अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 55
शशिकरविशदान्यस्यास्तथा हि दुःसहनिदाघशंसीनि।
<div align="right">3-11</div>
भिन्नानि श्यामिकया मृणालनिर्माणवलयानि।।
“शकुन्तला ने अपने हाथों में मृणालतन्तुओं से बनाये वलय पहने हैं वह चन्द्रकिरण जैसे शुभ्र होते हुए भी श्याम हो गये हैं, जो शकुन्तला के अङ्गसंताप को कह रहे हैं।” इस श्लोक में “मृणालनिर्माणवलयानि” शब्द बहुवचन में है, वह पूर्व श्लोक (3-10) के “प्रशिथिलितमृणालैकवलयम्” के साथ असम्बद्ध सिद्ध होता है। पहले जब कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में मृणाल का एक वलय प्रशिथिल है, तब तुरन्त ही अनुगामी श्लोक में कहा जाय कि शकुन्तला ने मृणाल से बने अनेक वलय पहने हैं, तो वह वदतोव्याघात है। अतः 3-11 श्लोक को प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा। इस नाट्यकृति के प्रत्येक शब्द, वाक्य को स्मृतिपट पर रखते हुए पुनरुक्ति या परस्पर विसंगतता है या नहीं, इसका यदि विचार किया जायेगा तो अनेक प्रक्षिप्त स्थानों को पहचाना जा सकेगा।
3-1-4 तृतीयांक में श्लोक 16 एवं 17 को अवतारित करने के लिए “अपि च” निपात का विनियोग किया गया है। अतः इन दोनों की भी समालोचना करणीय है।
राजा-
अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुको
<div align="right">3-16</div>
विशङ्कसे भीरु यतोऽवधीरणाम्।
लभेत वा प्रार्थयिता न वा श्रियं
श्रियो दुरापः कथमीप्सितो भवेत् ।।
अपि च-
अयं स यस्मात्प्रणयावधीरणाम्
<div align="right">3-17</div>
अशङ्कनीयां करभोरु शङ्कसे।
उपस्थितस्वां प्रणयोत्सुको जनो
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ।।
इन दोनों श्लोकों में “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति ही विचार करने को प्रेरित करती है कि इन में से कोई एक श्लोक मौलिक नहीं होगा। काव्यशास्त्रियों ने (और इनका अनुसरण करनेवाले टीकाकारों ने) श्लोक 3-16 में उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्य का प्रक्रमभङ्ग³⁷
³⁷. यहाँ (त्वं श्रीः) विशङ्कसे-यह उद्देश्य दल है, किन्तु तृतीय चरण में प्रतिनिधैर्य के रूप में प्रार्थयिता (नरः) है। इसको प्रक्रमभङ्ग दोष कहते हैं जिसके कारण इसका अर्थ समझना थोड़ा विलम्बित हो जाता है।
56 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
हो रहा है, जो एक काव्यदोष है ऐसा कहा है। तथा पूर्वापर चरणों का व्यत्यय करके पाठ प्रस्तुत करने का सुझाव दिया है। और “कथं न लभ्येत नरः श्रियार्थितः” ऐसा नया पाठ भी सूचित किया है, जिससे पर्यायप्रक्रमभङ्ग का दोष नहीं आयेगा। इस तरह काव्यदोष के परिहार करने के दो दो सुझाव प्रस्तुत करने के बाद भी किसी काव्यरसिक व्यक्ति ने तीसरे उपायान्तर के रूप में एक नया श्लोक ही लिख कर उसे मूल पाठ में “अपि च” के द्वारा प्रक्षिप्त कर देने की चेष्टा की है। “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति के साथ जो दूसरा श्लोक हमारे सामने आ रहा है उसका राज्ञ सम्भवतः उपर्युक्त काव्यदोष है। इस दूसरे श्लोक की मौलिकता की आशङ्का को दृढ करनेवाला “प्रणय” शब्द है, जो दो बार इसमें प्रयुक्त हुआ है। पूर्व श्लोक में संगम की उत्सुकता व्यक्त करने के बाद प्रणय की उत्सुकता दिखाना वह भी एक तरह का क्रमभङ्ग ही है। “अपि च” निपात से बाँधे गये श्लोक से ऐसी अपेक्षा रहती है कि वह कुछ नये अर्थ, नये दृश्य का समुच्चय प्रस्तुत करे। प्रणय एक लम्बी राह है, जिसमें संगम अन्तिम लक्ष्य है। अतः संगमोत्सुक बोल देने के बाद नायक अपने को प्रणयोत्सुक कहे वह अनुचित लगता है। सारभूत बात यही निकलती है कि “अपि च” से प्रस्तुत हुआ दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त है।
3-1-5 बंगाली वाचना के तृतीयांक का नाम “शृङ्गारभोग” रखा गया है, जिसमें दुःषन्त-शकुन्तला का गान्धर्वविवाह वर्णित है। इसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में घोषित किया है। इस सन्दर्भ में जो संवादशृङ्खला मिलती है वह निम्नोक्त हैः
प्रियंवदा- (जनान्तिकम्) अणूसूए, पेक्ख पेक्ख, मेहवादाहदं विअ गिम्हे मोरिं खणे खणे पच्चाअदजीविदं पिअसहिं। (अनसूये, प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व मेघवाताहतामिव ग्रीष्मे मयूरीं क्षणे क्षणे प्रत्यागतजीवितां प्रियसखीम्।)
शकुन्तला-हला, मरिसावेध लोअवालं जं अम्हेहिं बीसद्धपलाविणीहिं उवआरादिक्कमेण भणिदं। (सख्यौ, मर्षयतं लोकपालं यदस्माभिः विस्रब्धप्रलापिनीभिः उपचारातिक्रमेण भणितम्।)
सख्यौ- (सस्मितम्) जेण तं मन्तिदं सो ज्जेव मरिसावेदु। अणस्स को अच्चओ। (येन तत् मन्त्रितं सः एव मर्षयतु। अन्यस्य कः अत्ययः।)
शकुन्तला-अरिहदि क्खु महाराओ इमं पच्चक्खवअणं विसोढुं। परोक्खं वा किं ण मन्तीअदि। (अर्हति खलु महाराजः इदं प्रत्यक्षवचनं विषोढुं, परोक्षं वा किं न मन्त्रयते।)
राजा- (सस्मितम्)
अपराधमिमं ततः सहिष्ये यदि रम्भोरु तवाङ्गसङ्गसृष्टे।
कुसुमास्तरणे क्लमापहं मे सुजनत्वादनुमन्यसेऽवकाशम्॥
3-24
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 57
प्रियंवदा - ण एत्तिकेण उण तुट्टी भविस्सदि। (नैतावता तुष्टिः भविष्यति।)
शकुन्तला - (सरोषमिव) विरम दुल्ललिदे। एदावत्थं गदाए वि मए कीळसि। (विरम दुर्ललिते। एतदवस्थां गतयापि मया क्रीडसि।)
यहाँ दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनी कुलप्रतिष्ठा के रूप में प्रतिज्ञात किया तब उसकी दोनों सहेलियाँ पूर्ण रूप से आश्वस्त हो जाती हैं और शकुन्तला भी बहुत हर्षित होती है। अब वह अपनी सहेलियों को लोकपाल से क्षमायाचना करने को कहती है क्योंकि अनसूया ने राजा को कहा था कि-महाराज, बहुवल्लभा खलु राजानः श्रूयन्ते। तत यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोचनीया न भवति, तथा करिष्यसि। इन शब्दों के द्वारा अनसूया ने राजा के प्रति अन्यत्र प्रेमासक्त होने की जो सूक्ष्म आशङ्का व्यक्त की थी वह शकुन्तला की दृष्टि में उचित नहीं थी। अतः वह राजा से क्षमा माँगने को कहती है। किन्तु सहेलियाँ शकुन्तला को ही क्षमा माँगने को कहती हैं क्योंकि "हला, अलं वाम् अन्तःपुरविरहपर्युत्सुकेन राजर्षिणा उपरोधेन।" ऐसा कहकर शकुन्तला ने ही पहले राजा के प्रति उपचार का अतिक्रमण किया था। अतः जिसने उपचार का भङ्ग किया हो वही क्षमा माँगे। तब शकुन्तला महाराज दुष्यन्त को कहती है कि जो प्रत्यक्ष वचन (मुँह पर) कहा गया है उसे नजरअंदाज कर लीजिए क्योंकि लोग परोक्ष में तो ऐसी कई बातें बोलते रहते हैं। इस संवाद की पङ्क्तियाँ उपरि भाग में दी गयी हैं। किन्तु वह शकुन्तला के उदात्त चरित से बिलकुल विपरीत है। किसी भी व्यक्ति की पीठ के पीछे कुछ भी बोला जा सकता है ऐसा कहनेवाली शकुन्तला उच्च कोटि की नायिका सिद्ध नहीं हो सकती है। साथ में, राजा ने इस प्रसंग में जो श्लोकबद्ध प्रतिभाव दिया है वह किसी भी अभिरूपभूयिष्ठा परिषत् की सुरुचि का भङ्ग करनेवाला है। कोई भी नायक रंगमंच पर ही नायिका के साथ सहशयन की माँग करे वह सर्वथा अश्लील है। इस नाट्यकृति के आरम्भ में ही कवि ने अपने नायक का परिचय देते हुए कहा है कि "साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम्" अर्थात् दुष्यन्त भगवान् शङ्कर जैसा धीरोदात्त नायक है। वह जाहिर में और प्रकट शब्दों में शकुन्तला से सहशयन की माँग नहीं कर सकता है। अतः मानना होगा कि किसी सूत्रधार ने ही अपने स्थल-काल के दर्शकों की रुचि के अनुसार ऐसा अश्लील श्लोक नायक के मुख में रख दिया होगा।
