भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 262 में से

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चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इसके प्रतिपक्ष में, बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में मध्याह्न, सायन्सन्ध्या¹⁰ और फिर रात्रि का सन्दर्भ स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है। इससे भी सूचित होता है कि बंगाली पाठ में मौलिकता की सुरक्षा हुई होगी। जिसके कारण देवनागरी अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयाङ्क में जहाँ 24 श्लोक हैं, वहाँ बंगाली अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है। सारतः कहा जाय तो तृतीयाङ्क में संक्षेप या प्रक्षेप का निर्णय समय-संगति को ध्यान में लेकर करना चाहिए, वही एक अकाट्य दृढ़ आन्तरिक प्रमाण है।

2-0 दूसरे प्रमाण के रूप में कवि की नाट्य-शैली को परखना चाहिए। जो नाट्य-शैली समग्र कृति में साद्यन्त व्याप्त है ऐसा दिखता है तो वही एक सबल आन्तरिक प्रमाण है। पाठालोचना में ऐसे ही प्रमाण को पुरस्कृत करते हुए समीक्षित पाठ की उच्चस्तरीय समीक्षा की जाती है। अभिज्ञानशकुन्तल नाटक के वस्तुग्रथन में "एक दृश्य (रूप) के सामने उसी प्रकार का एक दूसरा प्रतिदृश्य (प्रतिरूप)" खड़ा करने की नाट्य-शैली दिखायी दे रही है। जैसे कि, प्रथम अङ्क में शिकारी दुष्यन्त का प्रवेश होता है और "न हन्तव्यो, न हन्तव्यः" ऐसे शब्द सुनायी पड़ते हैं। तो सप्तम अङ्क में जब सिंहशावक को सतानेवाला सर्वदमन भरत का दृश्य शुरू होता है तो वहाँ पर "मा खलु, मा खलु चापलं कुरु" ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। उसी तरह से द्वितीयाङ्क और षष्ठांक की तुलना भी विचारणीय है। वहाँ पर विदूषक राजा के मृगया-व्यसन से क्षुधातुर, तृषातुर और श्रमातुर स्थिति में दयाजनक पीड़ा का अनुभव करता है। लेकिन उसी अङ्क के अन्त में वह राजा को आश्रम में रहने की अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होता है और युवराज होकर रंगभूमि से बिदा होता है। इसी दृश्य के सामने षष्ठांक के प्रवेशक में, धीवर नगररक्षकों के हाथ से मारा-पीटा जा रहा है। निर्दोष मछेरा भी दयाजनक पीड़ा का अकारण अनुभव करता है। लेकिन वह भी राजा के लिए दुःषन्त-नामधेयांकित अंगूठी देता है, जो राजा को शकुन्तला की याद दिलाने में सहायक होती है। अब यह धीवर भी शूली से उतर कर हस्तिस्कंध पर आरोहित होने का संतोष लेकर रंगभूमि से बिदा लेता है। तृतीय अङ्क में विटपान्तरित दुष्यन्त शकुन्तला की मदनावस्था को सुनता है (शाकु. 3/8 के बाद) तब बोलता है "श्रुतं श्रोतव्यम्।" फिर वही दुष्यन्त पञ्चमाङ्क में शकुन्तला को ताना मारता सुनायी पड़ता है कि" श्रोतव्यम् इदानीं संवृत्तम्।" (शाकु. 5/22 के ऊपर)। उसी तरह से प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में, दुष्यन्त भ्रमर के प्रतिस्पर्धी के रूप में "वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर हतास्त्वं खलु कृती" (शाकु. 1/20) कहता है। वही दुष्यन्त षष्ठाङ्क में, चित्रफलक में भ्रमरबाधा प्रसङ्ग का फिर से निरूपण करता है। तब भ्रमर को कहता है कि "एषा कुसुमनिषण्णा तृषतापि सती भवन्तमनुरक्ता। प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति। (शाकु. 6/19)" यहाँ वह भ्रमर को उपदेष्टा के रूप में दिखाया गया है। इस तरह से पूरे नाटक में, आदि से


  1. त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं न जहासि मे। दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः।। 3-29