भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 262 में से

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पृष्ठ 83

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 69

है। यहाँ तृतीयांक का जो उपान्त्य श्लोक है उसमें, “हस्ताद् भ्रष्टं बिसाभरणम्” शब्दों के होते हुए भी शकुन्तला के हाथ से गिरते हुए किसी मृणाल-वलय का निर्देश नहीं है। दूसरी ओर अङ्क के आरम्भ में तो कहा गया था कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना है वह प्रशिथिल है लेकिन उसके गिरने का प्रसंग देवनागरी पाठ में कहीं है ही नहीं, जो संक्षिप्त किये गये पाठ का सबल प्रमाण बनता है।

3-2-3 देवनागरी पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण भी कुत्रचित् मिलते हैं। जैसे कि तृतीयांक में जब शकुन्तला ने कहा कि उसे उस राजर्षि की अनुकम्पा का भाजन बनाया जाय तब दोनों सहेलियों ने उसे अभिनन्दन देने का विचार किया। क्योंकि शकुन्तला जिसमें आसक्त हुई थी वह पौरवों में ललामभूत था। प्रियंवदा की उक्ति है-सखि, दिष्ट्या अनुरूपस्ते अभिनिवेशः। सागरम् उज्झित्वा कुत्र वा महानदी अवतरति। क इदानीं सहकारम् अन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते। यहाँ दो उपमानों से शकुन्तला का अभिनन्दन किया जा रहा है। परन्तु उसमें एक ही विचार की पुनरुक्ति भी हो रही है। इसके सामने बंगाली वाचनानुसारी पाठ में दूसरा वाक्य है ही नहीं। अब इससे भी सिद्ध होता है कि देवनागरी के पाठ में पुनरुक्ति रूप दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त है।

4-0-1 बंगाली वाचना और देवनागरी-दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में, चतुर्थाङ्क के प्रारम्भ में ही एक महत्त्वपूर्ण भेद यह मिलता है कि अन्यमनस्का शकुन्तला को दुर्वासा मुनि शाप देकर चल पड़े तब उनसे शापमुक्ति की याचना करने के लिए कौन जाता है, अनसूया या प्रियंवदा?। प्रथम वाचना के मुताबिक अनसूया जाती है और द्वितीय वाचनानुसार प्रियंवदा जाती है। दोनों सहेलियाँ पुष्पावचयन कर रही थीं तब उन्होंने सुना कि आश्रम के द्वार पर कोई अतिथि आकर खड़े थे और उन्होंने शकुन्तला को शाप दे दिया है। बंगाली वाचना में, इस प्रसंग के जो संवाद अनसूया के मुख में रखे गये थे वे सब देवनागरी वाचना में पलट कर प्रियंवदा के मुख में रखे गये हैं। जैसे (बंगाली वाचना में)-

प्रियंवदा—को अण्णो हुदवहादो दहिदुं पहवदि। ता गच्छ। पादेसुं पडिअ णिअत्तावेहि जाव से अहं पि अग्घोदअं उवकप्पेमि। (कोऽन्यः हुतवहाद् दग्धुम् प्रभवति। तद्गच्छ। पादयोः पतित्वा निवर्तय यावद् अस्याहमर्घ्योदकं उपकल्पयामि।)

अनसूया—तधा। (तथा।) (इति निष्क्रान्ता)

प्रियंवदा—(पदान्तरे स्खलितं रूपयन्ती) अम्मो, आवेअक्खलिदाए पब्भट्ठं मे अग्गहत्थादो पुप्फभाअणं। (अम्मो, आवेगस्खलितायाः प्रभ्रष्टं मे अग्रहस्तात् पुष्पभाजनम्।) (नाट्येन पुष्पावचयं विधत्ते।)

अनसूया—(प्रविश्य) सहि, सरीरी विअ कोवो कस्स सो अणुणअं गेण्हदि। किं चि उण साणुकम्पो किदो। (सखि, शरीरी इव कोपः, कस्य सः अनुनयं गृह्णाति। किंचित् पुनः सानुकम्पः कृतः।)