तथैव, नायक की उक्ति के पीछे प्रियंवदा की जो उक्ति है (नैतावता तुष्टिर्भविष्यति।) वह तो नितान्त ग्राम्य है। रंगभूमि पर ऐसी अश्लील बातें कहलाने वाले कवि कालिदास नहीं हो सकते हैं। प्रकृत संवाद नायिका, नायक और प्रियंवदा के लिए कथमपि शोभास्पद नहीं होने से आन्तरिक सम्भावना के विरुद्ध है। अतः इस पूरे संवाद को प्रक्षिप्त मानना ही होगा।
3-1-6 तीसरे अङ्क का एक उदाहरण द्रष्टव्य है, जिसमें भी नायक के उदात्त चरित से विपरीत एवं गलत सोचवाली श्लोकरचना प्रस्तुत हुई है।
58 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
राजा- (स्वागतम्)
अप्यौत्सुक्ये महति दयितप्रार्थनासु प्रतीपाः काङ्क्ष्यन्त्योऽपि व्यतिकरसुखं कातराः स्वाङ्गदाने। आबाध्यन्ते न खलु मदनेनैव लब्धान्तरत्वाद् आबाधन्ते मनसिजमपि क्षिप्तकालाः कुमार्यः।।³⁸ 3-27
(शकुन्तला गच्छत्येव)
इस श्लोक में नायक दुष्यन्त कुमारिका स्त्रियों की मानसिकता को विशद करता हुआ जो बोल रहा है उसमें भी उसकी ही भोगेच्छा खुल कर बाहर आ रही है। किन्तु प्रासंगिक दृष्टि से सोचा जाय तो रंगमंच से सहेलियों के चले जाने के बाद कुछ ज्यादा समय तो बीता नहीं है और शकुन्तला के साथ कोई प्रेमगोष्ठियाँ भी अभी हुई नहीं हैं, उससे पहले दुष्यन्त की उपर्युक्त श्लोकोक्ति नायक की अधीरता प्रकट करनेवाली है। प्रेमकथाओं में प्रणयि-युगल के बीच जो स्वाभाविक रूप से संवनन प्रक्रिया क्रमशः विकसित होती है और जो इस अङ्क में आगे आनेवाले मृणाल-वलय प्रसंग में दृश्यमान होनेवाली है, उसकी प्रस्तुति होने से पहले दुष्यन्त का यह आत्मगत चिन्तन सामयिक नहीं है। अतः यह उपर्युक्त श्लोक भी प्रक्षिप्त लगता है।
3-1-7 तृतीयांक में प्रियंवदा और अनसूया मृगबाल को उनकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बना कर लतामण्डप से दूर चली जाती हैं। अब रंगमंच पर दुष्यन्त और शकुन्तला अकेले हैं। सखीजनों की भूमिका पर अब दुष्यन्त खड़ा है। मध्याह्न का समय होने से वह शकुन्तला को नलिनीदल से आर्द्र वायु का संचार करने का इच्छुक है, और शकुन्तला कहे तो उसके चरणों का संवाहन करने को भी तैयार है। किन्तु शकुन्तला माननीय व्यक्ति से ऐसी सेवा लेना उचित नहीं समझती है। अतः वहाँ से उठ कर चली जाती है। दुष्यन्त उसके पीछे चल पड़ता है और उसका पल्लू पकड़ कर रोकने की चेष्टा करता है। शकुन्तला कहती है-पौरव, रक्ष विनयम्। इतस्ततः ऋषयः संचरन्ति। इस संवाद के बाद राजा की जो उक्ति है, उसकी मौलिकता संदेहास्पद है:
राजा- सुन्दरि, अलं गुरुजनाद् भयेन। न ते विदितधर्मा तत्रभवान् कण्वः खेदमुपयास्यति।
- अनुवाद: राजा-(स्वगत) ये कुमारिकायें अतिशय इच्छा रखती हुई भी अपने प्रियतम के प्रतिकूल बर्ताव करती हैं। यद्यपि मिलन-सुख की अभिलाषा रखती हैं, फिर भी अपना अंग समर्पित करने में कातरता दिखाती हैं। अतएव मालूम होता है कि समय पाकर केवल कामदेव ही उनको पीड़ित नहीं करता, बल्कि व्यर्थ में समय बिता कर ये कामदेव को भी बाधा पहुँचाती हैं।
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 59
गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्योऽथ मुनिकन्यकाः।
श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चाभिनन्दिताः॥
3-28
(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि। (शकुन्तलां हित्वा पुनस्तैरेव पदैः प्रतिनिवर्तते।)
शकुन्तला- (पदान्तरे प्रतिनिवृत्य साङ्गभङ्गम्) पौरव, अणिच्छापूरओ वि संभासणमेत्तएण परिचिदो अअं जणो ण विसुमरिदव्वो।।
यहाँ, लतामण्डप से बाहर निकल कर जा रही शकुन्तला के पीछे दुष्यन्त भी चल पड़ता है तब उसको सावधान करने के लिए शकुन्तला ने “यहाँ वहाँ ऋषिमुनि लोग घूम रहे होंगे” ऐसा कहा है। इस सन्दर्भ में दुष्यन्त कहता है कि गुरुजनों से भय रखने की आवश्यकता नहीं है, कण्व भी (तुझे प्रेमासक्त या विवाहित जान कर) खेद का अनुभव नहीं करेंगे। अर्थात् तुझ पर नाराज नहीं होंगे। दुष्यन्त यहाँ विशेष में यह भी कहता है कि गान्धर्व-विवाह से विवाहित हुई बहुत सी मुनिकन्यायें हैं, जो (बाद में) पिताओं के द्वारा अभिनन्दित भी की गयी हैं। इस श्लोक पर किसी विद्वान् ने नुकताचीनी शायद नहीं की है। लेकिन सम्भव है कि किसी साहित्यरसिक की दृष्टि में, दुष्यन्त ने ही यहाँ शकुन्तला को गान्धर्व-विवाह के लिये उकसाया है-ऐसा भाव उठ सकता है। ऐसी संवित्ति मुखर हो कर सामने आये या न आये, लेकिन शकुन्तला जब कह रही है कि आसपास में ऋषि-मुनि घूम रहे होंगे, तब जो विनीत बर्ताव की अपेक्षा है, उससे विपरीत दुष्यन्त गुरुजनों से डरने की कोई जरूरत नहीं है ऐसा समझाने का उपक्रम शुरू करे वह दुष्यन्त के चरित के अनुरूप नहीं है। किन्तु दुष्यन्त के मुख में रखा गया प्रथम वाक्य एवं “गान्धर्वेण विवाहेन”० वाला श्लोक बीच में से हटाया जाय तो, जो रंगसूचना-पुरस्सर का अनुगामी वाक्य है- “(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि। (शकुन्तलां हित्वा पुनस्तैरेव पदैः प्रतिनिवर्तते।)”, वह बिलकुल सही सिद्ध होता है। इसमें विचार-सातत्य भी है, और दुष्यन्त का लतामण्डप में वापस चला जाना भी शकुन्तला की उक्ति से सुसम्बद्ध है। महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान में दुष्यन्त गान्धर्व-विवाह के लिए बहुत उतावला हो गया है। उस मूल कथा में सुधार के लिये उद्यत हुए महाकवि के लिए प्रेम का उदात्त चित्र खींचना मुनासिब है तो उसको अपनी कलम से गान्धर्व-विवाह का प्रस्ताव कराकर किसी मुग्धा मुनिकन्या को उकसाने की जरूरत नहीं थी। इसे, अर्थात् गान्धर्वेण विवाहेन० वाले श्लोक को प्रक्षिप्त मानकर हटा देने से दुष्यन्त के उदात्त चरित की भी रक्षा होती है और शकुन्तला की उक्ति के साथ “कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि” जैसा दुष्यन्त का प्रतिभाव भी सुसंगत ठहरता है। यहाँ एक अन्य हकीकत की ओर ध्यान-आकृष्ट करना अनिवार्य है कि एकमात्र काश्मीर-प्रान्तीय शारदालिपि में लिखित पाण्डुलिपियों³⁹ में यह (गान्धर्वेण विवाहेन०
