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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

26 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

तो एकमात्र बंगाली (एवं मैथिली) वाचना में ही प्राप्त होता है। बंगाली वाचना का निम्नोद्धृत अंश पठनीय है:-

राजा—सम्प्रति प्रियाशून्ये किमस्मिन् करोमि। (अग्रतोऽवलोक्य) हन्त, व्याहतं गमनम्। मणिबन्धनगलितम् इदं संक्रान्तोशीरपरिमलं तस्याः। हृदयस्य निगडमिव मे मृणालवलयं स्थितं पुरतः।। (3 / 31), (सबहुमानम् आदत्ते)

शकुन्तला—(हस्तं विलोक्य) अम्मो, दोब्बल्यसिढिलदाए परिब्भट्ठं पि मुणालवलअं मए ण परिण्णादं। (अहो, दौर्बल्यशिथिलतया परिभ्रष्टमपि मृणालवलयं मया न परिज्ञातम्।)

राजा—(मृणालवलयमुरसि निक्षिप्य) अहो स्पर्शः। अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये विहाय कान्तं भुजमत्र तिष्ठता। जनः समाश्वासित एष दुःखभागचेतनेनापि सता, न तु त्वया।।

(अभिज्ञानशकुन्तलम् 3 / 32, रिचार्ड पिशेल की बंगाली वाचनावाली आवृत्ति, पृ. 38).

दुष्यन्त की यह उक्ति सुनने के बाद शकुन्तला फिर से लतामण्डप में उस वलय को वापस ले लेने के निमित्त से प्रवेश करती है। यहाँ शकुन्तला ने जो लीलाभरण के रूप में हाथ में एक मृणालवलय पहना था उसका स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है। इस प्रसङ्ग में (शकुन्तला के शब्दों में) जो “वलय” (और दुष्यन्त के शब्दों में जो) “लीलाभरण” का निर्देश है, उसीको देवनागरी वाचना के पूर्वोक्त (शाकु. 3 / 23) श्लोक के “बिसाभरणम्” शब्द से रखा गया है। एवमेव, देवनागरी (इत्यादि) वाचना के तृतीयाङ्क के आरम्भ में ही कहा गया है कि शकुन्तला के हाथ में पहना हुआ मृणालवलय शुरू से ही “प्रशिथिल” था। अतः उस वलय के गिर जाने का प्रसंग आकारित होने की सम्भावना एवं अपेक्षा है ही। लेकिन शकुन्तला के हाथ से मृणालवलय गिरने का प्रसंग केवल बंगाली और मैथिली वाचना के पाठ में तथा कश्मीर की शारदा पाण्डुलिपियों में ही सुरक्षित रहा है। यह तीसरा आन्तरिक प्रमाण है जिसके द्वारा बंगाली आदि के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता सिद्ध होती है।

बंगाली वाचना के शकुन्तल नाटक में तृतीयाङ्क में कुल मिला कर 41 या 42 श्लोकों का समुदाय है। उसके सामने देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल नाटक के तृतीय अङ्क में केवल 23 या 24 श्लोक प्राप्त होते हैं। अतः यदि किसी अज्ञात रंगकर्मी ने बंगाली वाचना के बृहत् पाठ में काट-छाँट करके, देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ बनाया होगा तो उसका कोई न कोई सबूत देवनागरी वाचना के पाठ में ही अनजान में भी रहा होगा—अब ऐसा अनुमान करने को हमारा मन उद्यत होता है। उस अनुमान को दृढीभूत करनेवाला यह (3 / 23) श्लोक (संक्षिप्त की गयी) देवनागरी वाचना में सुरक्षित

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 27

रह गया है, जो हमारे लिये एक अकाट्य आन्तरिक प्रमाण है। सारभूत बात यही है कि 1. पुष्पमयी शय्या और 2. मन्मथलेख के साथ 3. जो बिसाभरण का निर्देश देवनागरी वाचना के पाठ में है वह कहाँ से आया इसका उत्तर केवल बंगाली आदि बृहत्पाठवली वाचनाओं में ही है।

3-1 आन्तरिक सम्भावना का चतुर्थ स्थानः-देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनावाले (लघु) पाठ में गान्धर्व-विवाह नामक तृतीयाङ्क का आलेखन संयमित एवं व्यंजनापूर्ण होते हुए भी उसमें एक स्थान ऐसा है कि जो प्रथम दृष्टि में ही अनुचित लगता है:-“चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी”। ऐसा नेपथ्य से कहा जाता है। इस को सुनते ही शकुन्तला दुष्यन्त को सावधान करती है कि मेरे शरीरवृत्तान्त को जानने के लिये गौतमी आ रही है। तुम वृक्ष के पीछे छुप कर रहो। फिर देवनागरी पाठ में एक रंगसूचना है:-“ततः प्रविशति पात्रहस्ता तापसी, सख्यौ च”। दोनों सखियाँ “इत इत आर्या गौतमी” बोलती हुई गौतमी का प्रवेश करवाती हैं। बाद में वह पूछती है कि क्या अब तेरे शरीर का संताप कुछ कम हुआ है। लो, इस शान्तिदर्भोंदक से तेरी बाधायें हट जायेंगी इत्यादि। फिर तीनों पात्र (गौतमी, अनसूया और प्रियंवदा) शकुन्तला को ले कर रंगभूमि से निकल जाती हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि जिन दोनों सखियों ने नायक-नायिका को रतिक्रीडा के अनुकूल विश्रब्ध स्थान में एकान्त देने के लिये, मृगबाल को अपनी माता के साथ संयोजन करवाने का बहाना बनाकर, अभी अभी कुछ ही क्षण पहले लतावलय से बिदा ली थी, क्या वही दोनों सखियाँ आर्या गौतमी को रास्ता दिखाती हुई वहाँ उपस्थित हो जाती हैं? यह तो सर्वथा अनुचित ही है। यद्यपि यह बात अलग है कि किसी भी विद्वान् ने इस अनौचित्य की ओर अंगुली नहीं उठायी है। लेकिन यह अनौचित्य ध्यातव्य जरूर है।

अब इसी सन्दर्भ को लेकर बंगाली एवं मैथिली वाचना के पाठ का परीक्षण किया जाय तो वहाँ उपर्युक्त अनौचित्य नहीं है। जैसा पहले कहा गया है-बंगाली पाठ में “अनिर्वाणो दिवसः” से लेकर “वत्से, परिणतो दिवसः”-के बीच में नायक-नायिका का जो विस्तृत साहचर्य दिखाया गया है उसमें जिस क्षण में गौतमी का प्रवेश होता है, तब वह अकेली होती है। शान्त्युदक प्रसारित करते हुए वह देखती है कि अस्वस्थ शकुन्तला को देवताओं के सहारे अकेली छोड़ कर प्रियंवदा-अनसूया वहाँ से चली गयी हैं। तब शकुन्तला को कहना पड़ता है कि वे दोनों अभी अभी मालिनी नदी पर गयी हैं (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹⁶। यहाँ दोनों सखियों के साथ में गौतमी उपस्थित नहीं होती है। अर्थात् यहाँ जो पाठ दिखायी देता है वह पूर्वापर सन्दर्भ में बिल्कुल सुसंगत और औचित्यपूर्ण है। अतः बंगाली लिपि में लिखित अभिज्ञानशकुन्तल की पाण्डुलिपियों में जो बृहत्पाठ-परम्परा


  1. (प्रविश्य पात्रहस्ता गौतमी) जाते इदम् शान्त्युदकम्। (दृष्ट्वा) अस्वस्था इह देवतासहायिनी तिष्ठसि। शकुन्तला-इदानीमेव प्रियंवदानसूये मालिनीम् अवतीर्णे। रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति, (पृ. 41)

28 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

संचरित हुई है, वही मौलिकता के नजदीक हो सकती है ऐसी सम्भावना दृढतर हो कर सामने आती है।

4-1 आन्तरिक सम्भावना का पञ्चम स्थानः-अभिज्ञानश(शा)कुन्तल की सभी वाचनाओं के षष्ठाङ्क में विरही दुष्यन्त के मुख से अन्तःपुर में बार बार गोत्रस्खलन होने से वह शरमिन्दा हो जाता है ऐसा निर्देश है।

दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा,
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्॥
(शाकु. 6/5)

अब गान्धर्व-विवाह को वर्णित करनेवाले (देवनागरी वाचना के) तृतीयाङ्क में दुष्यन्त-शकुन्तला का जो मिलन है वह तो कुछ दो-पाँच संवादों का ही वर्णित किया है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में, शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” जैसे शब्द से सम्बोधन किया है और नायक दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” शब्द से उल्लिखित किया है। ऐसे परस्पराश्लिष्ट / परस्पराश्रित दाम्पत्य का निरूपण होने के बाद यदि गोत्रस्खलन का उल्लेख किया जाय तो वह ज्यादा प्रीतिकर सिद्ध हो सकता है।

