भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 262 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

40 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

के शमन के लिये कण्व तीर्थयात्रा पर चल पड़े हैं। यदि उन्होंने जान लिया है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है, तो वे आश्रम से क्यों चल पड़े हैं, यह सवाल पैदा होता है। तथा यह बात उन्होंने अकेली प्रियंवदा को ही क्यों कही थी, ऐसा दूसरा सवाल भी उठता है। महाकवि कालिदास जैसे परिणतप्रज्ञ नाट्यकार से ऐसी परस्पर विसंगतताओं से भरी प्रस्तुति सम्भव ही नहीं है। अतः उसको प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा।

1-1-4 बंगाली वाचना के प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण देखने के बाद, उसमें कुत्रचित् संक्षेप भी हुआ है उसका भी निरूपण करना चाहिए:

राजा—उपपद्यते,

मानुषीभ्यः कथं नु स्यादस्य रूपस्य संभवः।
न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्।।
1-25

(शकुन्तला सव्रीडाऽधोमुखी तिष्ठति)

राजा—(आत्मगतम्) हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः।

प्रियंवदा—(सस्मितम् शकुन्तलां विलोक्य) पुणो वि वक्तुकामो विअ अज्जो। (पुनः अपि वक्तुकामः इव आर्यः।) (शकुन्तला सखीमङ्गुल्या तर्जयति।)

राजा—सम्यगुपलक्षितं भवत्या। अस्ति नः सुचरितश्रवणलोभादन्यदपि प्रष्टव्यम्।

प्रियंवदा—तेण हि अलं विआरिदेण। अणिज्जन्तणणिओओ क्खु तवस्सिअणो। (तेन हि अलं विचारितेन। अनियन्त्रणनियोगः खलु तपस्विजनः।)

राजा—एतत्पृच्छामि

वैखानसं किमनया व्रतमाप्रदानाद् व्यापाररोधि मदनस्य निषेवितव्यम्।
अत्यन्तमेव सदृशेक्षणवल्लभाभिराहो निवत्स्यति समं हरिणाङ्गनाभिः।।
1-26

प्रियंवदा—अज्ज धम्माअरणपरव्वसो अअं जणो। गुरुणो उण से अणुरूववरप्पदाणे संकप्पो। (आर्य, धर्माचरणपरवशः अयं जनः। गुरोः पुनः अस्याः अनुरूपवरप्रदाने संकल्पः।)

राजा—(आत्मगतम् सहर्षम्)

भव हृदय साभिलाषं सम्प्रति संदेहनिर्णयो जातः।
आशङ्कसे यदग्निं तदिदं स्पर्शक्षमं रत्नम्।।
1-27

शकुन्तला के जन्म का वृत्तान्त प्रियंवदा से जान लेने के बाद, दुष्यन्त को मालूम हो जाता है कि शकुन्तला राजर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की संतति है। अब दुष्यन्त के