अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें28 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
संचरित हुई है, वही मौलिकता के नजदीक हो सकती है ऐसी सम्भावना दृढतर हो कर सामने आती है।
4-1 आन्तरिक सम्भावना का पञ्चम स्थानः-अभिज्ञानश(शा)कुन्तल की सभी वाचनाओं के षष्ठाङ्क में विरही दुष्यन्त के मुख से अन्तःपुर में बार बार गोत्रस्खलन होने से वह शरमिन्दा हो जाता है ऐसा निर्देश है।
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा,
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्॥
(शाकु. 6/5)
अब गान्धर्व-विवाह को वर्णित करनेवाले (देवनागरी वाचना के) तृतीयाङ्क में दुष्यन्त-शकुन्तला का जो मिलन है वह तो कुछ दो-पाँच संवादों का ही वर्णित किया है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में, शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” जैसे शब्द से सम्बोधन किया है और नायक दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” शब्द से उल्लिखित किया है। ऐसे परस्पराश्लिष्ट / परस्पराश्रित दाम्पत्य का निरूपण होने के बाद यदि गोत्रस्खलन का उल्लेख किया जाय तो वह ज्यादा प्रीतिकर सिद्ध हो सकता है।
5-1 देवनागरी वाचना के षष्ठाङ्क में वर्णित प्रसङ्गों का बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में प्रदर्शित प्रसङ्गों के साथ एक तरह का आन्तर सम्बन्ध दिखायी देता है। इसी बात का समर्थन करनेवाला षष्ठाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी यहाँ उल्लेखनीय हैः देवनागरी (इत्यादि सभी) वाचनाओं में, विरही दुष्यन्त के सामने पत्रारूढ पौरकार्य प्रस्तुत किया जाता है। जिस में एक समुद्रव्यवहारी सार्थवाह धनमित्र अनपत्य मर गया है-ऐसी बात कही जाती है। यहाँ पर दुष्यन्त की उक्ति स्मरणीय हैः “अनपत्यश्च किल तपस्वी। राजगामी तस्यार्थसंचय इति एतद् अमात्येन लिखितम्। कष्टं खल्वनपत्यता। बहुधनत्वाद् बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम्। विचार्यताम् यदि काचिद् आपन्नसत्त्वा तस्य भार्यासु स्यात्”। महाकवि कालिदास को यहाँ दुष्यन्त को शकुन्तला की आपन्नसत्त्वावस्था का स्मरण दिला कर पश्चात्ताप में डालना तो अभिप्रेत होगा ही, लेकिन उनको अपनी अनपत्यता का भी स्मरण देना अभीष्ट होगा। क्योंकि इस नाटक के आरम्भ में दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति होगी ऐसे आशीर्वचन दिये गये हैं, और वही है इस नाटक का अन्तिम लक्ष्य (द्विवेदी, कालिदास ग्रन्थावली (भाग-2)¹⁷।
इसी लिये षष्ठाङ्क में, धनमित्र के प्रसङ्ग से राजा दुष्यन्त की अनपत्यता का स्मरण ध्वनित करके कवि ने इस नाटक के चरम लक्ष्य को प्रेक्षकों के सामने रखा है। यहाँ एक
- इदमेव प्रयोजनमेतस्य नाटकोत्तमस्येत्यभिनवगुप्तो नाट्यशास्त्रविवृतावभिनवभारत्यां 19-22 कारिकायां घनश्यामश्च। अत एव सार्थक्यं षष्ठसप्तमाङ्कयोः। कालिदास-ग्रन्थावली (द्वितीयो भागः), अनु रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन, 2008, पृ. 318