5-1 देवनागरी वाचना के षष्ठाङ्क में वर्णित प्रसङ्गों का बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में प्रदर्शित प्रसङ्गों के साथ एक तरह का आन्तर सम्बन्ध दिखायी देता है। इसी बात का समर्थन करनेवाला षष्ठाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी यहाँ उल्लेखनीय हैः देवनागरी (इत्यादि सभी) वाचनाओं में, विरही दुष्यन्त के सामने पत्रारूढ पौरकार्य प्रस्तुत किया जाता है। जिस में एक समुद्रव्यवहारी सार्थवाह धनमित्र अनपत्य मर गया है-ऐसी बात कही जाती है। यहाँ पर दुष्यन्त की उक्ति स्मरणीय हैः “अनपत्यश्च किल तपस्वी। राजगामी तस्यार्थसंचय इति एतद् अमात्येन लिखितम्। कष्टं खल्वनपत्यता। बहुधनत्वाद् बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम्। विचार्यताम् यदि काचिद् आपन्नसत्त्वा तस्य भार्यासु स्यात्”। महाकवि कालिदास को यहाँ दुष्यन्त को शकुन्तला की आपन्नसत्त्वावस्था का स्मरण दिला कर पश्चात्ताप में डालना तो अभिप्रेत होगा ही, लेकिन उनको अपनी अनपत्यता का भी स्मरण देना अभीष्ट होगा। क्योंकि इस नाटक के आरम्भ में दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति होगी ऐसे आशीर्वचन दिये गये हैं, और वही है इस नाटक का अन्तिम लक्ष्य (द्विवेदी, कालिदास ग्रन्थावली (भाग-2)¹⁷।

इसी लिये षष्ठाङ्क में, धनमित्र के प्रसङ्ग से राजा दुष्यन्त की अनपत्यता का स्मरण ध्वनित करके कवि ने इस नाटक के चरम लक्ष्य को प्रेक्षकों के सामने रखा है। यहाँ एक


  1. इदमेव प्रयोजनमेतस्य नाटकोत्तमस्येत्यभिनवगुप्तो नाट्यशास्त्रविवृतावभिनवभारत्यां 19-22 कारिकायां घनश्यामश्च। अत एव सार्थक्यं षष्ठसप्तमाङ्कयोः। कालिदास-ग्रन्थावली (द्वितीयो भागः), अनु रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन, 2008, पृ. 318

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 29

ध्यानास्पद बिन्दु यह है कि नाटक के गन्तव्य को महाकवि ने प्रत्येक अङ्क में किसी न किसी स्वरूप से निर्दिष्ट भी किया है। जैसे कि प्रथमाङ्क में ‘सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् अवाप्नुहि’ शब्दों से वैखानस के आशीर्वचन दिये जाते हैं और सप्तमाङ्क में चक्रवर्ती राजा के लक्षणों से युक्त सर्वदमन भरत की प्राप्ति दिखायी गयी है। तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का गान्धर्व-विवाह होता है और चतुर्थाङ्क में कण्वमुनि कहते हैं कि दौष्यन्ति पुत्र को राज्य की धुरा सौंप कर इस आश्रम में फिर से वापस आना। पञ्चमाङ्क के अन्त में, शकुन्तला-प्रत्याख्यान प्रसङ्ग में राजपुरोहित कहता है कि–त्वं साधुभिरुद्दिष्टः प्रथममेव चक्रवर्तिनं पुत्रम् जनयिष्यसि इति। (शाकु. 5 / 29 के बाद), और षष्ठाङ्क में सार्थवाह धनमित्र के पूर्वोक्त प्रसङ्ग के द्वारा दुष्यन्त की अनपत्यता व्यञ्जित की जाती है। किन्तु देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल के द्वितीयाङ्क में कहीं पर भी पुत्रप्राप्ति रूप नाट्यकार्य का किसी भी तरह से निर्देश नहीं है। राजमाता ने जो उपवास किये थे उसका कोई उद्देश्य वहाँ नहीं कहा गया है। यहाँ पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार ‘प्रवृत्तपारण’ या ‘निर्वृत्तपारण’ उपवास का ही निर्देश है।$^{18}$ केवल बंगाली, मैथिली और काश्मीरी वाचना के शकुन्तल में ही “पुत्रपिण्डपालन”, “पुत्रपिण्डपर्युपासन”, एवं “पुत्रपिण्डाराधन” जैसे पाठभेदवाले शब्दों से पुत्र-प्राप्ति रूप लक्ष्य का निर्देश मिलता है। इन पाठभेदों का तुलनात्मक अध्ययन करने से भी यह सिद्ध होगा कि देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना का पाठ संक्षिप्त करने के साथ साथ परिवर्तित भी किया गया है। बंगाली वाचना के पुत्रपिण्डपालन-वाले पाठ में नाटक के चरम लक्ष्य का निर्देश सुरक्षित है, परन्तु वह निर्देश देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना से गायब हो गया है। इस तरह बंगाली वाचना के पाठ की मौलिकता की सम्भावना उपर्युक्त एक छोटे से पाठभेद से भी दृढतर सिद्ध होती है।

6-1 संस्कृत नाट्य-साहित्य में भास, कालिदास, शूद्रक, कुन्दमालाकारादि अनेक कवियों ने प्रेमोद्भव के एक बीजभूत कारण के रूप में अनुक्रोश नामक गुण को पुरस्कृत किया है। यद्यपि संस्कृत-कोशकारों नें इस शब्द का दया, अनुकम्पा, घृणा, सहानुभूति जैसे अर्थों का परिगणन किया है, और टीकाकार चन्द्रशेखर ने उसका अर्थ “कृपा” किया है। किन्तु उसका सही अर्थ तो “परदुःखदुःखिता” ही होता है।$^{19}$ दूसरों के दुःख को देख कर, उस दुःखीजन को साहाय्य करने को जो तुरन्त उद्यत होता है वह व्यक्ति सानुक्रोश है-ऐसा कहा जाता है। ऐसी सानुक्रोशता को देख कर कुसुम-सुकुमारचित्तवाली नारियों के हृदय में प्रेम की भावना सद्यः प्रकट होती है। अतः महाकवि कालिदास जब अपनी इस नाट्यकृति में अनुक्रोश शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका भी परीक्षण करके देवनागरी शाकुन्तल के पाठ की आलोचना की जा सकती है:


  1. राघवभट्ट की टीका में - देव्याज्ञापयति - आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। तथा काटयवेम की टीका में-देव्याज्ञापयति-आगामिनि चतुर्थदिवसे निर्वृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। ऐसे पाठान्तरों को स्वीकार किया गया है।
  2. एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे, सौहार्दाद् वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या। मेघदूतम्-55

30 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

देवनागरी वाचनावाले अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तमाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के पाँव पड़ता है (और 7 / 24 श्लोक बोलता है।) यहाँ शकुन्तला कहती है कि-उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः। नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखम् आसीद्, येन सानुक्रोशोऽप्यार्यपुत्रो मयि विरसः संवृत्तः। यहाँ शकुन्तला ने कहा है कि दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है, लेकिन मेरे सुचरित को रोकनेवाले गत जन्म के कोई कर्म उस समय फल देने के लिये तत्पर हो गये थे, जिसके कारण आर्यपुत्र सानुक्रोश होते हुए भी मेरे प्रति विरस हो गये थे। यहाँ दुष्यन्त के लिए प्रयुक्त सानुक्रोश शब्द, जो समग्र संस्कृतसाहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शब्द है (Vasantkumar, 2002)$^{20}$, उसका औचित्य कैसे सिद्ध किया जा सकता है, यह परीक्षणीय है।

शकुन्तला की उपर्युक्त उक्ति को सुन कर यह प्रश्न किया जा सकता है कि “दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है” ऐसा अनुभव शकुन्तला को कब हुआ होगा? दुष्यन्त और शकुन्तला का साहचर्य तो केवल प्रथम एवं तृतीय, इन दो अङ्कों में ही वर्णित हुआ है। 1. प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में दुष्यन्त शकुन्तला को भ्रमर के त्रास से छुड़ाने के लिये जब सहसा प्रस्तुत होता है एवं वृक्षसेचन के लिये दो घट पानी के ऋण में से मुक्त करवाने के लिये जब वह अपनी राजमुद्रा निकाल कर देता है। 2. देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का साहचर्य / सहवास परिसीमित क्षणों में पूरा होता है। अतः इस अल्पकालिक मिलन में शकुन्तला को किसी बाधा से छुड़ाने का मौका दुष्यन्त को मिला हो ऐसा कोई प्रसंग वर्णित नहीं है। इस लिये सप्तमाङ्क में जब दुष्यन्त के लिये सानुक्रोश शब्द का प्रयोग होता है तब वह निराधार लगता है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ को यदि लेते हैं तो वहाँ एक निश्चित प्रसङ्ग है जिसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्यक्ष रूप से बाधामुक्त किया है। शकुन्तला ने अपने कानों में जो उत्पलपुष्प आरोपित किया था, उसकी रेणु से नेत्र जब कलुषित होता है तब दुष्यन्त ने अपने वदनमारुत से उसका प्रमार्जन किया था। और शकुन्तला ने भी दुष्यन्त को अनुकम्पा प्रदर्शित करनेवाला कहा है।$^{21}$ इस तरह बंगाली वाचना के पाठ को यदि हम ध्यान में ले कर सप्तमाङ्क के सानुक्रोश शब्द के प्रयोग का औचित्य सोचते हैं तो वह सुसंगत और साधार लगता है। परन्तु देवनागरी वाचना के संक्षिप्त पाठ के सन्दर्भ में इस महत्त्वपूर्ण शब्द के प्रयोग का औचित्य जमता नहीं है।