- ऑक्सफोर्ड की पाण्डुलिपि क्रमांक-1247 एवं 159
60 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
वाला) श्लोक नहीं है। कहने का तात्पर्य यही है कि शकुन्तला को लतामण्डप से बाहर चले जाने के बाद, दुष्यन्त भी जब वहाँ से बाहर आ जाता है तब “यहाँ वहाँ ऋषिमुनि लोग घूम रहे होंगे” ऐसी शकुन्तला की उक्ति के साथ तो, “(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि।” का सन्धान ही मौलिक प्रतीत होता है। यद्यपि यह श्लोक बंगाली, मैथिली, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य-इन चारो वाचनाओं में संचरित हुआ है, तथापि शारदा पाण्डुलिपिओं में उसका न होना अनुपेक्ष्य होने के साथ पुनर्विचारणीय भी है⁴⁰।
तीसरा ध्यातव्य बिन्दु यह है कि इस श्लोक के बाद जो दृश्यावली प्रस्तुत होती है उसमें नायक-नायिका के बीच मृणालवलय पहनाने का प्रेमभरा जो सहचार है वही सही स्वरूप में मदनलेखादि के पूर्वप्रसंगों के अनुसन्धान में समुचित लगता है, जिसके आधार पर ही (बिना किसी तरह से उकसाये) दोनों का प्रेममिलन नैसर्गिक प्रतीत होता है।
3-1-8 (क) बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है, उसके सामने देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में 23 या 24 श्लोक सम्मिलित हैं। अर्थात् देवनागरी की अपेक्षा से बंगाली में 17 श्लोक अधिक हैं। अभी तक हमने उनमें से 7 श्लोकों के प्रक्षिप्त होने की चर्चा की है। किन्तु इनके अलावा जो 10 श्लोक अवशिष्ट रहते हैं और इनके आगे-पीछे आये हुए गद्य संवाद हैं-इतने अंश में जो प्रसंग, जो दृश्य रखा गया है वह प्रक्षिप्त है या मौलिक, उसकी भी चर्चा करना यहाँ नितान्त आवश्यक है।। इस सन्दर्भ में सब से पहले तो पुण्यश्लोक डॉ० श्री एस. के. बेलवलकर जी का ही नाम स्मरण करना होगा। क्योंकि भारतीय पाठालोचना के धुरन्धर विद्वान् के रूप में वे अग्रगण्य हैं, और अविस्मरणीय भी। उन्होंने विश्व के रसिकों को यह दिखाया है कि अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयांक के प्रचलित (देवनागरी एवं दाक्षिणात्य) पाठ में समय की विसंगति है। जैसे कि-दोनों सहेलियों के चले जाने के बाद, दुष्यन्त शकुन्तला को नलिनीदल से पवन झलने की एवं उसके पद्मताम्र चरणों का संवाहन करने की तत्परता दिखाता है। लेकिन शकुन्तला माननीय व्यक्ति से ऐसी सेवा लेकर अपने आपको अपराधी बनाना नहीं चाहती है, इस लिए वो वहाँ से उठ कर चली जाना चाहती है। तब दुष्यन्त ने कहा है कि-सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। ...... कथमातपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः।। (3-19)। अर्थात् अभी तो मध्याह्न का समय है, दिवस पूर्ण होने की काफी देर है। ऐसा कहने के बाद, देवनागरी पाठ में केवल पाँच संवाद के बाद ही नेपथ्योक्ति आती है कि-चक्रवाकवधूके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। (गौतमी आ जाती है और शकुन्तला को लेकर रंगभूमि से निकल जाती है।) अर्थात् पाँच-छह संवाद के बाद ही “रात्रि उपस्थित हो
- डॉ० दिलीप कुमार काञ्जीलाल ने इस गान्धर्वेण विवाहेन श्लोक के सन्दर्भ में उच्चतर समीक्षा के नाम पर कुछ भी निर्देश नहीं किया है। (द्रष्टव्य-A Reconstruction of the Śakuntalam, Introductory Chapter 2, page 68)
| अभिज्ञानशाकुन्तलम् | प्रस्तावना | 61 |
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गयी है" ऐसी समय की सूचना जिसमें आती है वह पाठ निश्चित रूप से ऐसा है जिसमें बीच में कटौती की गयी है। यहाँ किसी अज्ञात सूत्रधार के द्वारा कुछ श्लोकों में एवं उनसे जुड़े गद्य-संवादों में संक्षेप किया गया है। राघवभट्टादि जैसे मूर्धन्य टीकाकारों के द्वारा उसी संक्षिप्त किये गये पाठ का समादर होने के कारण उसे ही मौलिक मान लिया गया। परन्तु डॉ० श्री एस. के. बेलवलकरजी जैसे सूक्ष्मेक्षिका से पाठ-परीक्षण करनेवाले विद्वान् ने मध्याह्न और रात्रि के बीच में जो अपेक्षित काल-व्यवधानकी विसंगति है उसकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।$^{41}$ इसी लिए यह न केवल अपेक्षित ही, बल्कि अनिवार्य भी है कि हम देवनागरी पाठ की संक्षिप्तता समझने के लिए बंगाली पाठ से उसकी तुलना करें। तथा पूर्वग्रह से जिस बंगाली पाठ को प्रक्षेपों से भरा मान लिया गया है उसकी मौलिकता को पहचानें, अथवा बिना परीक्षा किये उसकी उपेक्षा न करें।।
बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में, जिन दो प्रसंगों का प्रक्षेप माना गया है वह हैं: 1. शकुन्तला को मृणाल-वलय पहनाने का, एवं 2. कर्णोत्पलरेणु से शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर दुष्यन्त द्वारा अपने वदनमारुत से उसे विशद कर देने का। इन दोनों प्रसंगों की मौलिकता जांचने के लिए तृतीयाङ्क का 39वाँ श्लोक कृतिनिष्ठ “आन्तरिक प्रमाण” के रूप में विश्लेषणीय है।
तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं
<p align="right">3-39</p>
कान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः।
हस्ताद् भ्रष्टमिदं बिसाभरणमित्यासज्यमानेक्षणो
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहादीशोडस्मि शून्यादपि।।
यह श्लोक, शकुन्तला को लेकर गौतमी के चले जाने के बाद वेतसगृह में अकेला खड़ा, दुष्यन्त बोलता है। वह शकुन्तला की तीन चीजों का परिगणन करता है, 1. शकुन्तला की पुष्पशय्या, 2. उसका लिखा हुआ मदनलेख तथा 3. उसके हाथ से गिरा हुआ बिसाभरण अर्थात् मृणालवलय। यह श्लोक शाकुन्तल की पाँचों वाचनाओं में सर्वसम्मति से ग्राह्य रहा है। तथापि केवल बृहत्पाठ परम्परावाली बंगाली, मैथिली एवं काश्मीरी वाचना की पाण्डुलिपियों में ही यह प्रसंग आता है जिसमें दुष्यन्त शकुन्तला के हाथ से गिरा मृणालवलय उठा लेता है और शकुन्तला के हाथ में पुनः पहनाता है। शाकुन्तल की लघुपाठ परम्परावाली देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में यह मृणाल-वलय पहनाने का प्रसंग आता ही नहीं है। तो फिर उपर्युक्त श्लोक में जिस बिसाभरण अर्थात् मृणालवलय का परिगणन करवाया
- The most cogent objection against its shorter version is the fact that it plays fast and loose with the time-indications of the scene—see: Sringaric elaboration in Śakuntala, Act 3, pub. in "Indian Studies in Honor of C.R. Lanman", Harvard Univ. Press, 1929, pp. 187-192.
