भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 262 में से

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पृष्ठ 80

66 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

बंगाली वाचनावाले तृतीयांक के 3, 7, 11, 17, 24, 28 एवं 40 क्रमांक के श्लोक प्रक्षिप्त हो सकते हैं ऐसा अनेक कारणों से अनुमित हो रहा है। इस तरह से, कुल 41 श्लोकों में से प्रक्षिप्त 7 श्लोकों को निकाला जाय तो 34 श्लोकवाला परिमाण अवशिष्ट रहेगा, जो काश्मीरी वाचना के (और पाटण की 349/16630 एवं 169/6654 पाण्डुलिपियों⁴⁵ में संचरित हुए 11वीं शती के 33 या 34 श्लोकवाले) पाठ के साथ मिलता जुलता सिद्ध होगा।

3-2-1 देवनागरी वाचनावाले तृतीयांक के पाठ में संक्षेप हुआ है उसके दो-तीन प्रमाण हमारे सम्मुख पड़े ही हैं, उसे केवल आँख खोलकर देखने की जरूरत है। जैसे, 1. डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने बताया है कि दोनों सहेलियों के चले जाने के बाद दुष्यन्त ने कहा है कि अभी दिवस पूरा नहीं हुआ है, और लतामण्डप के बाहर तो कड़ी धूप है अर्थात् मध्याह्न का समय है। इस उक्ति के नीचे पाँच-छह संवाद के बाद तुरन्त नेपथ्य से आवाज आती है कि “चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्, उपस्थिता रजनी।” तो इस तरह की योजना में, अर्थात् मध्याह्न से लेकर रात्रि का प्रारम्भ होने तक का काल केवल पाँच-छह संवाद में ही दिखाना तर्कसंगत नहीं है। यह विसंगति किसी भी दर्शक को खटकनी ही चाहिए। सारभूत बात यही है कि, “अपरिनिर्वाणो दिवसः” और “रजनी उपस्थिता” के बीच में कुछ पाठ्यांश की कटौती हुई होगी ऐसा मानने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं। 2. अब इस बात का भी कोई सबूत मिलना आवश्यक है कि यदि कटौती हुई है तो दो कटे हुए भागों को कहाँ, कैसे जोड़ा गया है तथा उसका भी कोई निशान (पदचिह्न) देवनागरी वाचना में कहीं पर है या नहीं?। इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए तृतीयांक का निम्नोक्त श्लोक की ओर, जो केवल देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में ही मिलता है, ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यकता है:

राजा-

अपरिक्षतकोमलस्य यावत् कुसुमस्येव नवस्य षट्पदेन।
अधरस्य पिपासता मया ते सदयं सुन्दरि गृह्यते रसोऽस्य॥

<div align="right">3-21</div>

देवनागरी वाचना का प्रत्येक श्लोक सामान्यतया बंगाली आदि (बृहत्पाठ परम्परा) में मिलता है, लेकिन उपर्युक्त श्लोक तृतीयांक के इस मोड़ पर खड़ा है कि जो मूल पाठ में कटौती का स्थान है। अतः काटे हुए दो स्थानों को जोड़ने के लिए जिस श्लोक की नवीन रचना हुई है वह स्वाभाविक है कि बंगाली आदि वाचनाओं में नहीं होगा क्योंकि उसकी


  1. श्रीहेमचन्द्राचार्य ज्ञान-मन्दिर एवं वाडी पार्श्वनाथ का जैन भण्डार, जिला-पाटण, गुजरात में ये पाण्डुलिपियाँ संगृहीत हैं। उसकी ही वंशज पाण्डुलिपि एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद में 1948 क्रमांक पर है।