  1. करुणा जो होती है वह ईश्वर की होती है और जो सहानुभूति होती है वह साधुपुरुष की होती है। इस करुणा और सहानुभूति के बीच में अनुक्रोश आता है। तथा अनुक्रोशत्व के कारण प्रेमोद्भव होता है-ऐसा संस्कृत कवियों ने बार बार दिखाया है।
  2. शकुन्तला - न तावत् एवम् प्रेक्षे। पवनोत्कम्पिना कर्णोत्पलररेणुना कलुषीकृता मे दृष्टिः। राजा- यदि मन्यसे अहमेनां वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। शकुन्तला - ततो अनुकम्पिता भवेयम्। (रिचार्ड पिशेल आवृत्ति) पृ. 40
अभिज्ञानशकुन्तलम्प्रस्तावना31

उपसंहारः- पाठालोचना में इदं प्रथमतया पाण्डुलिपियों का साक्ष्य ही महत्त्व रखता है। उपलब्ध पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठों का तुलनात्मक अध्ययन करके, वंशवृक्षपद्धति से विभिन्न वाचनाओं में से कौन सी वाचना पूर्वज है या वंशज है, अर्थात् प्राचीन या प्राचीनतर है, उसका निर्णय किया जाता है। तदनन्तर, कौन से पाठ को बहुसंख्य पाण्डुलिपिओं का समर्थन मिलता है, अथवा प्राप्त की गयी अनेकानेक पाण्डुलिपिओं में से जो प्राचीनतम पाण्डुलिपि होगी उनमें कौन सा पाठ सुरक्षित रहा है, उसकी विचारणा आधुनिक पाठसम्पादक करते हैं। ऐसे दृष्टिकोण से जो समीक्षित पाठसम्पादन किया जाता है उसमें वस्तुनिष्ठता जरूर होती है। क्योंकि यहाँ पर जैसा भी निर्णय किया जाता है वह उपलब्ध पाण्डुलिपिओं (की संख्या या प्राचीनता) पर निर्भर रहता है। परन्तु जब अनेकविध पाठान्तरों में से कौन सा पाठान्तर अधिक काव्यत्व या नाट्यक्षमता से परिपूर्ण हो सकता है, उसको देखकर, अर्थात् "गुणोपसंहार न्याय" (Eclectic Principles) से समीक्षित पाठसम्पादन तैयार किया जाता है, तो उसमें आत्मलक्षिता प्रविष्ट होती ही है। परिणाम स्वरूप ऐसा समीक्षित पाठसम्पादन सर्वसम्मत नहीं होता है। तथा जिस वंशवृक्षपद्धति से निर्धारित किये समीक्षित पाठसम्पादन को वस्तुनिष्ठ कहा गया है उसमें पाठालोचना के तीन सोपान ही कार्यान्वित किये गये होते हैं। अतः वहाँ चतुर्थ सोपान पर उच्चतर पाठसमीक्षा का कार्य अवशिष्ट रहता है। यहाँ वंशवृक्षपद्धति से जिस वाचना को प्राचीनतर या अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर पाठसम्पादन किया जाता है उसका पुनःपरीक्षण किया जाता है। ऐसे पुनःपरीक्षण में बाह्य साक्ष्य एवं कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना को सर्वोच्च मानदण्ड के रूप में स्वीकारा जाता है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना के बृहत् पाठ की मौलिकता को कृति के ही अन्तःसाक्ष्य से कैसे समर्थन मिल रहा है उसकी चर्चा की गयी है। किन्तु यहाँ ऐसा कहने का आशय यह भी नहीं है कि बंगाली वाचना के पाठ को ही साद्यन्त स्वरूप में मौलिक मान लिया जाय। क्योंकि डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा निर्धारित किये गये बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ की भी व्यापक रूप से उच्चतर समीक्षा करना अनिवार्य है। (जिसको अनुगामी पृष्ठों में प्रस्तुत किया गया है।) बंगाली वाचना के पाठ में मौलिकता झलक रही है ऐसा सिद्ध होने का सही मतलब तो यह है कि अभिज्ञानशकुन्तल का बृहत्पाठ संचरित करनेवाली जो तीन वाचनायें हैं, 1. बंगाली, 2. मैथिली एवं 3. काश्मीरी, इन तीनों में मौलिकता छुपी हुई है। कालिदास के अभिज्ञानशकुन्तल का मूल पाठ उजागर करने के लिए उपर्युक्त त्रिविध वाचनाओं में संचरित हुए बृहत्पाठ का आलोडन करके ही अभिज्ञानशकुन्तल के कविप्रणीत मूल पाठ को निश्चित करना चाहिए।

Bibliography

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Calcutta: Sanskrit College.
Vasantkumar, B. (2002)-Anukroshatva–a rare element of humanity,

32 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

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अभिज्ञानश(शा)कुन्तलम् की बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में प्रक्षेप एवं संक्षेप

0-1, भूमिका—यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक की सर्वोत्तमता को लेकर कोई विवाद ही नहीं उठा है! पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाटक का पाठ इयत्ता में द्विविध है। अतः उनमें से कौन सा शाकुन्तल मंचन के योग्य है, ऐसा प्रश्न होना चाहिए था, तदनन्तर इनमें से किसकी सर्वोत्तमता मानी जाय ऐसा विवाद भी उठना अपेक्षित था। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ हुआ नहीं। यहाँ तो विगत 100-150 वर्षों में अभिज्ञानशाकुन्तल के प्रचलित पाठों की मौलिकता को लेकर संशय या विप्रतिपत्ति दिखानेवाले विद्वान् दो-चार की संख्या में परिसीमित हैं! जबकि हकीकत यह है कि इस नाटक के शीर्षक से लेकर, अन्तिम भरतवाक्य पर्यन्त जितने भी गद्य-पद्य संवाद हैं वे सभी पाठभेद की समस्या से ग्रस्त हैं। अतः स्वाभाविक रूप से ही शाकुन्तल के मौलिक पाठ की गवेषणा करने के लिये गणमान्य विद्वानों के द्वारा बार बार चर्चा-विचारणा होनी आवश्यक थी और आज भी वह अनिवार्य है। अभिज्ञानशाकुन्तल की पाठालोचना करनेवाले विरल विद्वानों में दो मत हैं:-(1) प्रथम, शाकुन्तल के जिस पाठ पर राघवभट्ट ने “अर्थद्योतनिका” टीका लिखी है, वह देवनागरी वाचना का पाठ ही मौलिक हो सकता है। (2) द्वितीय, बंगाली वाचना का पाठ, जिस पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने सन्दर्भदीपिका टीका लिखी है, वह प्राचीनतर भी है और अधिक श्रद्धेय एवं कदाचित् मौलिक भी है। अतः कम से कम, उपर्युक्त टीकाकारों के द्वारा स्वीकृत इन दोनों वाचनाओं के पाठ की परीक्षा तो करनी चाहिए। क्योंकि किसी भी कृति की पाठालोचना किये बिना यदि उसकी साहित्यिक आलोचना की जाती है तो वह आज नहीं तो कल गलत सिद्ध होने की पूरी सम्भावना है।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 33

0-2 पाठालोचना की दिशा में विद्वानों के द्वारा अद्यावधि जो शोधकार्य हुआ है उससे इतनी जानकारी मिलती है कि पाण्डुलिपियों में प्रवहमान अभिज्ञानशाकुन्तल का पाठ इयत्ता में द्विविध है। एक को बृहत्पाठ कहते हैं, तथा दूसरे को लघुपाठ कहते हैं। प्रथम याने बृहत्पाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” में तीन वाचनायें दृष्टिगोचर हो रही हैं:-(1) काश्मीरी वाचना, (2) मैथिली वाचना, एवं (3) बंगाली वाचना। दूसरी, लघुपाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” की दो वाचनायें प्रसिद्ध हैं:-(4) देवनागरी वाचना एवं (5) दाक्षिणात्य वाचना।। विद्वानों के परिश्रम से अभी तक इतना सप्रमाण सिद्ध हुआ है कि देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं की अपेक्षा बंगाली वाचना में संचरित हुआ जो पाठ है वह प्राचीनतर है, एवं बृहत्तर भी है।