62 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
है, उसकी प्रस्तुतता कैसे सिद्ध हो पायेगी? अतः हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि उपर्युक्त विशेष प्रसंग मूल शाकुन्तल के पाठ में थे, और मंचन के दौरान किसी अज्ञात सूत्रधार ने उसे हटा दिया होगा। ऐसे संक्षिप्त किये गये पाठ में से शाकुन्तल की लघुपाठ परम्परा शुरू हुई होगी। यहाँ मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए भी लगता है कि तीसरे अङ्क के आरम्भ में ही “स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिल-मृणालैक-वलयम्” (श्लोक 3-10) शब्दशः से कहा गया है कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना था वह शुरू से ही प्रकृष्टतया शिथिल था।⁴² और नाटक मात्र का यह नियम होता है कि उसमें जो भी कहा जाता है वह सप्रयोजन होता है। अतः अङ्क के आरम्भ में यदि दर्शकों को कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में पहना मृणाल वलय प्रशिथिल है तो ऐसी अपेक्षा रहती है कि अङ्क में मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग आकारित हो। यह प्रसंग बंगाली आदि बृहत्पाठवाली वाचनाओं में है, किन्तु लघुपाठवाली देवनागरी में नहीं है। किन्तु जैसा उपरि निर्दिष्ट प्रमाणों से सिद्ध होता है कि यह प्रसंग मौलिक ही होगा, तो मानना पड़ेगा कि देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षिप्तीकरण के दौरान उसे मूल पाठ में से हटाया गया है।
3-1-8 (ख) इस मृणाल-वलय का प्रसंग मूलगामी पाठ में होना एक अन्य आन्तरिक सम्भावना से भी समर्थित होता है। उसकी ओर भी सत्यान्वेषी साहित्यरसिकों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है: जिस लतामण्डप में दुष्यन्त-शकुन्तला का एकान्त मिलन होता है वहाँ आरम्भ में शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाती है। तब दुष्यन्त शकुन्तला के मणिबन्धन से गलित हुए मृणालवलय को देखता है, जिसको वह “हृदयस्य निगडम् इव” कहता है⁴³, फिर उसको उठा लेता है और अपने गले लगाता है। तब उस वलय को वापस लेने के बहाने शकुन्तला लतामण्डप में पुनः प्रविष्ट होती है। यहाँ प्रिया शकुन्तला को देखते ही दुष्यन्त सहर्ष बोलता है:- “अये, जीवितेश्वरी मे प्राप्ता।” इसके बाद, दुष्यन्त मृणाल-वलय को वापस लौटाने के लिये एक अभिसन्धि (शर्त) रखता है कि वह स्वयं उसके हाथ में पहनाएगा। शकुन्तला इस अभिसन्धि को मंजूर करती है। दुष्यन्त ने जब शकुन्तला के हाथ में उसे पहनाया तब शकुन्तला के मुख से “त्वरताम् त्वरताम् आर्यपुत्रः।” ऐसा सम्बोधन निकल जाता है। कङ्कण-स्वरूप मृणाल-वलय पहनाने के अवसर पर शकुन्तला के मन में दुष्यन्त के लिये पतिभाव प्रकट हुआ हो यह अत्यन्त स्वाभाविक है। इस दृष्टि से, मृणाल-वलय प्रसंग में नायक-नायिका ने परस्पर जो
- यहाँ श्री शरद रंजन राय (1908 में) ने ऐसा प्रश्न उठाया था कि गिरा हुआ मृणालवलय यदि दुष्यन्त ने पहनाया था, तो अङ्क के अन्त में वह फिर से गिरा कैसे? इसका समाधान देते हुए डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने कहा है कि शकुन्तला ने दोनों हाथ में मृणालवलय पहने होंगे, अतः दूसरे हाथ का वलय गिर गया होगा।
- इस श्लोक को वर्द्धमान ने गणरत्नमहोदधि (12वीं शती) में उद्धृत किया है।
अभिज्ञानशाकुन्तलम् प्रस्तावना 63
“जीवितेश्वरी” और “आर्यपुत्रः” कहा है, वह क्षण दाम्पत्य भाव का अनुभव प्रदर्शित करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आगे चल कर जब षष्ठाङ्क में (दुष्यन्त-नामधेयाङ्किता मुद्रिका मिल जाने के बाद) अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों के सामने दुष्यन्त के मुख से कदाचित् “गोत्र-स्खलन” हो जाता है, ऐसा निरूपण आता है⁴⁴, तो वह बिलकुल निराधार नहीं लगता।
किन्तु देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तो यह मृणाल-वलय का प्रसंग नहीं है। अतः वहाँ षष्ठाङ्क में गोत्र-स्खलन का जब निर्देश आता है तब उसका कोई पूर्व-निर्दिष्ट आधार नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यही है कि बंगाली वाचना में मृणाल-वलय का प्रसंग है और उस प्रसंग के निमित्त से दोनों के चित्त में जो सहज दाम्पत्यभाव प्रकट हुआ था उससे ही षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से अनजान में होनेवाले गोत्र-स्खलन की स्वाभाविकता प्रतीतिकर बनती है। इस तरह षष्ठाङ्क में आनेवाले गोत्र-स्खलन का निर्देश हमारे लिये मृणाल-वलय के प्रसंग का समर्थक प्रमाण बनता है।
3-1-8 (ग) बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में प्रक्षिप्त माने गये दूसरे प्रसंग की, अर्थात् शकुन्तला की दृष्टि पुष्परज से कलुषित होने पर दुष्यन्त द्वारा अपने वदन-मारुत से निर्मल करने के प्रसंग की मौलिकता भी कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य से समर्थित होती है। यहाँ प्रथमतः यही बात विचारणीय है कि शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने जैसे किसी प्रसंग की हम अपेक्षा रख सकते हैं या नहीं? प्रथमाङ्क में वृक्षसेचन के दौरान परिश्रान्त हुई शकुन्तला का वर्णन करते हुए दुष्यन्त ने कहा है, स्रस्तं कर्णाशिरीषरोधि वदने घर्माम्भसां जालकं, बन्धे स्रंसिनि चैकहस्तयमिताः पर्याकुला मूर्धजाः (शाकु. 1-26, राघवभट्ट, पृ. 47) अर्थात् शकुन्तला अपने कर्णों में शिरीष पुष्पों को लगाती थी। इसीलिये षष्ठाङ्क में शकुन्तला का चित्र अंकित करते हुए दुष्यन्त ने फिर कहा है, कृतं न कर्णापितबन्धनं सखे, शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम्। न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे।। (शाकु. 6-18, राघवभट्ट, पृ. 213) इस तरह शकुन्तला अपने कानों में प्रसाधन के रूप में पुष्प लगाती थी, और इसी लिये कदाचित् उसके नेत्र में पुष्परेणु गिरने की सम्भावना (एवं नाटकीय अपेक्षा) थी। लेकिन यहाँ ऐसा प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या ऐसा कोई प्रसंग महाकवि ने ही अपने हाथों से लिखा होगा? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उच्च स्तरीय समीक्षा को मान्य हो ऐसा कोई प्रमाण देना आवश्यक है।
महाकवि कालिदास ने इस नाट्यकृति की दृश्यावली में सर्वत्र एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की जिस कलात्मक सर्जनविधा का साद्यन्त विनियोग किया है उसकी ओर सब का ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत है। उदाहरण के रूप में-प्रथमाङ्क में
- दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा, गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्।
शाकु. 6-5 (राघवभट्ट, पृ० 195)
64 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मृगया-विहारी दुष्यन्त का कण्वमुनि के आश्रम में प्रवेश होते ही-न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन्... शब्द सुनायी पड़ते हैं, वैसे ही सप्तमाङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त मारीच के आश्रम में प्रवेश करता है और वहाँ “मा चापलम् कुरु। कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम्,” ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। यहाँ प्रथमाङ्क में शिकारी दुष्यन्त का जो एक रूप प्रस्तुत किया था, उसका ही दूसरा प्रतिरूप सिंहबाल के साथ खेल रहे सर्वदमन का खड़ा किया गया है। इस तरह महाकवि ने सम्पूर्ण कृति में एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप (एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिदृश्य) खड़ा करने की स्पृहणीय नाट्य-शैली का मार्ग अपनाया है। यह नाट्य-शैली भी हमारे लिये कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य बन सकती है और उसके आधार पर बंगाली (मैथिली और काश्मीरी) वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला की दृष्टि कर्णोत्पल रेणु से कलुषित होने का जो प्रसंग वर्णित किया गया है उसका समर्थन किया जा सकता है। जैसे तृतीयाङ्क में दुष्यन्त ने अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि निर्मल कर दी थी, उसी एक दृश्य के सामने, षष्ठाङ्क में कवि ने दूसरा प्रतिदृश्य भी खड़ा किया है। धीवर के पास से जब मुद्रिका मिल जाती है और दुष्यन्त को शकुन्तला का पुनःस्मरण हो जाता है तब शकुन्तला का चित्रांकन करते हुए वह एक श्लोक बोलता हैः
