भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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अभिज्ञानशकुन्तलम्
प्रस्तावना
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शकुन्तला के सामने खड़े रहना है। कण्डूयमानां मृगीम्-को चित्रित करने की चाहत का यह राज है। बंगाली वाचना के तृतीयांक में कर्णोत्पलररेणु से कलुषित हुई शकुन्तला की दृष्टि परिमार्जित कर देने का जो पूर्वप्रसंग है उसी का प्रतिदृश्य षष्ठांक के “कार्या सैकतलीनहंसमिथुना....।” वाले श्लोक में निरूपित हुआ है। इस तरह देवनागरी एवं बंगाली वाचना के षष्ठाङ्क के कण्डूयमानाम् मृगीम्-का चित्र बनाने की चाहत का पूर्व रूप बंगाली वाचना वाले (तृतीयाङ्क के) पाठ में ही उपलब्ध होता है, देवनागरी वाचना में से नहीं। क्योंकि देवनागरी वाचना में से तो कर्णोत्पलरेणु से शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर उसको परिमार्जित कर देने का प्रसंग हटाया गया है। अतः, बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को प्रक्षिप्त न कह कर, उसे मौलिक मानने को हम बाध्य हो जाते हैं।

2-3 उपर्युक्त सन्दर्भ ऐसे हैं जिसमें सभी वाचनाओं में समान रूप से षष्ठाङ्क में आये हुए श्लोक को आधार बनाकर बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता का समर्थन किया गया है। इसी अनुसन्धान में एक दूसरा प्रमाण भी प्रस्तुत किया जाता है। देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली सभी वाचनाओं$^{14}$ के तृतीयाङ्क के अन्त भाग में समान रूप से एक श्लोक (देवनागरी का 3 / 23) ऐसा दिखाया जाता है जिस में आये हुए एक शब्द का समर्थन केवल बंगाली वाचना का (तृतीयाङ्क का बृहत्) पाठ ही कर सकता है। अब ऐसे आन्तरिक प्रमाण के रूप में सिद्ध होनेवाले श्लोक की चर्चा की जा रही है:-देवनागरी (इत्यादि) पाँचों वाचनाओं के शाकुन्तल में, तृतीयाङ्क के अन्त में, गौतमी के साथ शकुन्तला चली जाती है। तत्पश्चात् दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलय में कुछ क्षणों के लिये खड़ा रहता है। वह यहाँ एक श्लोक बोलता है:

तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं,
क्लान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः।
हस्ताद् भ्रष्टम् इदं बिसाभरणम् इत्यासज्यमानेक्षणो,
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाच्छक्नोमि शून्यादपि॥
\hfill 3/23

(देवनागरी वाचना के) इस श्लोक में 1. शकुन्तला की पुष्पमयी शय्या, 2. उसका नलिनीपत्र पर लिखा हुआ मन्मथलेख, तथा 3. उसके हाथ से निकला हुआ कोई एक बिसाभरण (वलय)-इन तीन चीजों का स्पष्ट निर्देश है। लेकिन, देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी$^{15}$ वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में कहीं पर भी शकुन्तला को दुष्यन्त द्वारा पहनाये हुए बिसाभरण (कमलतन्तु का वलय) का प्रसंग नहीं है। ऐसे प्रसंग का उल्लेख


  1. देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली-इन पाँचो वाचनाओं में।
  2. जो साहित्य अकादेमी, दिल्ली से डॉ० ए.के. बेलवलकरजी द्वारा संपादित शाकुन्तल है उसमें यह अंश नहीं है।