अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 27
रह गया है, जो हमारे लिये एक अकाट्य आन्तरिक प्रमाण है। सारभूत बात यही है कि 1. पुष्पमयी शय्या और 2. मन्मथलेख के साथ 3. जो बिसाभरण का निर्देश देवनागरी वाचना के पाठ में है वह कहाँ से आया इसका उत्तर केवल बंगाली आदि बृहत्पाठवली वाचनाओं में ही है।
3-1 आन्तरिक सम्भावना का चतुर्थ स्थानः-देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनावाले (लघु) पाठ में गान्धर्व-विवाह नामक तृतीयाङ्क का आलेखन संयमित एवं व्यंजनापूर्ण होते हुए भी उसमें एक स्थान ऐसा है कि जो प्रथम दृष्टि में ही अनुचित लगता है:-“चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी”। ऐसा नेपथ्य से कहा जाता है। इस को सुनते ही शकुन्तला दुष्यन्त को सावधान करती है कि मेरे शरीरवृत्तान्त को जानने के लिये गौतमी आ रही है। तुम वृक्ष के पीछे छुप कर रहो। फिर देवनागरी पाठ में एक रंगसूचना है:-“ततः प्रविशति पात्रहस्ता तापसी, सख्यौ च”। दोनों सखियाँ “इत इत आर्या गौतमी” बोलती हुई गौतमी का प्रवेश करवाती हैं। बाद में वह पूछती है कि क्या अब तेरे शरीर का संताप कुछ कम हुआ है। लो, इस शान्तिदर्भोंदक से तेरी बाधायें हट जायेंगी इत्यादि। फिर तीनों पात्र (गौतमी, अनसूया और प्रियंवदा) शकुन्तला को ले कर रंगभूमि से निकल जाती हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि जिन दोनों सखियों ने नायक-नायिका को रतिक्रीडा के अनुकूल विश्रब्ध स्थान में एकान्त देने के लिये, मृगबाल को अपनी माता के साथ संयोजन करवाने का बहाना बनाकर, अभी अभी कुछ ही क्षण पहले लतावलय से बिदा ली थी, क्या वही दोनों सखियाँ आर्या गौतमी को रास्ता दिखाती हुई वहाँ उपस्थित हो जाती हैं? यह तो सर्वथा अनुचित ही है। यद्यपि यह बात अलग है कि किसी भी विद्वान् ने इस अनौचित्य की ओर अंगुली नहीं उठायी है। लेकिन यह अनौचित्य ध्यातव्य जरूर है।
अब इसी सन्दर्भ को लेकर बंगाली एवं मैथिली वाचना के पाठ का परीक्षण किया जाय तो वहाँ उपर्युक्त अनौचित्य नहीं है। जैसा पहले कहा गया है-बंगाली पाठ में “अनिर्वाणो दिवसः” से लेकर “वत्से, परिणतो दिवसः”-के बीच में नायक-नायिका का जो विस्तृत साहचर्य दिखाया गया है उसमें जिस क्षण में गौतमी का प्रवेश होता है, तब वह अकेली होती है। शान्त्युदक प्रसारित करते हुए वह देखती है कि अस्वस्थ शकुन्तला को देवताओं के सहारे अकेली छोड़ कर प्रियंवदा-अनसूया वहाँ से चली गयी हैं। तब शकुन्तला को कहना पड़ता है कि वे दोनों अभी अभी मालिनी नदी पर गयी हैं (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹⁶। यहाँ दोनों सखियों के साथ में गौतमी उपस्थित नहीं होती है। अर्थात् यहाँ जो पाठ दिखायी देता है वह पूर्वापर सन्दर्भ में बिल्कुल सुसंगत और औचित्यपूर्ण है। अतः बंगाली लिपि में लिखित अभिज्ञानशकुन्तल की पाण्डुलिपियों में जो बृहत्पाठ-परम्परा
- (प्रविश्य पात्रहस्ता गौतमी) जाते इदम् शान्त्युदकम्। (दृष्ट्वा) अस्वस्था इह देवतासहायिनी तिष्ठसि। शकुन्तला-इदानीमेव प्रियंवदानसूये मालिनीम् अवतीर्णे। रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति, (पृ. 41)