बंगाली वाचना के अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन करनेवाले विद्वान् दो हैं:-(1) डॉ० रिचार्ड पिशेल, (Pischel, 1876; (Seond edition-1922), तथा (2) डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल, (काञ्जीलाल, 1980)। इन दोनों सुज्ञ विद्वानों ने बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका का विनियोग अवश्य किया है, तथा रिचार्ड पिशेल ने तो इस नाट्यकृति के प्राकृत-संवादों के पाठ की शुद्धि करने के लिये चन्द्रशेखर की टीका का ही अधिक से अधिक सहारा लिया है। किन्तु दोनों में से किसी विद्वान् ने इस नाटक के अधिकृत-समीक्षित-पाठ को प्रकाशित करने के साथ साथ चन्द्रशेखर की “सन्दर्भदीपिका” टीका का अधिकृत पाठ प्रकाशित नहीं किया है। टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका से समर्थित होनेवाले पाठ को अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर अभिज्ञानशकुन्तल का समीक्षित पाठ निर्धारित करने के पश्चात् भी यह प्रश्न तो रहता ही है कि इस टीकाकार के द्वारा समादृत पाठ में प्रक्षेप्यादि के दूषण हैं या नहीं हैं। क्योंकि अनेकानेक बंगाली पाण्डुलिपियों का आलोडन करके अभिज्ञानशकुन्तल का जो पाठ “अधिकृत” या “समीक्षित” पाठ के रूप में रिचार्ड पिशेल एवं श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने प्रस्तुत किया है उसकी आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से यदि परीक्षा की जाय तो तुरन्त मालूम होगा कि इन दोनों महाशयों द्वारा तैयार किया हुआ बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ भी अनेक स्थानों पर प्रक्षेप एवं संक्षेप से भरा पड़ा है। मतलब कि इन दोनों विद्वानों ने जो समीक्षित पाठ निर्धारित किया है वह केवल निम्न स्तरीय पाठालोचना का परिणाम है और उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने का कार्य अभी तक शायद पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। यदि बंगाली वाचना में प्रवहमान पाठ प्राचीनतर एवं मौलिकता²² के नजदीक है, ऐसा सिद्ध हो रहा है तो उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना कर मौलिकता की ओर अधिक निकटता हासिल करने का प्रयास करना ही चाहिए।


  1. इस सन्दर्भ में द्रष्टव्य है मेरा शोध-आलेख:-अभिज्ञानशाकुन्तल, बंगाली वाचना की मौलिकता के समर्थक नवीन प्रमाण, संस्कृत-विमर्श (नव शृङ्खला, वॉ. 4) राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नयी दिल्ली, 2010, पृ. 147-160

34 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इसी तरह से श्री पी. एन. पाटणकर जी ( 1902 ई. स. में) ने भी देवनागरी पाण्डुलिपियों की निम्न स्तरीय पाठालोचना की है। किन्तु उनके निर्धारित किये देवनागरी के “शुद्धतर” पाठ्यांश (Patankar, 1902) में भी विचारसातत्य खण्डित होता है या नहीं, अथवा अमुक पाठ्यांश कवि की निरूपणशैली से विपरीत है या नहीं, या देवनागरी पाठ के नाम पर बंगाली वाचना का कुछ पाठ्यांश स्वीकृत कर लिया गया है या नहीं, ऐसा कोई विचार ही नहीं किया गया है।²³ अतः वे भी देवनागरी वाचना के पाठ में जो संक्षेपीकरण का खेल खेला गया है उसे देख नहीं पाये हैं। देवनागरी पाठपरम्परा का इतिहास बहुत लम्बा होने से शाकुन्तल की देवनागरी पाण्डुलिपियों में भी बहुविधता है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बताया है कि देवनागरी वाचना के भी त्रिविध पाठ प्रसारित हुए हैं:-(1) प्राचीन देवनागरी, (2) मिश्रदेवनागरी एवं (3) संक्षिप्त की गयी देवनागरी पाण्डुलिपियाँ। (संक्षिप्त की गयी देवनागरी का पाठ यानि राघवभट्ट ने जिस पाठ पर टीका लिखी है वह।) सारभूत बात यही है कि सौ डेढ़ सौ साल के इतिहास में अलग अलग प्रान्तों के अनेकविध शाकुन्तल एवं उनकी विविध टीकाओं का प्रकाशन होता रहा है। लेकिन इस नाट्यकृति के पाठ की पाठालोचना करने का कार्य दो-तीन विद्वानों²⁴ से अधिक किसी ने भी नहीं किया है, और वह भी आंशिक रूप में ही हुआ है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना की तुलना में देवनागरी वाचना में जहाँ संक्षेपीकरण हुआ है, एवं मौलिकता के नजदीक होते हुए भी बंगाली वाचना के पाठ में जहाँ प्रक्षिप्तांश दिखते हैं उसकी उच्चतर समीक्षा की जाती है।।

0-3 पाठालोचना का चतुर्थ सोपान है: उच्चतर समीक्षा। उसमें पाण्डुलिपियों के साक्ष्य से ऊपर उठना है। तथा टीकाकारों के द्वारा जो पाठ मान्य किया गया है ऐसे (सहायक सामग्री रूप) टीका-ग्रन्थों के प्रमाणों को भी छोड़ देना है। पाठालोचना के इस अन्तिम सोपान पर, समीक्षित पाठ के रूप में निर्धारित किये गये पाठ में प्रत्येक वाक्य की परीक्षा करनी होती है। जैसे कि पूर्वापर सन्दर्भ में विचार-सातत्य बना रहता है कि नहीं? एवमेव, प्रत्येक विचार की सुसंगतता एवं औचित्य है या नहीं? नाट्यकृति के जिस श्लोक में या गद्य-वाक्य में विचार-सातत्य खण्डित होता है, अथवा पुनरुक्ति होती है-तो उस पाठ की मौलिकता संशयग्रस्त बनती है। जिस संवाद में प्रसंगानुसारी नाट्यगत औचित्य प्रतीत नहीं होता है तो वह पाठ्यांश प्रक्षेप या संक्षेप का परिणाम हो सकता है क्योंकि अतीत में मंचन के दौरान सूत्रधारों ने अपनी अपनी रुचि-अरुचि या प्रतिभा के अनुसार नाट्यकार के द्वारा


  1. श्री पाटणकर जी ने कृति का शीर्षक “अभिज्ञानशकुन्तलम्” मान्य किया है। वस्तुतः ऐसा शीर्षक बंगाली, मैथिली और काश्मीरी पाण्डुलिपियों में प्रवर्तमान है। और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य पाण्डुलिपियों में “अभिज्ञानशाकुन्तलम्” है।
  2. प्रोफे. बलवन्तराय ठाकोर (गुजरात), डॉ० एस.के. बेलवरकर (पुणे) और शारदरंजन राय (कोलकाता)।

अभिज्ञानशकुन्तलम्        प्रस्तावना        35

लिखे गये पाठ्यांश में प्रायः परिवर्तन एवं परिवर्धन किया ही है। नाटक एक अभिनेय-काव्य होने के कारण स्थल-काल की एवं रंगमंच की मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सूत्रधारों के लिए नाट्यकार के मूल पाठ में परिवर्तन करना आवश्यक भी हो जाता है। अतः पाण्डुलिपियों में संचरित हुए नाट्यकृतियों के पाठ को हम सर्वथा मौलिक नहीं मान सकते हैं। ऐसे पाठों की आन्तरिक सम्भावना की दृष्टि से परीक्षा करने की नितान्त आवश्यकता रहती है। यह बात कालिदास जैसे नाट्यकार के लिए, तथा अभिज्ञान-शाकुन्तल जैसे सर्वश्रेष्ठ नाटक के लिए तो बिलकुल सही है क्योंकि उसकी लोकप्रियता आजन्म सिद्ध होने के कारण इसका मंचन पौनःपुन्येन होता ही रहा है। नाट्यकृति के परम्परागत पाठ में आन्तरिक सम्भावना बहुविध दृष्टि से देखी जा सकती है: जैसे कि (1) कृति के पाठ में विचार विषयक पूर्वापर संगति, (2) नाटकीयता की दृष्टि से संवादों में अपेक्षित आनुक्रमिकता, (3) कवि की निरूपण शैली, (4) कृति के मूलस्रोत रूप जो सामग्री हो उसका विश्लेषण एवं मूलस्रोत का परिमार्जन का हेतु, (5) कृति के लक्ष्य की सिद्धि, अर्थात् उपक्रमोपसंहार की संगति इत्यादि।

