अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें42 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
बंगाली वाचना में होता है। बंगाली पाठ में रंगमंच पर केवल दो तापस ही आते हैं और उनमें से एक ही तापस ने आशीर्वचन कहे हैं। दूसरे तापस ने उसकी पुनरुक्ति नहीं की है। वहाँ पर उपर्युक्त श्लोक भी नहीं आता है। तापस ने केवल गद्य वाक्य में ही आशीर्वाद दिये हैं। हाँ, इतना जरूर कहना चाहिए कि देवनागरी वाचनानुसारी प्रस्तुति में दृश्य की अभिनेयता बढ़ जाती है। शायद इसी लिये किसी सूत्रधार की प्रतिभा ने पूर्वोक्त श्लोक का प्रक्षेप करवाया होगा।
1-2-2 प्रथमाङ्क में श्लोक का संक्षेपः (बंगाली वाचनानुसार) कण्व मुनि के आश्रम के पास पहुँचते ही राजा ने यह तपोवन का भाग है ऐसा सारथि को बताते हुए निम्नलिखित दो श्लोकों में उसका वर्णन किया है-
नीवाराः शुककोटरगर्भमुखभ्रष्टास्तरूणामधः
प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः।
विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः॥
1-13
अपि च-
कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः शाखिनो धौतमूला
भिन्नो रागः किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन
एते चार्वागुपवनभुवि च्छिन्नदर्भाङ्कुरायां
नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति॥
1-14
श्री पी. एन. पाटणकर के द्वारा संपादित शकुन्तल में दोनों श्लोक यथावत् मान्य किये गये हैं। किन्तु राघवभट्ट ने शाकुन्तल के जिस पाठ पर टीका लिखी है वह (अति)संक्षिप्त किया गया पाठ है। उस पाठ में “अपि च” से सम्बद्ध किया गया कुल्याम्भोभिः० वाला दूसरा श्लोक हटाया गया है। अर्थात् इस श्लोक पर राघवभट्ट ने टीका ही नहीं लिखी है। इस श्लोक को यदि मौलिक मानते हैं तो उसको हटाने का कारण यही हो सकता है कि मंचन के दौरान समय-मर्यादा को, अथवा नट की स्मृति-मर्यादा को ध्यान में रखते हुए उसे काटा जा सकता है। यदि इस श्लोक को मौलिक नहीं मानते हैं तो उसका क्या प्रमाण हो सकता है, वह सोचना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि प्रथम श्लोक में” विश्वासोपगमाद् अभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगाः” कहा गया है, तथा दूसरे श्लोक में भी “नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति” बताया जाता है। इन दोनों वर्णनों में पुनरुक्ति है, जो नाटक जैसी समयबद्ध कला में असह्य होती है। कालिदास जैसे नाट्यकार शाकुन्तल में कहीं भी पुनरुक्ति नहीं