अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 21
के सविशेष समर्थक बन सके ऐसे कुछ आन्तरिक प्रमाण, जो सर्वथा कृतिनिष्ठ ही हैं, उसकी ओर सहृदयों का ध्यान आकृष्ट किया जाता है$^8$।
1-1 प्रो. श्री एस. के. बेलवलकर जी ने सब से पहले इस बात की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुए अभिज्ञानशाकुन्तल के (तृतीयाङ्क के) पाठ में समयसम्बन्धी जो सूचना दी गयी है, उनमें अन्तर्निहित एक विसंगति खटकनेवाली है। जैसे कि-तृतीयाङ्क का आरम्भ मध्याह्न में होता है। नायक दुष्यन्त उग्र-आतपवाले मध्याह्न में शकुन्तला को ढूँढ़ने के लिए मालिनी नदी के आसपास लतावलयों में जाता है।$^9$ उसके बाद पुष्पशय्या पर लेटी हुई शकुन्तला रंगमंच पर आती है, उसके साथ दो सहेलियाँ भी है। यहाँ क्रमशः शकुन्तला की शरीरबाधा का कारण उन्मीलित होता है, शकुन्तला मदनलेख लिखती है और राजा प्रकट होकर शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में बताता है। इसको सुन कर आश्वस्त हुई दोनों सहेलियाँ मृगबाल को उसकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बनाकर (नायक-नायिका को एकान्त देने के लिए) वहाँ से चली जाती हैं। अब एकाकिनी शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाने को तत्पर होती है तो राजा उसे कहते हैं कि-"सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदल-कल्पितस्तनावरणम् आतपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः। (3-19) (इति बलादेनां निवर्तयति।)" यहाँ दुष्यन्त ने साफ बताया है कि अभी दिवस परिणत नहीं हुआ है। लतामण्डप से बाहर कड़ी धूप में तुम कैसे जाओगी? किन्तु, देवनागरी वाचना के पाठ में दुष्यन्त के इस वाक्य से सूचित होता है कि यह मध्याह्न का समय चल रहा है। उसके बाद नायक-नायिका के बीच केवल पाँच-छह संवाद ही होते हैं और तुरन्त नेपथ्य से कहा जाता है कि-चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। हे चक्रवाकी, अपने प्रियसहचर से बिदा ले लो, रात्रि का आगमन हो गया है।। इस तरह से देवनागरी पाठ में, मध्याह्न में शुरू हुई एकान्त मिलन की घटना केवल पाँच-छह संवादों में समेट ली जाती है और तुरन्त रात्रि का आगमन होने की सूचना दी जाती है। सुज्ञ प्रेक्षक देख सकेगा कि मध्याह्न एवं रात्रि के बीच में कितना लम्बा अन्तराल पड़ा है और इस समयावधि में पाँच-छह संवाद से कहीं अधिक बातचीत एवं घटना घटित होना अपेक्षित है। लेकिन देवनागरी पाठ में ऐसा कुछ विस्तार है ही नहीं। अतः सिद्ध हो जाता है कि देवनागरी पाठ में अनेक संवादों की भारी कटौती की गयी है।
- डॉ० एस.के. बेलवलकरजी, पूना ने "निसर्ग-कन्या शकुन्तला" (कालिदास-ग्रन्थावली, अनु. सीताराम चतुर्वेदी, अलीगढ़, 1963) शीर्षक वाले आलेख में जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वे आन्तरिक सम्भावना के बलवत्तर उदाहरण हैं।
- क्व नु खलु संस्थिते कर्मणि सदस्यै रनुज्ञातः श्रमक्लान्तमात्मानं विनोदयामि। (निःश्वस्य) किं न खलु मे प्रियादर्शनादृते शरणमन्यत्। यावदेना मन्त्रामयिष्यामि। (सूर्यम् अवलोक्य) इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति। तत्रैव गच्छामि। -अभिज्ञानशाकुन्तलम्, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, 2006, पृ. 87