अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें20 | चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
विवादास्पद एवं कदाचित् अन्यथासिद्ध हो सकता है। अतः काव्य की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा करने से पहले उसके पाठ की आलोचना करना अनिवार्य है।
0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का पाठ मुख्य रूप से दो-लघु और बृहत्-पाठपरम्पराओं में प्रचलित हुआ है। किन्तु, इस नाटक की रचना एक ही कवि ने की है, अर्थात् यह नाटक एककर्तृक है तो उसका मूल पाठ भी एक ही स्वरूप का होना अपेक्षित है। दो तरह का अभिज्ञानश(शा)कुन्तल तो कालिदास ने नहीं लिखा होगा। अतः हमें यह ढूँढना ही चाहिये कि इस नाटक की दो तरह की पाठपरम्पराओं में से किसका पाठ मौलिक होने की सम्भावना ज्यादा है। तार्किक दृष्टि से सोचा जाय तो यहाँ दो तरह की सम्भावनायें दिखायी देती हैं। जैसे कि, 1. कालिदास-प्रणीत मूल पाठ लघु-आकार का, अर्थात् लघुपाठ होगा, और परवर्ती काल में उसी मूल पाठ में नाट्यप्रयोग के दौरान कुछ नये अंश जोड़े गये होंगे। इस तरह शाकुन्तल का बृहत् पाठ कालान्तर में तैयार हुआ होगा। अथवा 2. महाकवि के द्वारा नाटक का बृहत्पाठ ही पहले से लिखा गया होगा और कालान्तर में उसमें से कुछ अंश काट-छाट कर (रंगभूमि की आवश्यकतानुसार और सीमित समय में जिसकी प्रस्तुति हो सके ऐसा) संक्षिप्त (लघु) पाठ तैयार किया गया होगा। अतः यह कहना मुश्किल है कि महाकवि कालिदास ने ही अपने हाथ से लिखा हो ऐसा (मौलिक) पाठ इन दोनों में से कौन सी पाठपरम्परा में सुरक्षित रहा होगा? इस सन्दर्भ में, नाटक की काव्यशास्त्रीय दृष्टि से आलोचना करके विद्वानों ने दो पक्ष बना लिये हैं-देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित लघुपाठ ही अधिक व्यञ्जनापूर्ण है, इसलिए उसीको श्रद्धेय पाठ परम्परा मानना चाहिए। तथा बंगाली और मैथिली पाठ में स्थूल शृङ्गारिक दृश्यावली ज्यादा है,⁷ अतः उसमें मौलिक पाठ का होना संशयग्रस्त है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक विद्वान् ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ तो कालान्तर में बनाया गया है।
बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुआ पाठ ही मौलिक है ऐसा कहनेवालों में सर्वप्रथम कोलकाता के प्रॉफेसर डॉ० श्री दिलीपकुमार काञ्जीलाल (Kanjilal, A reconstruction of the Abhijñānaśakuntalam, 1980) का प्रयास अतीव ध्यानास्पद है। उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों से यह स्थापित किया है कि बंगालीलिपि में संचरित हुआ पाठ ही सर्वाधिक श्रद्धेय है, एवं प्राचीनतम भी है। सम्माननीय विद्वान् डॉ० श्री काञ्जीलाल ने अपने मत के समर्थन में जो प्रमाण दिये हैं वे श्रीहर्ष की नाटिकायें एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के उद्धरणादि रूप बाह्य प्रमाण हैं। अब यहाँ बंगाली पाठ की मौलिकता
- बङ्गीय पाठ में प्रथम मिलन में ही शकुन्तला अठखेलियाँ करती दिखायी गयी है, जो कालिदास की प्रवृत्ति से विरुद्ध है।। कालिदासः अपनी बात (भारतीय दृष्टि) डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्थान, वाराणसी, 2004, पृ० 54