रूप से नाटकीय है। किन्तु बंगाली वाचना में दुष्यन्त की उक्ति और नेपथ्योक्ति में व्यवधान बननेवाला श्लोक-40 अस्वाभाविक लगता है। जिसमें दुष्यन्त कहता है कि-
रहः प्रत्यासत्तिं यदि सुवदना यास्यति पुन-
र्न कालं हास्यामि प्रकृतिदुरवापा हि विषयाः।
इति क्लिष्टं विघ्नैर्गणयति च मे मूढहृदयं
प्रियायाः प्रत्यक्षं किमपि च तथा कातरमिव॥
3-40
धीरोदात्त चरितवाले नायक के मुख में विषयोपभोग की लालसा प्रकट (या अप्रकट) शब्दों में प्रस्तुत होना दो दृष्टियों से अनुचित है। 1. मूल महाभारत के दुष्यन्त में जो विषयोपभोग के प्रति उतावलापन दिखता है, उसका परिमार्जन करते हुए कालिदास ने हमारे सामने एक धीरोदात्त नायक, जिसको वह नाटक के आरम्भ में ही साक्षात् पिनाकी की उपमा देते हैं, रेखांकित करना चाहता है। उसके मुँह में उपर्युक्त श्लोक के शब्द संगत नहीं बैठते हैं। तथा 2. नाटकीयता की दृष्टि से सोचा जाय तो प्रियासम्बद्ध तीन तीन चीजों को वेतसगृह में ही छोड़कर बाहर निकलना मुश्किल है ऐसा बोल बोले जाने पर ही परिस्थितिवशात् नायक को (प्रेमासक्त दशा को तत्क्षण छोड़ कर) अपनी क्षत्रियता को ललकारने वाली परिस्थिति के सामने लड़ने के लिए रंगभूमि से बाहर निकलने में ही नाटकीयता है। अतः प्रेमासक्त दशा का अनुरणन करनेवाला उपर्युक्त दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त ही मानना होगा।