अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें68 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः।।7।।⁴⁶
इसमें दुष्यन्त की भोगेच्छा इतनी प्रबल है कि कण्व मुनि नजदीक में ही फलाहार ढूँढने गये हैं ऐसा शकुन्तला के द्वारा कहे जाने पर भी वह उनकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता है। गान्धर्व-विवाह करने में धर्म का लोप नहीं होता है इत्यादि कह कर जैसे महाभारत में दुष्यन्त ने शकुन्तला को उकसाया है वैसे ही देवनागरी के परिवर्तित किये गये पाठ में भी गान्धर्व-विवाह वाले श्लोक का नवीन प्रक्षेप करके, शकुन्तला को उकसाया जाता है। नाटक में दुष्यन्त शकुन्तला को सहेलियों से भी सलाह-मशविरा करने के लिए अवकाश नहीं देता है। तथा अपरिक्षतकोमलस्य यावत्० इत्यादि शब्दों से (उपर्युक्त नवीन श्लोक में) दुष्यन्त रंगमंच पर शकुन्तला के अधरोष्ठ का रसपान करने की प्रकट शब्दों में माँग करता है, जो उसके महाभारत-वर्णित स्वरूप के साथ सुसंगत बैठता है। किन्तु वह कालिदास के द्वारा संकल्पित साक्षात् पिनाकिन् जैसे धीरोदात्त चरितवाले नायक से विरुद्ध लगता है। महाकवि कालिदास ने इस नाटक में जो उदात्त चरितवाला नायक निरूपित करने का उपक्रम रखा था उसको संक्षेपीकरण के सिलसिले में दुर्भाग्य से भुला दिया गया, और फिर से महाभारत का भोगेच्छुक और उतावलापन दिखानेवाला दुष्यन्त देवनागरी शाकुन्तल में हाजिर हो गया। साथ में दूसरा दुर्भाग्य यह भी प्रकट हुआ कि यह गान्धर्वेण विवाहेन०वाला देवनागरी वाचना का श्लोक बंगाली एवं मैथिली परम्परा में भी चुपके से प्रविष्ट हो गया। (क्योंकि वह मूल महाभारत में था।) अतः बंगाली पाठ में स्वाभाविक और निर्मल प्रेम का चित्र होने के साथ साथ, उक्त प्रक्षेप के कारण, अधीर दुष्यन्त भी दृश्यमान होने लगा। निष्कर्षतः 1. देवनागरी वाचना के पाठ में से (संक्षिप्तीकरण के कारण) स्वाभाविक प्रेम का चित्र गायब हो गया और महाभारत के भोगेच्छुक दुष्यन्त का पुनरागमन हुआ तथा 2. बंगाली वाचना में स्वाभाविक चित्र यथावत् रहते हुए भी महाभारत का उतावलापन दिखाता हुआ, गान्धर्व-विवाह का रास्ता जताता हुआ, भोगेच्छा को मुखरित करता हुआ दुष्यन्त भी आकारित किया गया। पहले में संक्षेपजनित क्षति है, तो दूसरे में प्रक्षेपजनित विकृति है। किन्तु दोनों परम्पराओं की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने से इन दोनों को, याने संक्षेप और प्रक्षेप को पहचाना जा सकता है। यदि उसे नहीं पहचानेंगे तो कालिदास के अभिमत नायक को हम नहीं देख सकेंगे। (आज पाण्डुलिपियों में संचरित हुए देवनागरी पाठ में महाभारत का दुष्यन्त है और उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के पाठ में दो रूपवाला दुष्यन्त दिखायी दे रहा है।)
3-2-2 देवनागरी वाचना में संक्षेप का दूसरा प्रमाण भी सरलता से देखा जा सकता
- महाभारते आदिपर्वणि, सम्भवपर्वणि अध्यायः 67 (श्लोकाः 4, 5, 6 एवं 7) भण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पुणे, 1933