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
<p align="right">6-17</p>
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निर्मातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
इसमें कहा गया है कि मुझे (दुःषन्त को) इस चित्र में बह रही मालिनी नदी की बालुका में बैठा एक हंस-मिथुन आकारित करना है। हिमालय की उपत्यका में बैठे चमरों के समूह को बनाना है। वृक्ष की डालियों पर कुछ वल्कल वस्त्र टँगे हों एवं उस वृक्ष के अधो भाग में कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई एक हरिणी भी चित्रित करने की चाहत हो रही है। यहाँ “कण्डूयमानां मृगीम्” का जो चित्र बनाने की इच्छा प्रकट की गयी है वह निरतिशय व्यञ्जनापूर्ण है। षष्ठाङ्क में वर्णित इस प्रसंग का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से तृतीयाङ्क में निरूपित शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने के प्रसंग के साथ ही है। वहाँ पर दुष्यन्त ने जब अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि को निर्मल कर देने का प्रस्ताव रखा था, तब शकुन्तला ने कहा था कि मेरे मन में तुम्हारे लिये विश्वास नहीं है। किन्तु अब दुष्यन्त इस चित्र से व्यंजित करना चाहता है कि वह अब शिकारी के रूप में शकुन्तला को प्राप्त करना नहीं चाहता अपितु हरिणीस्वरूपा शकुन्तला का सगन्ध और विश्वसनीय हरिण बनके, शकुन्तला का जीवनाधार बनना चाहता है। दुष्यन्त ने तृतीयाङ्क के उसी प्रसंग को स्मरण-पट पर रख कर एक प्रतिदृश्य के रूप में, यह “कण्डूयमानां मृगीम्” का चित्र बनाने
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 65
की इच्छा प्रकट की है। इस तरह एक दृश्य के सामने दूसरा परिदृश्य खड़ा करने की जो निरूपण-शैली समग्र कृति में बार बार दिखायी देती है उसको तार्किक रूप से ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में स्वीकारना चाहिए। इस आधार पर पुष्परज से शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने का जो प्रसंग है वह प्रक्षिप्त नहीं है, बल्कि सर्वथा मौलिक है ऐसा मानना ही चाहिए।
3-1-9 तृतीयांक के अन्त भाग में भी एक उपान्त्य श्लोक का प्रक्षेप दिख रहा है। शकुन्तला को ले कर गौतमी चली गयी। दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलयाच्छादित वेतसगृह में खड़ा खड़ा उसके मन्मथलेख इत्यादि पर सानुराग दृष्टि से झाँक रहा है और कहता है कि मुझसे इस वेतसगृह से बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसी प्रेमासक्त दशा में फँसे नायक को रंगमंच से निकालने के लिए नाट्यकार कालिदास उसके वीरत्व को ही टटोलते हैं। अतः नेपथ्योक्ति है “भो भो राजन्, सायन्तने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते०” (श्लोक-41) अर्थात् सायंकाल होते ही यज्ञकर्म में बाधा डालने के लिए काले-पीले वर्ण के राक्षसों की छायायें आकाश में मंडराने लगी हैं। इसको सुनते ही दुष्यन्त के वीरत्व को चुनौती मिलती है और वह रंग से बाहर दौड़ जाता है। कालिदासीय नाटकों में अन्यत्र भी दिखनेवाली यह पद्धति पूर्ण रूप से नाटकीय है। किन्तु बंगाली वाचना में दुष्यन्त की उक्ति और नेपथ्योक्ति में व्यवधान बननेवाला श्लोक-40 अस्वाभाविक लगता है। जिसमें दुष्यन्त कहता है कि-
रहः प्रत्यासत्तिं यदि सुवदना यास्यति पुन-
र्न कालं हास्यामि प्रकृतिदुरवापा हि विषयाः।
इति क्लिष्टं विघ्नैर्गणयति च मे मूढहृदयं
प्रियायाः प्रत्यक्षं किमपि च तथा कातरमिव॥
3-40
धीरोदात्त चरितवाले नायक के मुख में विषयोपभोग की लालसा प्रकट (या अप्रकट) शब्दों में प्रस्तुत होना दो दृष्टियों से अनुचित है। 1. मूल महाभारत के दुष्यन्त में जो विषयोपभोग के प्रति उतावलापन दिखता है, उसका परिमार्जन करते हुए कालिदास ने हमारे सामने एक धीरोदात्त नायक, जिसको वह नाटक के आरम्भ में ही साक्षात् पिनाकी की उपमा देते हैं, रेखांकित करना चाहता है। उसके मुँह में उपर्युक्त श्लोक के शब्द संगत नहीं बैठते हैं। तथा 2. नाटकीयता की दृष्टि से सोचा जाय तो प्रियासम्बद्ध तीन तीन चीजों को वेतसगृह में ही छोड़कर बाहर निकलना मुश्किल है ऐसा बोल बोले जाने पर ही परिस्थितिवशात् नायक को (प्रेमासक्त दशा को तत्क्षण छोड़ कर) अपनी क्षत्रियता को ललकारने वाली परिस्थिति के सामने लड़ने के लिए रंगभूमि से बाहर निकलने में ही नाटकीयता है। अतः प्रेमासक्त दशा का अनुरणन करनेवाला उपर्युक्त दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त ही मानना होगा।
66 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
बंगाली वाचनावाले तृतीयांक के 3, 7, 11, 17, 24, 28 एवं 40 क्रमांक के श्लोक प्रक्षिप्त हो सकते हैं ऐसा अनेक कारणों से अनुमित हो रहा है। इस तरह से, कुल 41 श्लोकों में से प्रक्षिप्त 7 श्लोकों को निकाला जाय तो 34 श्लोकवाला परिमाण अवशिष्ट रहेगा, जो काश्मीरी वाचना के (और पाटण की 349/16630 एवं 169/6654 पाण्डुलिपियों⁴⁵ में संचरित हुए 11वीं शती के 33 या 34 श्लोकवाले) पाठ के साथ मिलता जुलता सिद्ध होगा।
3-2-1 देवनागरी वाचनावाले तृतीयांक के पाठ में संक्षेप हुआ है उसके दो-तीन प्रमाण हमारे सम्मुख पड़े ही हैं, उसे केवल आँख खोलकर देखने की जरूरत है। जैसे, 1. डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने बताया है कि दोनों सहेलियों के चले जाने के बाद दुष्यन्त ने कहा है कि अभी दिवस पूरा नहीं हुआ है, और लतामण्डप के बाहर तो कड़ी धूप है अर्थात् मध्याह्न का समय है। इस उक्ति के नीचे पाँच-छह संवाद के बाद तुरन्त नेपथ्य से आवाज आती है कि “चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्, उपस्थिता रजनी।” तो इस तरह की योजना में, अर्थात् मध्याह्न से लेकर रात्रि का प्रारम्भ होने तक का काल केवल पाँच-छह संवाद में ही दिखाना तर्कसंगत नहीं है। यह विसंगति किसी भी दर्शक को खटकनी ही चाहिए। सारभूत बात यही है कि, “अपरिनिर्वाणो दिवसः” और “रजनी उपस्थिता” के बीच में कुछ पाठ्यांश की कटौती हुई होगी ऐसा मानने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं। 2. अब इस बात का भी कोई सबूत मिलना आवश्यक है कि यदि कटौती हुई है तो दो कटे हुए भागों को कहाँ, कैसे जोड़ा गया है तथा उसका भी कोई निशान (पदचिह्न) देवनागरी वाचना में कहीं पर है या नहीं?। इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए तृतीयांक का निम्नोक्त श्लोक की ओर, जो केवल देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में ही मिलता है, ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यकता है:
राजा-
अपरिक्षतकोमलस्य यावत् कुसुमस्येव नवस्य षट्पदेन।
<div align="right">3-21</div>
अधरस्य पिपासता मया ते सदयं सुन्दरि गृह्यते रसोऽस्य॥