0-4 यहाँ बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं के अमुक निश्चित पाठभेदों की ही चर्चा की जा रही है जिसमें विशेष रूप से श्लोकात्मक संवादों की समीक्षा करना अभीष्ट है। यहाँ शब्दपर्यन्त ही सीमित रहनेवाले पाठभेदों की, या रंगसूचना देनेवाले वाक्यों में दिख रहे पाठभेद, या पात्रसृष्टि के नाम-सम्बद्ध पाठभेद, या प्रयोगवैविध्य को जन्म देनेवाले पाठभेदों की चर्चा नहीं की जायेगी। एवमेव, अलग अलग वाचनाओं में दृश्यमान प्राकृत-उक्तियों की प्राकृतभाषा की अनेकरूपता भी चर्चित नहीं की जायेगी।<sup>25</sup> यहाँ तो प्राधान्येन कुछ गद्य संवाद एवं श्लोकों में दिख रहे पाठभेद (जो प्रक्षेप एवं संक्षेप का परिणाम हो सकता है) की चर्चा की जा रही है।

1-1-0 बंगाली वाचना का पाठ प्राचीनतर है, इसी लिए वही पूर्ण रूप से मौलिक भी है ऐसा मान लेना मुश्किल है। तथा देवनागरी वाचना के पक्षधर कतिपय विद्वानों ने जैसे उस (बंगाली) वाचना का पाठ बृहत्पाठ होने मात्र से उसे पूर्ण रूप से प्रक्षेपों से भरा मान लिया है और उसकी नितान्त उपेक्षा की है, वह भी न्यायिक नहीं है। एवमेव, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में ही संयमपूर्ण एवं व्यञ्जनासभर शृङ्गार निरूपित हुआ है, अतः वही मौलिक हो सकता है-ऐसा दावा करना भी सही नहीं है। निष्पक्ष बात तो वही हो सकती है कि दोनों तरह की वाचनाओं की तुलनात्मक दृष्टि से समीक्षा की जाय, तथा उभयत्र प्रक्षेप-संक्षेपादि के उदाहरण लेकर मूल पाठ के निर्धारण का विवेक उजागर किया जाय।


  1. इस सन्दर्भ में मेरा शोध-आलेख द्रष्टव्य है:-"शाकुन्तल की प्राकृतविवृत्ति एवं प्राकृतछायाएँ", संबोधि (वॉ 35) एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद, 2013

36 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

1-1-1 बंगाली पाठ में प्रथम अङ्क के आरम्भ में ही तापस की उक्ति के रूप में जिसका प्रक्षेप हुआ है वह श्लोक निम्नोक्त है। मृगयाविहारी राजा दुष्यन्त को वह कहता है कि, भो भो राजन्, आश्रममृगः खल्वयम्।

न खलु न खलु बाणः संनिपात्योऽयमस्मिन्
मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः।
क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं
क्व च निशितनिपाताः सा​रपुङ्खाः शरास्ते।।

<p align="right">1-10</p>

यह श्लोक, निम्न स्तरीय पाठालोचना के अनुसार बंगाली और मैथिली पाठपरम्पराओं में संचरित होकर हम तक आया है और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य में भी यह श्लोक सुरक्षित रहा है अतः उसे मौलिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु काश्मीरी वाचना में यह श्लोक दिखता नहीं है तथा देवनागरी वाचना के प्रमुख टीकाकार राघव भट्ट ने इस श्लोक पर टीका नहीं लिखी है, इसलिए यह सोचना अनिवार्य बनता है कि यह श्लोक मौलिक होगा या प्रक्षिप्त? बहुसङ्ख्य पाण्डुलिपियों में होना या अन्यान्य टीकाकारों के द्वारा व्याख्यात होना यही एक अन्तिम निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता है। उच्च स्तरीय आलोचना में पाण्डुलिपियाँ एवं टीकाओं के आधार को छोड़ कर कुछ कृतिनिष्ठ साधक-बाधक प्रमाणों पर विचार करना चाहिए। यहाँ नेपथ्योक्ति से एक बार कहा गया है कि भो भो राजन्, आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः। उसके बाद रंगमंच पर सारथि राजा को कहता है कि आपके बाण और कृष्णमृग के बीच में तपस्वी लोग आकर खड़े हैं। तब राजा ने रथ को रोकने की सूचना दी और तपस्वी रंगमंच पर आकर वही नेपथ्योक्ति दोबारा बोलते हैं। यह पुनरुक्ति तो आवश्यक थी कि प्रेक्षकों को मालूम हो जाय कि नेपथ्य में से बोलनेवाले कौन थे। लेकिन वह तापस “न खलु न खलु०” वाला श्लोक बोलकर तीसरी बार भी वही आज्ञा दे कि इस मृग को न मारा जाय, तो वह नाटक में संमान्य नहीं है। इस तापस को मृग के मृदु शरीर की गुजारिश करने की, दया की याचना करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि" यह आश्रम का मृग है" इतना ही पर्याप्त है, उसमें ही आज्ञा सुनिश्चित थी। फिर भी जो कहना था वह तो “तदाशु कृतसंधानम्०” इस अनुगामी श्लोक से कहनेवाला ही है कि राजा के शस्त्र आर्त्त-परित्राण के लिए हैं, अनागस को मारने के लिए नहीं हैं। इस अधिक महत्त्वपूर्ण बात को कहने में कोई पुनरुक्ति नहीं है, किन्तु “न खलु न खलु०” वाले श्लोक में तो नितान्त पुनरुक्ति है, जो नाटक में असह्य होती है। अतः वह श्लोक प्रक्षिप्त ही होगा, और अब काश्मीरी में इस श्लोक का न होना एवं राघवभट्ट के द्वारा व्याख्यात नहीं होना सूचक सिद्ध होता है। उसमें काव्यत्व एवं गेयता होने से उसका संरक्षण होता रहा है, तथा पुष्पराशौ के स्थान में तूलराशौ, और सारपुङ्खा के स्थान में वज्रसाराः जैसे पाठभेद भी प्रविष्ट होते रहे हैं।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 37

1-1-2 बंगाली वाचनानुसारी प्रथमाङ्क के पाठ्यांश में दूसरा प्रक्षेप ऐसा है: दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद दिया जाता है, उसके बाद तापसों की उक्ति है:- “राजन् समिदाहरणाय प्रस्थितावावाम्। एष चास्मद्गुरोः कण्वस्य साधिदैवत इव शकुन्तलानुमालिनीतीरम् आश्रमो दृश्यते। न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्यात्र गृह्यताम् अतिथिसत्कारः।” यहाँ तापसों के द्वारा, मालिनी नदी के तट पर हमारे गुरु कण्व का आश्रम है-इतनी सूचना देना पर्याप्त था। फिर भी कहा जाता है कि “साधिदैवत इव शकुन्तलया” अर्थात् जिस आश्रम में शकुन्तला मानों अधिदेवता के रूप में विराजमान है, उसमें आप अतिथिसत्कार ग्रहण करने हेतु प्रवेश कीजिये। इस वाक्य में गर्भित रूप से कहा ही गया है कि इस आश्रम में आज शकुन्तला ही मुख्य अधिष्ठात्री के रूप में नियुक्त है।$^{26}$ मतलब कि आश्रम में कण्व मुनि की अनुपस्थिति है, यह बात बिना पूछे तापसों ने सामने से बता दी है। अतः इतना सुनने के बाद राजा जब पूछता है कि अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः। तब प्रश्न होता है कि क्या राजा ने “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इन शब्दों को सुना ही नहीं था। राजा ने यदि इन शब्दों को सुना होता तो वह कदापि “अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः” ऐसा नहीं पूछता। इससे सिद्ध होता है कि उपर्युक्त संवाद में “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इतने शब्द प्रक्षिप्त हो सकते हैं। देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी शारदा पाण्डुलिपियों में इन शब्दों का समावेश नहीं है। ये केवल बंगाली और मैथिली वाचना में ही प्रविष्ट हुए हैं।

1-1-3 बंगाली वाचना के पाठ में वाक्यात्मक प्रक्षेप का द्वितीय स्थानः तीनों सखियाँ आश्रम के वृक्षों को जब जलसिञ्चन कर रही हैं तब एक “माधवीलता” का निर्देश आता है। यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि कण्वाश्रम में स्थित जिन वृक्षों एवं लताओं का निर्देश है, उसमें माधवीलता का समावेश होता है या नहीं तथा शकुन्तला का नवमालिका के प्रति विशेष पक्षपात था, क्या उसी तरह से इस माधवीलता के साथ भी था? बंगाली वाचना से यह पाठ्यांश द्रष्टव्य हैः

अनसूया—हला सउन्तले, इअं तादकण्णेण तुमं विअ सहत्थसंवड्ढिदा माहवीलदा। इमं विसुमरिदा सि। (सखि शकुन्तले, इयम् तातकण्वेन त्वमिव स्वहस्तसंवर्धिता माधवीलता। इमां विस्मृतासि।)

शकुन्तला—तदो अत्ताणं पि विसुमरिस्सं। (लतामुपेत्यावलोक्य च सहर्षम्) अच्छरीअं अच्छरीअं। पिअंवदे, पिअं दे णिवेदेमि। (ततः आत्मानमपि विस्मरिष्यामि। आश्चर्यम्..... आश्चर्यम्.... प्रियंवदे, प्रियं ते निवेदयामि।)


