अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 23
लेकर अन्त तक, एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की योजना से नाट्यकार्य प्रवर्तित किया गया है। इस प्रकार की नाट्य-शैली को आन्तरिक प्रमाण के रूप में आधार बना कर सोचा जाय तो तृतीयाङ्क का पाठ, जो देवनागरी पाठपरम्परा में लघु-आकार का है, और बंगाली पाठपरम्परा में बृहदाकार का है, इन दोनों में से कहाँ पर मौलिकता होगी, इस प्रश्न का समाधान मिल जाता है।
2-1 बृहदाकार की बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क का पाठ लेकर उसकी तुलना षष्ठाङ्क के पाठ की साथ करनी होगी। इससे इन दो अङ्कों में भी रूप-प्रतिरूप की एक लाक्षणिक योजना अन्तर्निहित है। षष्ठांक में, दुष्यन्त ने चित्रफलक में दो सहेलियों के साथ में रही शकुन्तला का चित्र बना लिया है। तब विदूषक पूछता है कि-भोः, अपरं किमत्र लिखितव्यम्। (अब इसमें और क्या चित्रित करना है?) इसके जवाब में दुष्यन्त ने प्रेमाविष्ट होकर एक श्लोक प्रस्तुत किया है जो शाकुन्तल की सभी वाचनाओं में सुरक्षित रहा है:
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निमातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
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अब सोचना यह है कि धीवरप्रसङ्ग के बाद, दुष्यन्त को जब शकुन्तला का स्मरण पूर्ण रूप से हो गया है तब विरहातुर बना दुष्यन्त पूर्वानुभूत (प्रथम एवम् तृतीय अङ्क के) कौन कौन से प्रसङ्गों को चुन चुन कर चित्राङ्कित करना चाहता है (राघवभट्ट, 2006)¹¹। तो उपर्युक्त श्लोक में जो जो कहा गया है उसका ध्यान से परीक्षण करने की आवश्यकता है:
- दुष्यन्त कण्वाश्रम के पास बहती हुई मालिनी नदी को याद कर रहा है। जिसकी सिकता में बैठे हुए हंस-मिथुन को वह चित्रित करना चाहता है।
- मालिनी की पार्श्वभूमि में स्थित पार्वती के पिता अर्थात् हिमालय को वह चित्रित करना चाहता है जिसकी निश्रा में चामरों / हरिणों के यूथ बैठे हो।
- वहाँ एक वृक्ष की शाखाओं पर ऋषिमूनिओं के अथवा शकुन्तला के वल्कल सुखाने के लिये टाँगे गये हों और उस वृक्ष की छाया में, नीचे दो मृग (जिसमें एक मृग हो
- कार्येति। अनेन पद्येनाश्रमस्थं पूर्वानुभूतं तदानींतनम् उद्दीपनं विभावगणं स्मरति। -अभिज्ञानशाकुन्तलम् (राघवभट्टस्य टीकया सहितम्), सं. नारायण राम आचार्य, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, 2006 (पृ. 212)