देवनागरी वाचना का प्रत्येक श्लोक सामान्यतया बंगाली आदि (बृहत्पाठ परम्परा) में मिलता है, लेकिन उपर्युक्त श्लोक तृतीयांक के इस मोड़ पर खड़ा है कि जो मूल पाठ में कटौती का स्थान है। अतः काटे हुए दो स्थानों को जोड़ने के लिए जिस श्लोक की नवीन रचना हुई है वह स्वाभाविक है कि बंगाली आदि वाचनाओं में नहीं होगा क्योंकि उसकी
- श्रीहेमचन्द्राचार्य ज्ञान-मन्दिर एवं वाडी पार्श्वनाथ का जैन भण्डार, जिला-पाटण, गुजरात में ये पाण्डुलिपियाँ संगृहीत हैं। उसकी ही वंशज पाण्डुलिपि एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद में 1948 क्रमांक पर है।
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 67
रचना विशेष प्रयोजन से की गयी है। तथा यह श्लोक जिस छन्द में लिखा गया है वह भी हेमचन्द्राचार्य के द्वारा “मालभारिणी” के नाम से 12वीं शती में प्रथम बार अभिज्ञात किया गया है। (उससे पहले भी यह छन्द कालिदास के साहित्य में प्रयुक्त हुआ है, लेकिन वहाँ उसका अभिज्ञान “औपच्छन्दसिक” के नाम से किया जाता था।) अर्थात् शाकुन्तल के मूल पाठ में कटौती करने के बाद, दो भागों को जोड़ने के लिए जो नया श्लोक लिखा गया है, उसका छन्द भी ध्यानास्पद बनता है, क्योंकि राघवभट्ट जब उसकी मालभारिणी जैसे नये नाम से पहचान दे रहे हैं तब वह भी “यह श्लोक उत्तरवर्ती काल में लिखा गया होगा” इसका प्रमाण बन सकता है। 3. बंगाली वाचना में नायक–नायिका का जो प्रेमभरा सहचार वर्णित है उसमें मुख्य रूप से दो प्रसंग हैं। (क) दुष्यन्त ने शकुन्तला के हाथ में मृणालवलय रूप कंकण पहनाया है, तथा (ख) पुष्परज से कलुषित हुई उसकी दृष्टि को वदनमारुत से निर्मल कर दिया है। एवमेव, इन दोनों प्रसंगों के प्रवर्तन में दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” के रूप में उल्लिखित किया है, तथा शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” शब्द से सम्बोधित किया है। इससे दोनों के बीच में स्वाभाविक रूप से ही अपनेपन का भाव उदित हुआ है, और इससे सहज प्रेम का एक चित्र प्रस्तुत होता है। लेकिन देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में उपर्युक्त दोनों प्रसंगों को संक्षेपीकरण के आशय से हटाया गया है। अतः उस संक्षिप्त पाठ्यांश में से स्वाभाविक प्रेम का चित्र प्रस्तुत करनेवाले दोनों प्रसंग अदृश्य हो गये हैं। अब इन दृश्यों को हटाकर किसको स्थानापन्न किया गया है? इसकी भी जिज्ञासा होगी। तो यहाँ पर महाभारत के आदिपर्व में आये हुए शकुन्तलोपाख्यान (सम्भवपर्व, अध्याय–67) का अनुकरण करते हुए दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व–विवाह का प्रस्ताव, बल्कि कण्व के आने की प्रतीक्षा किये बिना ही शकुन्तला को गान्धर्व–विवाह का रास्ता बताते हुए उसको उकसाने जैसे प्रसंगों का सन्निवेश किया गया है। महाभारत के शब्द इस तरह के हैं:—
दुःषन्त उवाच— गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते॥4॥
शकु० उवाच— फलाहारो गतो राजन् पिता मे इत आश्रमात्।
तं मुहूर्तं प्रतीक्षस्व, स मां तुभ्यं प्रदास्यति॥5॥
दुःषन्त उवाच— इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि, त्वद्–गतं हि मनो मम॥6॥
68 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः।।7।।⁴⁶
इसमें दुष्यन्त की भोगेच्छा इतनी प्रबल है कि कण्व मुनि नजदीक में ही फलाहार ढूँढने गये हैं ऐसा शकुन्तला के द्वारा कहे जाने पर भी वह उनकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता है। गान्धर्व-विवाह करने में धर्म का लोप नहीं होता है इत्यादि कह कर जैसे महाभारत में दुष्यन्त ने शकुन्तला को उकसाया है वैसे ही देवनागरी के परिवर्तित किये गये पाठ में भी गान्धर्व-विवाह वाले श्लोक का नवीन प्रक्षेप करके, शकुन्तला को उकसाया जाता है। नाटक में दुष्यन्त शकुन्तला को सहेलियों से भी सलाह-मशविरा करने के लिए अवकाश नहीं देता है। तथा अपरिक्षतकोमलस्य यावत्० इत्यादि शब्दों से (उपर्युक्त नवीन श्लोक में) दुष्यन्त रंगमंच पर शकुन्तला के अधरोष्ठ का रसपान करने की प्रकट शब्दों में माँग करता है, जो उसके महाभारत-वर्णित स्वरूप के साथ सुसंगत बैठता है। किन्तु वह कालिदास के द्वारा संकल्पित साक्षात् पिनाकिन् जैसे धीरोदात्त चरितवाले नायक से विरुद्ध लगता है। महाकवि कालिदास ने इस नाटक में जो उदात्त चरितवाला नायक निरूपित करने का उपक्रम रखा था उसको संक्षेपीकरण के सिलसिले में दुर्भाग्य से भुला दिया गया, और फिर से महाभारत का भोगेच्छुक और उतावलापन दिखानेवाला दुष्यन्त देवनागरी शाकुन्तल में हाजिर हो गया। साथ में दूसरा दुर्भाग्य यह भी प्रकट हुआ कि यह गान्धर्वेण विवाहेन०वाला देवनागरी वाचना का श्लोक बंगाली एवं मैथिली परम्परा में भी चुपके से प्रविष्ट हो गया। (क्योंकि वह मूल महाभारत में था।) अतः बंगाली पाठ में स्वाभाविक और निर्मल प्रेम का चित्र होने के साथ साथ, उक्त प्रक्षेप के कारण, अधीर दुष्यन्त भी दृश्यमान होने लगा। निष्कर्षतः 1. देवनागरी वाचना के पाठ में से (संक्षिप्तीकरण के कारण) स्वाभाविक प्रेम का चित्र गायब हो गया और महाभारत के भोगेच्छुक दुष्यन्त का पुनरागमन हुआ तथा 2. बंगाली वाचना में स्वाभाविक चित्र यथावत् रहते हुए भी महाभारत का उतावलापन दिखाता हुआ, गान्धर्व-विवाह का रास्ता जताता हुआ, भोगेच्छा को मुखरित करता हुआ दुष्यन्त भी आकारित किया गया। पहले में संक्षेपजनित क्षति है, तो दूसरे में प्रक्षेपजनित विकृति है। किन्तु दोनों परम्पराओं की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने से इन दोनों को, याने संक्षेप और प्रक्षेप को पहचाना जा सकता है। यदि उसे नहीं पहचानेंगे तो कालिदास के अभिमत नायक को हम नहीं देख सकेंगे। (आज पाण्डुलिपियों में संचरित हुए देवनागरी पाठ में महाभारत का दुष्यन्त है और उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के पाठ में दो रूपवाला दुष्यन्त दिखायी दे रहा है।)
3-2-2 देवनागरी वाचना में संक्षेप का दूसरा प्रमाण भी सरलता से देखा जा सकता
- महाभारते आदिपर्वणि, सम्भवपर्वणि अध्यायः 67 (श्लोकाः 4, 5, 6 एवं 7) भण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पुणे, 1933
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 69
है। यहाँ तृतीयांक का जो उपान्त्य श्लोक है उसमें, “हस्ताद् भ्रष्टं बिसाभरणम्” शब्दों के होते हुए भी शकुन्तला के हाथ से गिरते हुए किसी मृणाल-वलय का निर्देश नहीं है। दूसरी ओर अङ्क के आरम्भ में तो कहा गया था कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना है वह प्रशिथिल है लेकिन उसके गिरने का प्रसंग देवनागरी पाठ में कहीं है ही नहीं, जो संक्षिप्त किये गये पाठ का सबल प्रमाण बनता है।
3-2-3 देवनागरी पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण भी कुत्रचित् मिलते हैं। जैसे कि तृतीयांक में जब शकुन्तला ने कहा कि उसे उस राजर्षि की अनुकम्पा का भाजन बनाया जाय तब दोनों सहेलियों ने उसे अभिनन्दन देने का विचार किया। क्योंकि शकुन्तला जिसमें आसक्त हुई थी वह पौरवों में ललामभूत था। प्रियंवदा की उक्ति है-सखि, दिष्ट्या अनुरूपस्ते अभिनिवेशः। सागरम् उज्झित्वा कुत्र वा महानदी अवतरति। क इदानीं सहकारम् अन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते। यहाँ दो उपमानों से शकुन्तला का अभिनन्दन किया जा रहा है। परन्तु उसमें एक ही विचार की पुनरुक्ति भी हो रही है। इसके सामने बंगाली वाचनानुसारी पाठ में दूसरा वाक्य है ही नहीं। अब इससे भी सिद्ध होता है कि देवनागरी के पाठ में पुनरुक्ति रूप दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त है।