  1. टीकाकार शेकर ने लिखा है कि-किंभूतम्, शकुन्तलया कण्वकुमारिकया साधिदैवतमिव सर्वत्राश्रमे अधिष्ठात्री देवतास्ति अस्मिन्। शकुन्तलैव देवतेत्यर्थः।। अभिज्ञानशाकुन्तलम् (शंकरनरहरि-कृतव्याख्या-समलंकृतम्), सं. रमानाथ शर्मा झा, मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा, 1957, (पृ. 172)
38चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

प्रियंवदा—सहि, किं मे पिअं। (सखि, किं मे प्रियम्।)

शकुन्तला—असमए क्खु एसा आ मूलादो मउलिदा माहवीलदा। (असमये खल्वेषा आमूलात् मुकुलिता माधवीलता।)

उभे—(सत्वरमुपगम्य) सहि, सच्चं सच्चं। (सखि, सत्यं सत्यम्।)

शकुन्तला—सच्चं, किं ण पेक्खध। (सत्यम्। किं न प्रेक्षेथे।)

प्रियंवदा—(सहर्षम् निरूप्य) तेण हि पडिप्पिअं दे णिवेदमि। आसण्णपाणिग्गहणा सि तुमं। (तेन हि प्रतिप्रियं ते निवेदयामि। आसन्नपाणिग्रहणासि त्वम्।)

शकुन्तला—(सासूयम्) णूणं एस दे अत्तगदो मणोरधो। (नूनम् एषः ते आत्मगतः मनोरथः।)

प्रियंवदा—ण क्खु परिहासेण भणामि। सुदं खु मए तादकण्णस्स मुहादो तुए कल्लाणसूअअं इदं णिमित्तं ति। (न खलु परिहासेण भणामि। श्रुतं खलु मया तातकण्वस्य मुखात्त्व कल्याणसूचकम् इदं निमित्तम् इति।)

अनसूया—पिअंवदे, अदो ज्जेव सउन्तला ससिणेहा माहवीलदं सिञ्चदि। (प्रियंवदे, अत एव शकुन्तला सस्नेहा माधवीलतां सिञ्चति।)

शकुन्तला—जदो मे बहिणिआ भोदि तदो किं ति ण सिञ्चिस्सं। (यतः मे भगिनी भवति ततः किमिति न सेक्ष्यामि।) (इति कलशमावर्जयति)

माधवीलता से सम्बद्ध इन संवादों का समावेश केवल बंगाली और मैथिली वाचनाओं में दिखता है। यहाँ दो प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं: 1. कण्व मुनि के आश्रम में माधवीलता नामक लता थी या नहीं तथा 2. जैसे प्रियंवदा ने यहाँ कहा है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है ऐसा कण्व ने बताया है, तो क्या वस्तुतः ऐसा कहा होगा? विचार करने से लगता है कि ये दोनों बातें प्रक्षिप्त होनी चाहिए। क्योंकि (1) प्रथमांक के वृक्षसिंचनवाले दृश्य में जब शकुन्तला ने पहले कह दिया है कि—हला अनसूये, न केवलं तातनियोगः, ममापि सहोदरस्नेहः एतेषु। (इति वृक्षसेचनं नाटयति)। अर्थात् शकुन्तला के लिए तो आश्रम के छोटे बड़े सभी वृक्ष एवं लतायें सहोदर समान ही हैं, तो फिर कण्व ने अपने हाथों से सम्वर्द्धित की हुई माधवीलता को ही केवल शकुन्तला अपनी “भगिनी” कहे वह उचित नहीं है। इससे पूर्वापर कथन में विरोध आता है। एवञ्च, कवि ने शकुन्तला का विशेष पक्षपात तो नवमालिका लता के प्रति पहले दिखाया है। शकुन्तला ने उसका वनतोषिणी (वनज्योत्स्ना) ऐसा विशेष-नामकरण भी किया है। अतः माधवीलता सम्बद्ध यह संवाद प्रक्षिप्त होने की सम्भावना दिख रही है। किन्तु (अज्ञात) प्रक्षेपकर्ता ने सावधानी भी बरती है। चतुर्थांक में शकुन्तला-विदाई प्रसंग में भी इस माधवीलता का पुनरुल्लेख जोड़ दिया गया है। जैसे कि

अभिज्ञानशकुन्तलम्प्रस्तावना39

शकुन्तला—(स्मृत्वा) ताद, लदावहिणिअं दाव माहविं आमन्तइस्सं। (तात, लताभगिनीं तावत् माधवीमामन्त्रयिष्यामि।)

कण्वः—वत्से, अवैमि ते तस्यां सौहार्दम्। इयं सा दक्षिणे। पश्य।

शकुन्तला—(उपेत्य लतामालिङ्ग्य) लदावहिणिए। पच्चालिङ्ग मं साहामईहिं बाहाहिं। अज्ज पहुदि दूरवत्तिणी खु दे भविस्सं। ताद, अहं विअ इअं तए चिन्तणीआ।

(लताभगिनि, प्रत्यालिङ्ग मां शाखामयैः बाहुभिः। अद्यप्रभृति दूरवर्तिनी खलु ते भविष्यामि। तात, अहमिव इयं त्वया चिन्तनीया।)

कण्वः—वत्से,

सङ्कल्पितं प्रथममेव मया त्वदर्थे
भर्तारमात्मसदृशं स्वगुणैर्गतासि।
अस्यास्तु सम्प्रति वरं त्वयि वीतचिन्तः
कान्तं समीपसहकारमिमं करिष्ये॥

<p align="right">4-15</p>

तदितः पन्थानं प्रतिपद्यस्व।

शकुन्तला—(सख्यावुपेल्य) हला, एसा दोण्णं पि वो हत्थे णिक्खेवो। (सखि, एषा द्वयोः अपि वां हस्ते निक्षेपः।)।

यहाँ दो बातें खटकती हैं:—(1) शकुन्तला ने पतिगृह जाते समय कण्व को इस माधवीलता के बारे में चिन्ता करने की विनती की है और अपनी सहेलियों से भी वही विनती की है। इसमें न केवल पुनरुक्ति है, उसमें पिता द्वारा पहले दिये वचन पर अविश्वास है ऐसा भी सूचित होता है। दूसरा वदतोव्याघात जैसा बिन्दु यह है कि पिता कण्व ने जो वचन श्लोक-15 के माध्यम से कहे हैं वह प्रथमांक में कही गयी बातों से विरुद्ध है। प्रथमांक में शकुन्तला ने ही कहा है कि सहकार वृक्ष के साथ तो नवमालिका का व्यतिकर हो चुका है, उसके बाद अब कण्व कैसे इस माधवीलता को सहकार वृक्ष के साथ विवाहित करेंगे? इस विरोधपूर्ण बात को देखते हुए कहना होगा कि माधवीलता से सम्बद्ध जो वचन प्रथमांक में एवं चतुर्थांक में हैं वह दोनों प्रक्षिप्त हैं। एक तीसरा विचारणीय बिन्दु यह भी है कि माधवीलता के सन्दर्भ में जो “इति कलशामावर्जयति” ऐसी रंगसूचना है, वह भी “इति वृक्षसेचनं नाटयति” से हट कर नये स्वरूप की है। यह भी माधवीलता से सम्बद्ध संवादमाला की प्रक्षिप्तता का सबूत बनता है। (2) जैसे प्रियंवदा बताती है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है—ऐसा कण्व ने कहा है, तो यह संवाद भी प्रक्षिप्त इस लिये होगा कि पहले तो तापसों ने दुष्यन्त को ऐसा कहा है कि—इदानीमेव दुहितरम् अतिथिसत्कारायादिश्य दैवमस्याः प्रतिकूलं शमयितुं सोमतीर्थं गतः। अर्थात् शकुन्तला के सम्भावित प्रतिकूल दैव

40 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

के शमन के लिये कण्व तीर्थयात्रा पर चल पड़े हैं। यदि उन्होंने जान लिया है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है, तो वे आश्रम से क्यों चल पड़े हैं, यह सवाल पैदा होता है। तथा यह बात उन्होंने अकेली प्रियंवदा को ही क्यों कही थी, ऐसा दूसरा सवाल भी उठता है। महाकवि कालिदास जैसे परिणतप्रज्ञ नाट्यकार से ऐसी परस्पर विसंगतताओं से भरी प्रस्तुति सम्भव ही नहीं है। अतः उसको प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा।

1-1-4 बंगाली वाचना के प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण देखने के बाद, उसमें कुत्रचित् संक्षेप भी हुआ है उसका भी निरूपण करना चाहिए:

राजा—उपपद्यते,

मानुषीभ्यः कथं नु स्यादस्य रूपस्य संभवः।
न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्।।
1-25

(शकुन्तला सव्रीडाऽधोमुखी तिष्ठति)

