अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 41
मनोरथों को साकार होने का अवकाश निश्चित है। वह अपने आप को कहता है कि हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः। किन्तु इस उक्ति के बाद भी एक गद्य वाक्य था, जो किसी अज्ञात सूत्रधार ने शायद हटा दिया है, संक्षेप कर लिया है। वह वाक्य मैथिली और काश्मीरी वाचनाओं में, तथा देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं में सुरक्षित रहा है। जैसे मैथिली में, “किन्तु परिहासोदारं वरप्रार्थनमस्याः श्रुत्वापि, व्रतद्वैतकातरं मे मनः।”, उसी तरह से देवनागरी में, “किन्तु सख्याः परिहासोदाहृतां वरप्रार्थनां श्रुत्वा, धृतद्वैधीभावकातरं मे मनः”। नायक ने जान लिया कि शकुन्तला ब्राह्मणकन्या नहीं है, इस लिए उसके मनोरथ को सफल होने का अवकाश है। फिर भी उसका मन द्विधाभाव का अनुभव कर रहा था। शकुन्तला क्या मदनव्यापार को रोकनेवाले वैखानस व्रत का आचरण सदैव करनेवाली है, या फिर वह व्रत विवाह पर्यन्त ही है? इस द्विविधा को प्रकट करनेवाला दूसरा वाक्य बंगाली वाचना में से हटाया गया है। यह द्विविधापूर्ण स्थिति यद्यपि आत्मगत उक्ति के द्वारा रखी गयी है, तथापि उसका मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए लगता है कि जो उत्तरवर्ती संवाद-शृङ्खला है, वह पूर्ण रूप से इस द्विविधा की निवृत्ति के लिए ही प्रस्तुत हो रही है। तथा अन्त में श्लोक-27 से इस द्विविधा का उपशमन भी किया गया है।।
1-2-0 देवनागरी वाचना के पाठ में ही कालिदासीय कवित्व का संस्पर्श है-ऐसा मानना आत्मलक्षिता से भरा है, एवं तुलनात्मक अभ्यास के अभाव का परिणाम है। सुप्रचलित एवं बहुव्याख्यात होते हुए भी देवनागरी वाचना का पाठ मौलिकता से दूर हट गया है क्योंकि उसमें बहुशः संक्षिप्त किया गया पाठ ही संचरित हुआ है, और कुत्रचित् उसमें भी प्रक्षिप्तांश मिलते हैं। इसकी उच्च स्तरीय पाठालोचना करना अनिवार्य है।
1-2-1 देवनागरी वाचना में प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप का उदाहरणः कृष्णमृगानुसारी राजा दुःषन्त / दुष्यन्त के मार्ग में बीच में आकर वैखानस कहता है भो राजन्, आश्रममृगोऽयम्, न हन्तव्यो न हन्तव्यः। तब राजा ने अपना बाण वापस ले लिया। इससे प्रसन्न हुए वैखानस ने राजा को आशीर्वाद दिया कि-
सदृशमेतत् पुरुवंशप्रदीपस्य भवतः।
जन्म यस्य पुरोर्वंशे युक्तरूपमिदं तव।
पुत्रमेवंगुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहि।।
(1-11)
इसके पश्चात्, वैखानस के साथ आये हुए दोनों शिष्यों ने अपने हाथ उठा कर उसी आशीर्वाद का अनुवाद करते हुए कहा है-सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रमाप्नुहि।। यहाँ देवनागरी वाचना के पाठ में स्पष्ट रूप से पुनरुक्ति हो रही है। जो आशीर्वचन वैखानस ने दिये हैं उसका दृढीकरण करनेवालों का दर्जा मात्र शिष्य का है। अतः उसका औचित्य कितना? इससे प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ अंश प्रक्षिप्त एवं परिवर्तित हुआ है। इसका समाधान