4-0-1 बंगाली वाचना और देवनागरी-दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में, चतुर्थाङ्क के प्रारम्भ में ही एक महत्त्वपूर्ण भेद यह मिलता है कि अन्यमनस्का शकुन्तला को दुर्वासा मुनि शाप देकर चल पड़े तब उनसे शापमुक्ति की याचना करने के लिए कौन जाता है, अनसूया या प्रियंवदा?। प्रथम वाचना के मुताबिक अनसूया जाती है और द्वितीय वाचनानुसार प्रियंवदा जाती है। दोनों सहेलियाँ पुष्पावचयन कर रही थीं तब उन्होंने सुना कि आश्रम के द्वार पर कोई अतिथि आकर खड़े थे और उन्होंने शकुन्तला को शाप दे दिया है। बंगाली वाचना में, इस प्रसंग के जो संवाद अनसूया के मुख में रखे गये थे वे सब देवनागरी वाचना में पलट कर प्रियंवदा के मुख में रखे गये हैं। जैसे (बंगाली वाचना में)-
प्रियंवदा—को अण्णो हुदवहादो दहिदुं पहवदि। ता गच्छ। पादेसुं पडिअ णिअत्तावेहि जाव से अहं पि अग्घोदअं उवकप्पेमि। (कोऽन्यः हुतवहाद् दग्धुम् प्रभवति। तद्गच्छ। पादयोः पतित्वा निवर्तय यावद् अस्याहमर्घ्योदकं उपकल्पयामि।)
अनसूया—तधा। (तथा।) (इति निष्क्रान्ता)
प्रियंवदा—(पदान्तरे स्खलितं रूपयन्ती) अम्मो, आवेअक्खलिदाए पब्भट्ठं मे अग्गहत्थादो पुप्फभाअणं। (अम्मो, आवेगस्खलितायाः प्रभ्रष्टं मे अग्रहस्तात् पुष्पभाजनम्।) (नाट्येन पुष्पावचयं विधत्ते।)
अनसूया—(प्रविश्य) सहि, सरीरी विअ कोवो कस्स सो अणुणअं गेण्हदि। किं चि उण साणुकम्पो किदो। (सखि, शरीरी इव कोपः, कस्य सः अनुनयं गृह्णाति। किंचित् पुनः सानुकम्पः कृतः।)
70 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
प्रियंवदा – एदं जेव तस्सिं बहुदरं। ता कथेहि। (एतदेव तस्मिन् बहुतरम्। तत्कथय।)
अनसूया – जदो णिअत्तिदुं णेच्छदि तदो पादेसुं पणमिअ विण्णाविदो मए। भअवं। पढमभत्तिं अवेक्खिअ अज्ज तुम्ह अविण्णादपहावपरमत्थस्स दुहिदाजणस्स भअवदा अअं अवराहो मरिसिदव्वो त्ति। (यतः निवर्तितुं नेच्छति ततः पादयोः प्रणम्य विज्ञापितः मया। भगवन्, प्रथमभक्तिमवेक्ष्य अद्य तव अविज्ञात-प्रभावपरमार्थस्य दुहितृजनस्य भगवता अयमपराधः मर्षितव्यः इति।)
प्रियंवदा – तदो तदो। (ततस्ततः।)
अनसूया – तदो सो ण मे वअणं अण्णधा भवितुं अरिहदि। किं तु अहिण्णाणाभरणदंसणादो से सावो णिअत्तिस्सदि त्ति मन्तअन्तो ज्जेव अन्तरिदो। (ततः सः न मे वचनमन्यथा भवितुमर्हति। किं तु अभिज्ञानाभरणदर्शनादस्याः शापः निवर्तिष्यते इति मन्त्रयन् एवान्तरितः।)
प्रियंवदा – सक्कं दाणिं अस्ससिदुं। अत्थि तेण राएसिणा संपत्थिदेण अत्तणो णामाङ्किदं अङ्गुलीअअं सुमरावणीअं ति सउन्तलाहत्थे सअं जेव पिणद्धाविदं। एसो ज्जेव तस्सिं साहीणो उवाओ भविस्सदि। (शक्यमिदानीमाश्वसितुम्। अस्ति तेन राजर्षिणा सम्प्रस्थितेनात्मनः नामाङ्कितमङ्गुरीयकं स्मरणीयमिति शकुन्तलाहस्ते स्वयमेव पिनद्धम्। तदेषः एव तस्मिन्स्वाधीनः उपायः भविष्यति।)
अनसूया – एहि। देवकज्जं दाव से णिव्वत्तम्ह। (एहि, देवकार्यं तावदस्याः निर्वर्तयाव।)
(इति परिक्रामतः)
प्रियंवदा – (विलोक्य) अनसूये, पेक्ख दाव वामहत्थविणिहिदवअणा आलिहिदा विअ पिअसही तग्गदाए चिन्ताए अत्ताणं पि ण विभावैदि। किं उण अदिधिविसेसं। (अनसूये, प्रेक्षस्व तावत् वामहस्त-विनिहितवदना आलिखिता इव प्रियसखी तद्गतया चिन्तया आत्मानमपि न विभावयति। किं पुनः अतिथिविशेषम्।)
अनसूया – पिअंवदे, दोण्णं जेव णो हिअए एसो वुत्तन्तो चिट्ठदु। रक्खणीआ खु पइदिपेलवा पिअसही। (प्रियंवदे, द्वयोः एव नौ हृदये एषः वृत्तान्तः तिष्ठतु। रक्षणीया खलु प्रकृतिपेलवा प्रियसखी।)
प्रियंवदा – को दाव उण्होदएण णोमालिअं सिञ्चदि। (को तावदुष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति)
(इत्युभे निष्क्रान्ते)
बंगाली वाचना के इस पाठ में परिवर्तन करके देवनागरी-दाक्षिणात्य में ऐसा दिखाया जाता है कि प्रियंवदा दुर्वासा से शाप-मोचन की प्रार्थना के लिए गयी थी। अब यह सोचना है कि इन दोनों में से कहाँ पर मौलिक पाठ होने की सम्भावना है?। निम्न स्तरीय
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 71
पाठालोचना के अनुसार तो बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतर है। और कश्मीर की शारदा लिपि में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतम होने का दावा करता है, क्योंकि बंगाली-लिपि से पहले शारदा-लिपि का प्रचलन हुआ था। किन्तु लिपियों की ऐतिहासिकता से बाहर निकलकर सोचा जाय तो भी यहाँ पर अनसूया का स्वभाव अधिक स्थिर और काबिल होने से वही दुर्वासा के पास पहुँचे उसमें औचित्य है। देवनागरी पाठ के अनुसार यदि अनसूया के द्वारा प्रियंवदा को इस कार्य के लिए भेजा जाता है तो वह उसके नटखट चरित्र के साथ संगत नहीं होता है। अतः शाप-मोचन के लिए, बंगाली पाठानुसार अनसूया को ही भेजा जाय वही मौलिक प्रतीत होता है। और इसके प्रतिपक्ष में, याने देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में, शाप-मोचन की याचना के लिये प्रियंवदा का जाना पाठ-विकृति का परिणाम लगता है। क्योंकि वह प्रियंवदा के चरित्र के अनुरूप नहीं है।
इस प्रसंग का पूर्वार्द्ध बंगाली पाठ में भले ही सुरक्षित रहा हो, किन्तु जैसे ही हम आगे चल कर देखते हैं तो उसमें भी इस प्रसंग का उत्तरार्ध दूषित हुआ है ऐसा दिख रहा है। जैसे, शकुन्तला को जो शाप मिला है उसको छुपा कर रखने का प्रस्ताव अनसूया ने रखा है। यह बात अनसूया की प्रकृति के अनुरूप नहीं लगता है। इस विसंगति को समझने के लिए अवशिष्ट रही मैथिली एवं काश्मीरी वाचना के पाठ को देखना होगा। मैथिली में तो बंगाली पाठ जैसा ही चित्र है। केवल काश्मीरी पाठ में ऐसा है कि दुर्वासा के शाप की बात दो सहेलियों के बीच संगोपित रखने का प्रस्ताव प्रियंवदा के द्वारा रखा जाता है। तुलनात्मक अभ्यास से यह बात साफ प्रकट होती है कि काश्मीरी पाठ में शापमोचन के लिए अनसूया जाती है और शाप को छुपा कर रखने की बात प्रियंवदा कहती है। लेकिन इस काश्मीरी पाठ का जब मैथिली में संक्रमण हुआ होगा तब अनसूया के मुख में एक अधिक उक्ति का प्रक्षेप किया गया है: “एहि देवदाकज्जं दाव णिव्वुत्तमह। (इति परिक्रामतः।)” । (अर्थात् चलो हम दोनों उसका यानि शकुन्तला का देवकार्य सम्पन्न करें। ऐसा एक अधिक वाक्य बोलकर दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करती हैं।) किन्तु इस नये अधिक वाक्य के कारण उसके पीछे आ रही तीनों उक्तियों की वक्ता उलटा-पुलटा हो जाती हैं। जिसके कारण शाप को छुपा के रखने की बात, जो मूल में प्रियंवदा ने की थी, वह अनसूया के मुख में आ जाती है। मैथिली वाचना में मिल रहा उपर्युक्त एक अधिक वाक्य प्रक्षिप्त है ऐसा मानने का आधार क्या है? तो उसके दो समाधान हैं: (1) दुर्वासा का शाप मिलने जैसी भूकम्पीय घटना आकारित हो जाने के बाद उसकी छाया से बाहर निकलकर क्या अनसूया देवता-कार्य के निर्वर्तन को याद करने की मानसिकता में रह सकती है? यह सम्भव ही नहीं है। अतः काश्मीरी वाचना के पाठ में जैसे प्रियंवदा कहती है कि हमारी सखी को राजा ने अङ्गूठी दे रखी है, उससे वह स्वाधीनोपाय है। तब दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करके सीधा उसी कुटीर पर जाय (जहाँ शकुन्तला अपने प्रिय के विचारों में खोई खोई बैठी है) वही
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उचित है। (2) यह दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त होने का प्रमाण यह भी है कि शुरू में बताया गया है कि शकुन्तला को (स्वयं) सौभाग्यदेवता अर्चन भी करना है इस लिए कुछ ज्यादा पुष्पों का चयन किया जाय। इस पूर्वोक्त सन्दर्भ के विरुद्ध जब बोला जाता है कि-एहि, देवकार्यं तावद् अस्याः (शकुन्तलायाः) निर्वर्तयाव। तब वह असंगत सिद्ध होता है। क्योंकि शकुन्तला के बदले में सहेलियाँ ही उसके लिए देवकार्य सम्पन्न करने के लिए उद्यत हो जाती हैं। और देवता के पास न जा कर वे दोनों पहुँचती तो वहीं हैं जहाँ शकुन्तला अन्यमनस्क होकर बैठी है! अतः, मैथिली वाचना में दोनों सहेलियों के रंगमंच पर परिक्रमण को दिखलाते हुए जो एक अधिक वाक्य मिलता है, वह प्रक्षिप्त ही है। जिसका अनुसरण करते हुए बंगाली वाचना में, (और तदनन्तर देवनागरी इत्यादि में भी) प्रियंवदा की उक्ति अनसूया की बन जाती है।