राजा—(आत्मगतम्) हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः।

प्रियंवदा—(सस्मितम् शकुन्तलां विलोक्य) पुणो वि वक्तुकामो विअ अज्जो। (पुनः अपि वक्तुकामः इव आर्यः।) (शकुन्तला सखीमङ्गुल्या तर्जयति।)

राजा—सम्यगुपलक्षितं भवत्या। अस्ति नः सुचरितश्रवणलोभादन्यदपि प्रष्टव्यम्।

प्रियंवदा—तेण हि अलं विआरिदेण। अणिज्जन्तणणिओओ क्खु तवस्सिअणो। (तेन हि अलं विचारितेन। अनियन्त्रणनियोगः खलु तपस्विजनः।)

राजा—एतत्पृच्छामि

वैखानसं किमनया व्रतमाप्रदानाद् व्यापाररोधि मदनस्य निषेवितव्यम्।
अत्यन्तमेव सदृशेक्षणवल्लभाभिराहो निवत्स्यति समं हरिणाङ्गनाभिः।।
1-26

प्रियंवदा—अज्ज धम्माअरणपरव्वसो अअं जणो। गुरुणो उण से अणुरूववरप्पदाणे संकप्पो। (आर्य, धर्माचरणपरवशः अयं जनः। गुरोः पुनः अस्याः अनुरूपवरप्रदाने संकल्पः।)

राजा—(आत्मगतम् सहर्षम्)

भव हृदय साभिलाषं सम्प्रति संदेहनिर्णयो जातः।
आशङ्कसे यदग्निं तदिदं स्पर्शक्षमं रत्नम्।।
1-27

शकुन्तला के जन्म का वृत्तान्त प्रियंवदा से जान लेने के बाद, दुष्यन्त को मालूम हो जाता है कि शकुन्तला राजर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की संतति है। अब दुष्यन्त के

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 41

मनोरथों को साकार होने का अवकाश निश्चित है। वह अपने आप को कहता है कि हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः। किन्तु इस उक्ति के बाद भी एक गद्य वाक्य था, जो किसी अज्ञात सूत्रधार ने शायद हटा दिया है, संक्षेप कर लिया है। वह वाक्य मैथिली और काश्मीरी वाचनाओं में, तथा देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं में सुरक्षित रहा है। जैसे मैथिली में, “किन्तु परिहासोदारं वरप्रार्थनमस्याः श्रुत्वापि, व्रतद्वैतकातरं मे मनः।”, उसी तरह से देवनागरी में, “किन्तु सख्याः परिहासोदाहृतां वरप्रार्थनां श्रुत्वा, धृतद्वैधीभावकातरं मे मनः”। नायक ने जान लिया कि शकुन्तला ब्राह्मणकन्या नहीं है, इस लिए उसके मनोरथ को सफल होने का अवकाश है। फिर भी उसका मन द्विधाभाव का अनुभव कर रहा था। शकुन्तला क्या मदनव्यापार को रोकनेवाले वैखानस व्रत का आचरण सदैव करनेवाली है, या फिर वह व्रत विवाह पर्यन्त ही है? इस द्विविधा को प्रकट करनेवाला दूसरा वाक्य बंगाली वाचना में से हटाया गया है। यह द्विविधापूर्ण स्थिति यद्यपि आत्मगत उक्ति के द्वारा रखी गयी है, तथापि उसका मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए लगता है कि जो उत्तरवर्ती संवाद-शृङ्खला है, वह पूर्ण रूप से इस द्विविधा की निवृत्ति के लिए ही प्रस्तुत हो रही है। तथा अन्त में श्लोक-27 से इस द्विविधा का उपशमन भी किया गया है।।

1-2-0 देवनागरी वाचना के पाठ में ही कालिदासीय कवित्व का संस्पर्श है-ऐसा मानना आत्मलक्षिता से भरा है, एवं तुलनात्मक अभ्यास के अभाव का परिणाम है। सुप्रचलित एवं बहुव्याख्यात होते हुए भी देवनागरी वाचना का पाठ मौलिकता से दूर हट गया है क्योंकि उसमें बहुशः संक्षिप्त किया गया पाठ ही संचरित हुआ है, और कुत्रचित् उसमें भी प्रक्षिप्तांश मिलते हैं। इसकी उच्च स्तरीय पाठालोचना करना अनिवार्य है।

1-2-1 देवनागरी वाचना में प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप का उदाहरणः कृष्णमृगानुसारी राजा दुःषन्त / दुष्यन्त के मार्ग में बीच में आकर वैखानस कहता है भो राजन्, आश्रममृगोऽयम्, न हन्तव्यो न हन्तव्यः। तब राजा ने अपना बाण वापस ले लिया। इससे प्रसन्न हुए वैखानस ने राजा को आशीर्वाद दिया कि-

सदृशमेतत् पुरुवंशप्रदीपस्य भवतः।
जन्म यस्य पुरोर्वंशे युक्तरूपमिदं तव।
पुत्रमेवंगुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहि।।
(1-11)

इसके पश्चात्, वैखानस के साथ आये हुए दोनों शिष्यों ने अपने हाथ उठा कर उसी आशीर्वाद का अनुवाद करते हुए कहा है-सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रमाप्नुहि।। यहाँ देवनागरी वाचना के पाठ में स्पष्ट रूप से पुनरुक्ति हो रही है। जो आशीर्वचन वैखानस ने दिये हैं उसका दृढीकरण करनेवालों का दर्जा मात्र शिष्य का है। अतः उसका औचित्य कितना? इससे प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ अंश प्रक्षिप्त एवं परिवर्तित हुआ है। इसका समाधान

42 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

बंगाली वाचना में होता है। बंगाली पाठ में रंगमंच पर केवल दो तापस ही आते हैं और उनमें से एक ही तापस ने आशीर्वचन कहे हैं। दूसरे तापस ने उसकी पुनरुक्ति नहीं की है। वहाँ पर उपर्युक्त श्लोक भी नहीं आता है। तापस ने केवल गद्य वाक्य में ही आशीर्वाद दिये हैं। हाँ, इतना जरूर कहना चाहिए कि देवनागरी वाचनानुसारी प्रस्तुति में दृश्य की अभिनेयता बढ़ जाती है। शायद इसी लिये किसी सूत्रधार की प्रतिभा ने पूर्वोक्त श्लोक का प्रक्षेप करवाया होगा।

1-2-2 प्रथमाङ्क में श्लोक का संक्षेपः (बंगाली वाचनानुसार) कण्व मुनि के आश्रम के पास पहुँचते ही राजा ने यह तपोवन का भाग है ऐसा सारथि को बताते हुए निम्नलिखित दो श्लोकों में उसका वर्णन किया है-

नीवाराः शुककोटरगर्भमुखभ्रष्टास्तरूणामधः
प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः।
विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः॥
1-13

अपि च-

कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः शाखिनो धौतमूला
भिन्नो रागः किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन
एते चार्वागुपवनभुवि च्छिन्नदर्भाङ्कुरायां
नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति॥
1-14

श्री पी. एन. पाटणकर के द्वारा संपादित शकुन्तल में दोनों श्लोक यथावत् मान्य किये गये हैं। किन्तु राघवभट्ट ने शाकुन्तल के जिस पाठ पर टीका लिखी है वह (अति)संक्षिप्त किया गया पाठ है। उस पाठ में “अपि च” से सम्बद्ध किया गया कुल्याम्भोभिः० वाला दूसरा श्लोक हटाया गया है। अर्थात् इस श्लोक पर राघवभट्ट ने टीका ही नहीं लिखी है। इस श्लोक को यदि मौलिक मानते हैं तो उसको हटाने का कारण यही हो सकता है कि मंचन के दौरान समय-मर्यादा को, अथवा नट की स्मृति-मर्यादा को ध्यान में रखते हुए उसे काटा जा सकता है। यदि इस श्लोक को मौलिक नहीं मानते हैं तो उसका क्या प्रमाण हो सकता है, वह सोचना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि प्रथम श्लोक में” विश्वासोपगमाद् अभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगाः” कहा गया है, तथा दूसरे श्लोक में भी “नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति” बताया जाता है। इन दोनों वर्णनों में पुनरुक्ति है, जो नाटक जैसी समयबद्ध कला में असह्य होती है। कालिदास जैसे नाट्यकार शाकुन्तल में कहीं भी पुनरुक्ति नहीं

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करते हैं उसमें दो मत नहीं है। इस दृष्टि से, “अपि च” से सम्बद्ध$^{27}$ दो श्लोकों में से एक प्रक्षिप्त होने की सम्भावना हमें स्वीकारनी चाहिये।

1-2-3 प्रथमांक में संक्षेप का एक अन्य स्थान भी दृष्टिगोचर हो रहा है: शकुन्तला ने जो वल्कल धारण किये हैं उस सन्दर्भ में बंगाली वाचना में, निम्नोक्त संवाद-शृङ्खला प्राप्त होती है:

