अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 19
समाधान देते हुए कहा है कि विस्मय और विषाद प्रदर्शित करने के लिए क्व की पुनरुक्ति दोषजनक नहीं मानी जाती है। लेकिन चन्द्रशेखर के मत में ऐसा व्याख्यान तो कुव्याख्यान है। अतः उसका स्वारस्य स्पष्ट करने के लिए चन्द्रशेखर ने अपने किसी गुरुजी का मत लिखा है। उसमें कहा है कि धनुर्धारी व्यक्ति के लिए दो पौरुष गिने जाते हैं। एक, दुर्भेद्य वस्तु का भेदन करना और दूसरा, दुर्मर व्यक्ति को मारना। लेकिन प्रकृत में तो पुष्प में ऐसा कोई दुर्भेद्यत्व नहीं है और हरिण में दुर्मरत्व नहीं है। इस तरह अत्यन्त असम्भवित बात के लिए क्व-द्वय का प्रयोग होता है। इस तरह से चन्द्रशेखर ने अन्यत्र भी अमर, त्रिकाण्डशेष, अमरटीका, विश्व, मेदिनी, शाश्वत, हारावली, कोष इत्यादि का विनियोग किया है तथा आवश्यकता होने पर अमुक शब्द का देशी भाषा में क्या अर्थ होता है वह भी लिखा है। (इन सभी सन्दर्भग्रन्थों की सूची को परिशिष्ट-2 में रखा गया है।)
चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से कुछ पाठान्तर काश्मीरी वाचना के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. प्रथमाङ्क में, नेदं विस्मरिष्यामि। 2.चतुर्थाङ्क में, कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 3. तृतीयाङ्क के अन्त भाग में, कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जो पाठ स्वीकार कर टीका लिखी है, वह बंगाली वाचना का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरूवल्लभ एवं कृष्णनाथ ने भूतकाल में बंगाली वाचना का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाली वाचना का जो पाठ स्वीकारा है वही अधिक प्रामाणिक लगता है। चन्द्रशेखर ने प्राचीनतम पाण्डुलिपियों में संचरित बंगाल के साम्प्रदायिक पाठ को ही स्वीकारा है। कुछ श्लोकों का पाठ प्राचीन काल से पाण्डुलिपियों में संचरित होते हुए भी उसको प्रक्षिप्त भी बताया है। उदाहरण के रूप में-कठिनमपि० (1-20), तुम्हे .. महिलाः। (5-24), अ(त)स्याः तुङ्गमिव० (6-16) इत्यादि। इसके आधार पर कह सकते हैं कि बंगाली वाचना का जो पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है, वह अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धेय है, और उसमें प्रक्षिप्तांश कम हैं।
बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण
0-0 महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का मूल पाठ कैसा होगा? यह प्रश्न निरतिशय विवादास्पद होते हुए भी विद्वानों के लिये अनुपेक्ष्य है। क्योंकि, किसी भी एक-कर्तृक काव्य के पाठ की मौलिकता जब तक सिद्ध नहीं होती है तब तक उसके काव्यशास्त्रीय गुण-दोष की चर्चा करना, या उसमें से किसी भी तरह का काव्यार्थ निकालना