शाप-मोचन का उपाय माँग कर अनसूया वापस आकर सब बात बताती है तो प्रियंवदा कहती है कि दुष्पन्त ने हस्तिनापुर जाते समय शकुन्तला को अङ्गूठी दी है जिससे वह स्वाधीनोपाय है, अब चिन्ता का कोई कारण नहीं है। तब प्रियंवदा से यह बात जान कर अनसूया ने जरूर इतनी सावधानी बरती है कि उसने शकुन्तला से वह अङ्गूठी किसी भी तरह से प्राप्त करके सुरक्षित करली है, और चतुर्थाङ्क के अन्त में (दोनों वाचनाओं के पाठ के अनुसार) अभिज्ञानाभरण रूप उस राजमुद्रा को शकुन्तला के हाथ में अनसूया ने ही सौंप दिया है। क्योंकि उसी अनसूया ने दुर्वासा के मुख से प्रत्यक्ष में सुना था कि किसी अभिज्ञानाभरण से ही शाप की निवृत्ति होगी। इस लम्बी चर्चा से सारभूत बात यह निकलती है कि (1) शाप-मोचन माँगने के लिये अनसूया का जाना-वही मौलिक सिद्ध होता है तथा (2) शाप की बात छुपा के रखने का प्रस्ताव अनसूया का नहीं हो सकता, वह प्रियंवदा का ही है। बंगाली पाठ में पहली बात सुरक्षित रही है, लेकिन दूसरी अशुद्धि का प्रवर्त्तन मैथिली परम्परा में हुए प्रक्षेप के कारण हुआ है। परिणामतः तीसरे स्तर पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठों में दोनों तरह की अशुद्धियाँ संक्रान्त होकर सर्वत्र प्रसारित हो गयी होंगी।
अब एक छोटी सी आवश्यक स्पष्टता की जाती है: मौलिक पाठ में विचलन होने का क्रम काश्मीरी से शुरू करके, दूसरे स्तर पर मैथिली है और तदनन्तर तृतीय स्तर पर बंगाली वाचना है ऐसा मन्तव्य कहाँ से प्राप्त हुआ है? ऐसा प्रश्न किया जाय तो उसका सप्रमाण उत्तर अनुगामी अनुच्छेद में होने वाला है।
4-1-1 चतुर्थाङ्क में श्लोक-संख्या 21 से 26 तक की मिलती है। जैसे, मैथिली वाचना में 26 श्लोक हैं, तो बंगाली वाचना में 24 श्लोक हैं। किन्तु राघवभट्ट की देवनागरी वाचना में केवल 21 श्लोक प्राप्त होते हैं। इस तरह की कम-ज्यादा श्लोकसंख्या ही हमें विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि किस वाचना में मौलिक पाठ सुरक्षित रहा होगा,
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या किस में प्रक्षेप हुआ होगा, अथवा किस वाचना के पाठ में संक्षेप हुआ होगा?। बंगाली वाचना के पाठ में, चतुर्थाङ्क के आरम्भ में प्रभात वेला का आकलन करने के लिए शिष्य पर्णकुटीर से बाहर निकल कर जिन चार श्लोकों का गान करता है, वे निम्नोक्त हैं
यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीनाम्,
आविष्कृतोऽरुणपुरःसर एकतोऽर्कः।
तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां,
लोको नियम्यत इवैष दशान्तरेषु⁴⁷।।4-2
अपि च-
अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे
दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।
इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनेन
दुःखानि नूनमतिमात्रदुरुद्वहानि⁴⁸।।4-3
अपि च-
कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रञ्जयत्यग्रसन्ध्या
दार्भं मुञ्चत्युटजपटलं वीतनिद्रो मयूरः।
वेदिप्रान्तात् खुरविलिखिताद् उत्थितश्चैष सद्यः,
पश्चादुच्चैर्भवति हरिणः स्वाङ्गमायच्छमानः⁴⁹।।4-4
अपि च-
पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि कृत्वा सुमेरोः
क्रान्तं येन क्षयिततमसा मध्यमं धाम विष्णोः।
- (अनुवाद)-एक ओर चन्द्रमण्डल अस्तशिखर को पहुँच रहा है और एक ओर अरुण को आगे किये उदित हो रहा है सूर्य। दो तेज और दोनों का एक साथ व्यसन (अस्त) तथा अभ्युदय। इनसे लोक को शिक्षा मिलती है अपनी दशा बदलने की। कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
- (अनुवाद)-चन्द्र डूब गया तो वही कुमुद्वती अब आँखों को आनन्दित नहीं कर रही है। इष्ट (प्रिय) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अबलाओं को अत्यन्त दुःसह होते हैं।-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
- (अनुवाद)-और देखो बेरों के ऊपर पड़ी ओस को उषाकाल रंग रहा है, जागा मोर लकड़ी के उटज पटल को छोड़ रहा है, खुरों से खुदे वेदिका के छोर से हाल ही उठ खड़ा हुआ मृग अपने शरीर को लम्बा खींचते हुए पिछले भाग से ऊँचा हो रहा है-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 398
74 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
सोऽयं चन्द्रः पतति गगनादल्पशेषैर्मयूखै-
रत्यारूढिर्भवति महतामप्यपभ्रंशनिष्ठा⁵⁰ ।। 4-5
(द्विवेदी, 2008)
बंगाली वाचना के पूर्वनिर्दिष्ट चार श्लोकों का एक साथ होना सम्भव नहीं लगता है, क्योंकि नाटक जैसी समय सीमा में आबद्ध कला में इतना लम्बा वर्णन असह्य होता है। एवमेव, यहाँ तो कण्वाश्रम का शिष्य केवल प्रभातकाल का आकलन करने के लिए इन श्लोकों का गान करता है। इस सन्दर्भ को देखते हुए यहाँ चार चार श्लोकों का होना सम्भव नहीं है। मतलब कि यहाँ बंगाली वाचना पाठ मौलिकता के नजदीक नहीं लगता है। अतः अन्य वाचनाओं में इस स्थान की क्या स्थिति है? इसको ध्यान में लेकर पाठालोचना शुरू करनी होगी। जैसे, उपर्युक्त चार श्लोकों में से पहले दो “याति”० एवं “अन्तर्हिते”० श्लोकों को देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं ने मान्य किया है। तथा काश्मीरी वाचना ने केवल “कर्कन्धूनाम्”० और “पादन्यासं”० को ही मान्य किया है। अर्थात् इन दोनों वाचनाओं में केवल दो दो श्लोकों को ही स्थान मिल पाया है। परन्तु दोनों वाचनाओं ने जिन दो श्लोकों को मान्य रखा है वे दोनों भिन्न-भिन्न श्लोक हैं। अलबत्ता चार चार श्लोकों को स्वीकारनेवाली बंगाली पाठपरम्परा की अपेक्षा से केवल दो ही श्लोकों को मान्य करनेवाली वाचनाओं को ही बेहतर मानना होगा। अतः यहाँ सोचना होगा कि केवल दो दो श्लोकों को प्रस्तुत करनेवाली देवनागरी एवं काश्मीरी जैसी वाचनाओं में से किस का पाठ मौलिक, अर्थात् कालिदास-प्रणीत होगा?
देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में जिन दो श्लोकों को (“याति”० एवं “अन्तर्हिते”०) स्थान मिला है, उन दोनों में शकुन्तला के भावी दुर्दैव का सूचन रखा गया है, किन्तु किसी भी नाट्यकृति में विचारों की पुनरुक्ति करने में समय की हानि होती है, जो नाट्यकला में असह्य मानी गयी है। दूसरा, इन दोनों श्लोकों को “अपि च” निपात से बाँधा गया है, लेकिन “अपि च” के विनियोग का पूर्वोक्त स्वारस्य यहाँ घटित नहीं होता है। तीसरा, इन श्लोकों में जो वसन्ततिलका छन्द का विनियोग हुआ है, वह विरह, करुणा, दुःख भरे भावों की अभिव्यक्ति के लिए संगत नहीं बैठता है। इन श्लोकों में तो शकुन्तला के भावी दुःख का सूचन किया जा रहा है, अतः यहाँ वसन्ततिलका जैसे छन्द को देख कर भी यह सूचित होता है कि ये कालिदास-प्रणीत नहीं हो सकते हैं।
इसी तरह से, भूतकाल में आचार्य शरदरञ्जन राय (राय, 1908) ने भी इन दोनों को
50. (अनुवाद)– जिस (इन्द्र) ने पर्वतराज सुमेरु के सिर पर पादन्यास पर अँधियारी दूर करते हुए भगवान् विष्णु के दूसरे धाम पर विचरण किया था वही चन्द्र अब बहुत कम बची किरणों के साथ आकाश से गिर रहा है। अत्यारूढि बड़ों को भी पतन का मुख दिखलाती है। –कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2) अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जयिनी, 2008, पृ. 398