अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें24 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
और दूसरी मृगी हो) खड़े हों-ऐसा वह चित्रित करना चाहता है। यहाँ मालिनी, हंस, हिमालय, हरिण और वल्कल-वस्त्र इत्यादि का उल्लेख तो (प्रथम अङ्क के कण्वाश्रम के) पूर्वदृष्ट स्थल का ही स्मरण है ऐसा तुरन्त समझ में आता है।
- किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि मृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई (कण्डूयमाना) मृगी चित्रित करने की भावना दुष्यन्त के मन में कैसे / कहाँ से पैदा हुई होगी?
यहाँ चतुर्थ बिन्दु में जो प्रश्न उपस्थित किया गया है उसका उत्तर देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क के संक्षिप्त पाठ में से मिलता ही नहीं है। उसका उत्तर तो केवल बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को देखने पर ही मिलता है। बंगाली वाचनावाले अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में कहा गया है कि, शकुन्तला के कान में लगाये उत्पलपुष्प की परागरज (परिमल) पवन के कारण उसकी आँख में गिरे हैं, अतः उसकी दृष्टि कलुषित हुई है (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹²। इस प्रसङ्ग में दुष्यन्त ने वहाँ कहा था कि मैं मेरे वदन- मारुत से तुम्हारी दृष्टि को स्वच्छ कर देने को तैयार हूँ।¹³ तृतीयांक के इसी प्रसङ्ग को लक्षित करते हुए महाकवि कालिदास ने, षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वामनेत्र खुजलाती (कण्डूयमाना) मृगी का चित्र आकारित करने की इच्छा व्यक्त करवायी है। अर्थात् बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला के जो कलुषित नेत्र को परिमार्जित कर देने का प्रसंग आता है उसका प्रतिदृश्य षष्ठाङ्क में खड़ा किया गया है। किन्तु देवनागरी वाचना के तृतीयांक में वह नेत्रकलुषित होने का प्रसंग हटाया गया है, अतः उस वाचना के षष्ठांक में “कण्डूयमानाम् मृगीम्” का निर्देश होते हुए भी उस चाहत का बीज कहाँ है यह प्रेक्षक नहीं जान सकता है।
2-2 यह भी स्मरणीय है कि इस नाटक में सर्वत्र हरिण को शकुन्तला का प्रतीक बनाया गया है। प्रथमाङ्क में आश्रममृग को नहीं मारने की शर्त पर उसको चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद मिला है। जिसका गर्भितार्थ यह है कि शिकारी बन कर तो दुष्यन्त को हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला नहीं मिलनेवाली है। हरिण हो कर ही हरिणी को प्राप्त किया जा सकता है। पञ्चमाङ्क के प्रत्याख्यान-प्रसंग में उसने भले ही ताना मारते हुए बोल दिया था कि “द्वावप्यत्रारण्यकौ। सर्वः सगन्ध्विषु विश्वसति।” लेकिन अनजान में भी बोला गया एक परम सत्य था। अब धीवर से अङ्गूठी मिल जाने पर उसे समझ में आ गया है कि हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला को प्राप्त करने के लिए उसको भरोसेमन्द हरिण होकर ही
- राजा- सुन्दरि, कर्णोत्पलसंनिकर्षाद् ईक्षणसादृश्यमूढोऽस्मि। (इति मुखमारुतेन चक्षुः सेवते) पृ. 40
- राजा -(सस्मितम्) यदि मन्यसे अहमेनाम् वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। अभिज्ञानशाकुन्तलम्। सं. रिचार्ड पिशेल, हार्वर्ड युनि. प्रेस, पृ. 40