भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 262 में से

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पृष्ठ 81

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 67

रचना विशेष प्रयोजन से की गयी है। तथा यह श्लोक जिस छन्द में लिखा गया है वह भी हेमचन्द्राचार्य के द्वारा “मालभारिणी” के नाम से 12वीं शती में प्रथम बार अभिज्ञात किया गया है। (उससे पहले भी यह छन्द कालिदास के साहित्य में प्रयुक्त हुआ है, लेकिन वहाँ उसका अभिज्ञान “औपच्छन्दसिक” के नाम से किया जाता था।) अर्थात् शाकुन्तल के मूल पाठ में कटौती करने के बाद, दो भागों को जोड़ने के लिए जो नया श्लोक लिखा गया है, उसका छन्द भी ध्यानास्पद बनता है, क्योंकि राघवभट्ट जब उसकी मालभारिणी जैसे नये नाम से पहचान दे रहे हैं तब वह भी “यह श्लोक उत्तरवर्ती काल में लिखा गया होगा” इसका प्रमाण बन सकता है। 3. बंगाली वाचना में नायक–नायिका का जो प्रेमभरा सहचार वर्णित है उसमें मुख्य रूप से दो प्रसंग हैं। (क) दुष्यन्त ने शकुन्तला के हाथ में मृणालवलय रूप कंकण पहनाया है, तथा (ख) पुष्परज से कलुषित हुई उसकी दृष्टि को वदनमारुत से निर्मल कर दिया है। एवमेव, इन दोनों प्रसंगों के प्रवर्तन में दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” के रूप में उल्लिखित किया है, तथा शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” शब्द से सम्बोधित किया है। इससे दोनों के बीच में स्वाभाविक रूप से ही अपनेपन का भाव उदित हुआ है, और इससे सहज प्रेम का एक चित्र प्रस्तुत होता है। लेकिन देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में उपर्युक्त दोनों प्रसंगों को संक्षेपीकरण के आशय से हटाया गया है। अतः उस संक्षिप्त पाठ्यांश में से स्वाभाविक प्रेम का चित्र प्रस्तुत करनेवाले दोनों प्रसंग अदृश्य हो गये हैं। अब इन दृश्यों को हटाकर किसको स्थानापन्न किया गया है? इसकी भी जिज्ञासा होगी। तो यहाँ पर महाभारत के आदिपर्व में आये हुए शकुन्तलोपाख्यान (सम्भवपर्व, अध्याय–67) का अनुकरण करते हुए दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व–विवाह का प्रस्ताव, बल्कि कण्व के आने की प्रतीक्षा किये बिना ही शकुन्तला को गान्धर्व–विवाह का रास्ता बताते हुए उसको उकसाने जैसे प्रसंगों का सन्निवेश किया गया है। महाभारत के शब्द इस तरह के हैं:—

दुःषन्त उवाच— गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते॥4॥

शकु० उवाच— फलाहारो गतो राजन् पिता मे इत आश्रमात्।
तं मुहूर्तं प्रतीक्षस्व, स मां तुभ्यं प्रदास्यति॥5॥

दुःषन्त उवाच— इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि, त्वद्–गतं हि मनो मम॥6॥