अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें26 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
तो एकमात्र बंगाली (एवं मैथिली) वाचना में ही प्राप्त होता है। बंगाली वाचना का निम्नोद्धृत अंश पठनीय है:-
राजा—सम्प्रति प्रियाशून्ये किमस्मिन् करोमि। (अग्रतोऽवलोक्य) हन्त, व्याहतं गमनम्। मणिबन्धनगलितम् इदं संक्रान्तोशीरपरिमलं तस्याः। हृदयस्य निगडमिव मे मृणालवलयं स्थितं पुरतः।। (3 / 31), (सबहुमानम् आदत्ते)
शकुन्तला—(हस्तं विलोक्य) अम्मो, दोब्बल्यसिढिलदाए परिब्भट्ठं पि मुणालवलअं मए ण परिण्णादं। (अहो, दौर्बल्यशिथिलतया परिभ्रष्टमपि मृणालवलयं मया न परिज्ञातम्।)
राजा—(मृणालवलयमुरसि निक्षिप्य) अहो स्पर्शः। अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये विहाय कान्तं भुजमत्र तिष्ठता। जनः समाश्वासित एष दुःखभागचेतनेनापि सता, न तु त्वया।।
(अभिज्ञानशकुन्तलम् 3 / 32, रिचार्ड पिशेल की बंगाली वाचनावाली आवृत्ति, पृ. 38).
दुष्यन्त की यह उक्ति सुनने के बाद शकुन्तला फिर से लतामण्डप में उस वलय को वापस ले लेने के निमित्त से प्रवेश करती है। यहाँ शकुन्तला ने जो लीलाभरण के रूप में हाथ में एक मृणालवलय पहना था उसका स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है। इस प्रसङ्ग में (शकुन्तला के शब्दों में) जो “वलय” (और दुष्यन्त के शब्दों में जो) “लीलाभरण” का निर्देश है, उसीको देवनागरी वाचना के पूर्वोक्त (शाकु. 3 / 23) श्लोक के “बिसाभरणम्” शब्द से रखा गया है। एवमेव, देवनागरी (इत्यादि) वाचना के तृतीयाङ्क के आरम्भ में ही कहा गया है कि शकुन्तला के हाथ में पहना हुआ मृणालवलय शुरू से ही “प्रशिथिल” था। अतः उस वलय के गिर जाने का प्रसंग आकारित होने की सम्भावना एवं अपेक्षा है ही। लेकिन शकुन्तला के हाथ से मृणालवलय गिरने का प्रसंग केवल बंगाली और मैथिली वाचना के पाठ में तथा कश्मीर की शारदा पाण्डुलिपियों में ही सुरक्षित रहा है। यह तीसरा आन्तरिक प्रमाण है जिसके द्वारा बंगाली आदि के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता सिद्ध होती है।
बंगाली वाचना के शकुन्तल नाटक में तृतीयाङ्क में कुल मिला कर 41 या 42 श्लोकों का समुदाय है। उसके सामने देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल नाटक के तृतीय अङ्क में केवल 23 या 24 श्लोक प्राप्त होते हैं। अतः यदि किसी अज्ञात रंगकर्मी ने बंगाली वाचना के बृहत् पाठ में काट-छाँट करके, देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ बनाया होगा तो उसका कोई न कोई सबूत देवनागरी वाचना के पाठ में ही अनजान में भी रहा होगा—अब ऐसा अनुमान करने को हमारा मन उद्यत होता है। उस अनुमान को दृढीभूत करनेवाला यह (3 / 23) श्लोक (संक्षिप्त की गयी) देवनागरी वाचना में सुरक्षित