राजा- (आत्मगतम्) कथमियं सा कण्वदुहिता शकुन्तला। (सविस्मयम्) अहो असाधुदर्शी तत्रभवान् कण्वो य इमां वल्कलधारणे नियुङ्क्ते।

इदं किलाव्याजमनोहरं वपुस्तपःक्लमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया शमीलतां छेतुमृषिर्व्यवस्यति।।
1-17

भवतु, पादपान्तरितो विश्वस्तां तावदेनां पश्यामि। (इत्यपवार्य स्थितः)

शकुन्तला- हला, अणूसूए, अदिपिणद्धेण एदिणा वक्कलेण पिअंवदाए दढं पीडिद म्हि। ता सिढिलेहि दाव णं। (अनसूया शिथिलयति), (सखि अनसूये, अति पिनद्धेनैतेन वल्कलेन प्रियंवदया दृढं पीडितास्मि। तत् शिथिलय तावदेनम्।)

प्रियंवदा- (विहस्य)-एत्थ दाव पओहरवित्थारइत्तअं अत्तणो जोव्वणारम्भं उवालहसु।
(अत्र तावत् पयोधरविस्तारयितृकमात्मनो यौवनमुपालभस्व।)

राजा- सम्यगियमाह-

इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे
स्तनयुगपरिणाहाच्छादिना वल्कलेन।
वपुरभिनवमस्याः पुष्यति स्वां न शोभां
कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोदरेण।।
1-18

अथ वा काममप्रतिरूपमस्य वयसो वल्कलं न पुनरलङ्कारश्रियं न पुष्णाति। कुतः

सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं
मलिनपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। 1-19


  1. इस सन्दर्भ में मेरा एक लेख द्रष्टव्य है-अभिज्ञाकुन्तल में अपि च से सम्बद्ध प्रक्षेप एवं संक्षेप की पहचान। “धीमहि”, (वॉ-3) सं. दिलीपकुमार राणा, चिन्मय इन्टरनेशनल फाउन्डेशन शोध संस्थान, एरनाकुलम्, 2012, पृ. 76 से 89

44 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

अपि च

कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपं
न मनसि रुचिभंगं स्वल्पमप्यादधाति।
विकचसरसिजायाः स्तोकनिर्मुक्तकण्ठं
निजमिव कमलिन्याः कर्कशं वृन्तजालम्।। १-२०

यहाँ टीकाकार चन्द्रशेखर ने बंगाली पाठानुसारी उपर्युक्त चारो श्लोकों पर टीका लिखी है। किन्तु इसके विपरीत राघवभट्ट द्वारा जिस पर टीका लिखी गयी है वहाँ दो ही (पहला और तीसरा) श्लोक हैं। अतः चर्चा करना आवश्यक हो जाता है कि बंगाली पाठ्यांश में प्रक्षेप है या फिर देवनागरी पाठ में संक्षेप हुआ है? यहाँ सब से पहले कालिदास के “अथवा” निपात के प्रयोग का स्वारस्य विचारणीय है। कालिदास जब एक विचार की प्रस्तुति करते हैं और वहाँ तर्क की दृष्टि से प्रतिपक्ष में भी कोई विरोधी विचार प्रस्ताव के योग्य हो तो उसको तुरन्त “अथवा” निपात से अवतारित कर ही देते हैं। उदाहरण के रूप में-क्व सूर्यप्रभवो वंशः, क्व चाल्पविषया मतिः। इत्यादि (रघुवंशम् 1-2) लिखने के बाद तो, काव्यसर्जन के लिये उद्यत हुए कवि को उस कर्म से विरत ही हो जाना चाहिए। लेकिन हमारे कवि यहाँ तुरन्त “अथवा” निपात का प्रयोग करते हुए पक्षान्तर को प्रस्तुत कर देते हैं कि-अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः। (रघुवंशम् 1-4) इस तरह से, सूर्यवंश अतिमहान् होते हुए भी उनके द्वारा रघुवंश का वर्णन कैसे सम्भव है वह लिख देते हैं।²⁸

(बंगाली पाठ के अनुसार) शकुन्तला की सहेलियों के ऐसे उपर्युक्त संवाद को सुन कर वृक्ष के पीछे खड़े दुष्यन्त ने दो (18 एवं 19) श्लोकों का उच्चारण किया है और इन दोनों के बीच में “अथवा” निपात का विनियोग किया है। श्लोक-18 में पहले कहा गया है कि स्तन-युगल के विस्तार को वल्कल से बाँधा गया है, जिससे शकुन्तला का अभिनव शरीर उसी प्रकार अपनी निजी शोभा को नहीं बढ़ाता है जैसे पाण्डु पर्णों के अन्दर बाँधे गये पुष्प शोभा नहीं देते हैं। इतना कह देने के बाद नायक को अपने विचार में रहा एक सूक्ष्म दोष भी दिखायी देता है। अभी जो कहा गया है उसका मतलब तो यही होगा कि शकुन्तला के सौन्दर्य को निखारने के लिए वल्कल नहीं, किन्तु कुछ अन्य वस्त्र होने चाहिए। नायक तुरन्त अपने वाग्दोष को सुधारने के लिए, (स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।) “अथ वा” शब्द का प्रयोग करता हुआ, इस सन्दर्भ में पक्षान्तर प्रस्तुत करता है कि शकुन्तला के वल्कल भी उसकी शोभा नहीं बढ़ाते है ऐसा नहीं है। क्योंकि जो मधुर आकृतिवाले लोग होते हैं उनको तो सब कुछ अच्छा ही लगता है। इस तरह से पूरे नाटक में, जहाँ जहाँ पर


  1. टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे सन्दर्भों के लिए लिखा है कि-स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 45

अमुक विचार को प्रस्तुत करने के बाद पक्षान्तर में दूसरा विचार भी कहना तर्क की दृष्टि से अनिवार्य लगता है कवि ने वहाँ अथवा का प्रयोग किया ही है। अर्थात् “अथवा” निपात से अवतारित किये दो दो श्लोकों का (बंगाली पाठ में) जो भी सन्दर्भ है उसके मौलिक होने की सम्भावना अधिक है। देवनागरी (एवं दाक्षिणात्य) वाचना के पाठ को संक्षिप्त करनेवालों ने ऐसे “अथवा” निपात से जुड़े दो दो श्लोकवाले सन्दर्भों को ही कटौती करने के लिए प्रायः पसन्द किया है। राघवभट्ट के द्वारा स्वीकृत पाठ में उपर्युक्त श्लोक-18 इसी कारण से नहीं मिलता है। तथा “अथवा” से शुरू होनेवाली (बंगाली वाचना के पाठ की) वाक्य-रचना भी बदल दी गयी है। इस तरह से देवनागरी में इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना०। श्लोक का न होना संक्षेपीकरण का परिणाम है ऐसा सिद्ध होता है।

सरसिजमनुविद्धं ...। श्लोक के नीचे जो कठिनमपि ...। श्लोक है, उसे “अपि च” निपात से बाँधा गया है। लेकिन यहाँ सरसिजम्० श्लोक से जो विचार प्रस्तुत किया गया है उसी का पुनरुच्चार दूसरे शब्दों में किया जा रहा है। अतः नाटक में, (वह भी शाकुन्तल जैसे कालिदास के नाटक में) पुनरुक्ति रूप संवाद प्रक्षिप्त होने की पूरी सम्भावना है। टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी इस कठिनमपि... वाले श्लोक (1-20) के लिए कहा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। तीरभुक्तीय अर्थात् मैथिली पाठ में, एवमेव देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में भी वह श्लोक संचरित नहीं हुआ है। इससे भी इस श्लोक का मौलिक न होना सिद्ध हो जाता है। इस श्लोक को बंगाली पाठ में प्रक्षिप्त मानना होगा।

1-2-4 देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेप किये हुए स्थानों के उदाहरणः अभिज्ञानशाकुन्तल में कुत्रचित् वर्णनात्मक स्थान हैं, वहाँ पर दो दो श्लोकों को समुच्चयार्थक “अपि च” अव्यय से सम्बद्ध किया गया है। लेकिन ऐसे स्थान प्रक्षेप एवं संक्षेप के सम्भावित स्थान भी हैं। अतः शाकुन्तल में प्रयुक्त इस समुच्चयार्थक “अपि च” के प्रयोग का स्वारस्य सर्व प्रथम गवेषणीय बनता है। उदाहरण के रूप में भ्रमरबाधा प्रसंग को हम लेते है। यहाँ पर बंगाली एवं मैथिली वाचना में “अपि च” से सम्बद्ध किये गये दो श्लोक हैं:

राजा-( सस्पृहम् ) यतो यतः षट्चरणोऽभिवर्तते, ततस्ततः प्रेरितवामलोचना। विवर्तितभ्रूरियमद्य शिक्षते भयादकामापि हि दृष्टिविभ्रमम्॥

<p align="right">1-22</p>

अपि च-(सासूयमिव) चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः।