अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
4 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
3. समीक्षणीय सामग्री के रूप में उपयुक्त पाण्डुलिपिओं का विवरण
टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती के द्वारा प्रणीत “अभिज्ञान-शकुन्तल-सन्दर्भदीपिका” (अपर नाम “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण”) नामक टीका की दो पाण्डुलिपियाँ दि इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लन्दन के डीस्क्रिप्टिव केटलॉग में, (1) san, ms, i.o. 77-a : Keith, 4117 एवं (2) san, ms, i-o-1398e : Keith, 4118 क्रमाङ्क से निर्दिष्ट हैं।।
(क) प्रथम मातृका (क्रमांक-77-अ.) 4117, जिसके फलक का आकार 12×08 इंच है और पीले कागज पर पुरानी बंगलिपि में लिखी गयी है। यह कुल मिला कर 38 फोलियो में परिसीमित है। प्रत्येक पृष्ठ पर 8 पङ्क्तियाँ लिखी हैं, तथा प्रत्येक पङ्क्त में प्रायः 76 अक्षर अंकित हैं। इस मातृका का लेखन-काल 1728 शकाब्द है, अर्थात् 1806 ई.स. में लिखी गयी है।।
(ख) द्वितीय मातृका (कोलंब्रुक कलेक्शन, क्रमांक-1398,) 4118 है, जिसमें 12×06 इंच का फलक है और पुराने पीले कागज पर लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठ पर 10 पङ्क्तयाँ लिखी गयी हैं तथा प्रत्येक पङ्क्त में करीब 60 अक्षर अंकित हैं। यह पाण्डुलिपि 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में बंगलिपि में लिखी गयी है। यह पाण्डुलिपि कुल मिला के 40 फोलियो में परिसीमित है। 22 से 36 क्रमाङ्क के फोलियो लिखनेवाला लिपिकार कोई अन्य व्यक्ति हो सकता है। पुष्पिका भी किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिखी गयी दिखती है। यह मातृका पहलीवाली से अधिक सुवाच्य है।
(ग) डॉ० श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने (लन्दन में) ऊपर वर्णित दोनों पाण्डुलिपियों की एक प्रतिलिपि अपने हाथों से लिखी थी। उन्होंने वह कॉपी उनकी ओर से मुझे सहर्ष भेंट की है। मूल मातृकायें जहाँ भी अवाच्य या सन्देहास्पद थीं वहाँ पर उनकी लिखी हुई प्रतिलिपि का विनियोग किया गया है जिसके लिये मैं डॉ० काञ्जीलालजी के प्रति आभारी हूँ और प्रणामाञ्जलि के साथ उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।।
(घ) ऐसा संकेत मिलता है कि एक और पाण्डुलिपि भी बांग्ला देश की राजशाही लाईब्रेरी में सुरक्षित है, जिसका क्रमांक-4336 है। परन्तु वहाँ पर किये गये पत्राचार का कोई प्रत्युत्तर मिला नहीं है।
4. प्रस्तुत पाठसम्पादन का परिचय एवं स्वीकृत नियम
भूमिका:- पूर्व-निर्दिष्ट दोनों बंगीय लिपि में लिखी हुई पाण्डुलिपिओं में संचरित पाठ का सर्व प्रथम देवनागरी-लिप्यन्तरण किया जाना चाहिए। इस टीका का पाठ देवनागरी में उपलब्ध होने पर ही इसका विनियोग व्यापक फलक पर हो सकता है। तदनन्तर, द्वितीय सोपान पर पाण्डुलिपिओं में पढ़े गये पाठ का व्याकरणानुसारी शुद्धिकरण करना परम
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आवश्यक है। इसके लिये लिपिकार के प्रमादजन्य-स्खलनों को दूर करना तथा जहाँ भी कोई अवाच्यांश हो तो उस अंश का दूसरी पाण्डुलिपि के आधार पर विशदीकरण करना जरूरी है। दूसरी पाण्डुलिपि के पाठ से साथ पहली पाण्डुलिपि के पाठ का मिलान करते समय जो जो पाठभेद मिलते हैं उसका पादटीप में निर्देश किया गया है। दोनों प्रतियों का तुलनात्मक अभ्यास करके व्याकरण-शुद्ध एवं पूर्वापर सन्दर्भ में सुसंगत हो ऐसे पाठ का चयन करके, उसे आधुनिक विरामचिह्नादि के साथ, एक सुगम एवं परिष्कृत संस्करण तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
भाष्य, वृत्ति, टीकादि रूप कृतियाँ अनेक-कर्तृक नहीं होने से (अर्थात् एक-कर्तृक होने के कारण ऐसे) टीका-ग्रन्थों के पाठ-सम्पादन में वाचनाभेद की प्रायः² समस्या नहीं होती है। अतः टीका-ग्रन्थ की दो प्रतियाँ जब समान काल में लिखी गयी हों तब उन दोनों में से किसी एक प्रति का पाठ, जो अधिक शुद्ध प्रतीत होता हो, उसको मुख्य आधार के रूप में स्वीकारना चाहिए। यदि उस आधारभूत प्रति में भी कुत्रचित् अवाच्यांश, अशुद्ध पाठ्यांश दिखायी दे तो वहाँ पर दूसरी प्रति का सहारा लेकर मूल पाठ का परिष्कृत स्वरूप तैयार किया जा सकता है। अतः प्रस्तुत टीका का देवनागरी लिप्यन्तरण और उसका एक परिशुद्ध संस्करण तैयार करना सम्पादक का प्रमुख कर्तव्य रहा है।
यहाँ जिन दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया गया है वह किसी एक पूर्वज पाण्डुलिपि से प्रतिलिपि करके तैयार की गयी प्रतीत होती हैं क्योंकि दोनों पाण्डुलिपियों के पाठ में प्रायः सर्वत्र समानता है। पाण्डुलिपि क्रमांक-4118 में कुत्रचित् एक या दो वाक्य अधिक हैं। अन्यथा समान पाठ्यांश मिलता है। अतः इन दोनों को हम समान वंशज प्रतियाँ कहेंगे। इन पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ्यांश का पूर्व इतिहास प्रतिलिपि-कर्ताओं ने कहीं पर भी लिखा नहीं है, किन्तु उसका अनुमान किया जा सकता है:-
“क्ष” (चन्द्रशेखर का अप्राप्य स्वहस्तलेख)
↓
“ज्ञ” (अज्ञात पूर्वज प्रति)
↓
4117 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि ............ 4118 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि
इस तरह से उपलब्ध की गयी दोनों पाण्डुलिपियों का सम्बन्ध अनुमित किया जा सकता है। (बांग्लादेश में इसी टीका की जो तीसरी पाण्डुलिपि होने की जानकारी मिलती है, वह अनुपलब्ध होने से उसका सम्बन्ध अभी नहीं सोचा जा सकता है।)
- कालिदास के पद्यकाव्यों के प्रथम टीकाकार कश्मीर के वल्लभदेव की टीका में ऐसी समस्या निश्चित रूप से है कि उसका शारदा लिपिवाली पाण्डुलिपियों का पाठ और देवनागरी पाण्डुलिपियों में मिलने वाला पाठ बहुशः भिन्न दिखायी देता है। अतः वहाँ वाचनाभेद की समस्या हो सकती है।
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इस सम्पादन में उपर्युक्त दोनों पाण्डुलिपियाँ एक समान पूर्वज से बनी हैं ऐसा दिखता है, इसलिए किसी एक पाण्डुलिपि का पाठ मुख्य रूप से स्वीकारा हो और दूसरी प्रति का पाठ गौण माना हो, ऐसा नहीं है। दोनों प्रतियों में मिल रहे समान पाठ्यांश में से जिसका पाठ कुत्रचित् अशुद्ध मालूम हुआ है, उसको पादटीप में रखा गया है। जहाँ दोनों में एक समान अशुद्धि दिख रही हो वहाँ पर पाठ की संशुद्धि प्रदर्शित करने के लिए निम्नोक्त कोष्ठकों का विनियोग किया गया है।।
(क) जहाँ किसी खण्डित या लुप्तांशवाले शब्द में किसी एक या दो वर्ण की पूर्ति करनी आवश्यक लगती है वहाँ [ ] इस तरह के कोष्ठक से क्षतिपूर्ति की गयी है।। उदाहरण के रूप में-[न] कदाचित् स[त्]पुरुषाः शोकपरवशा भवन्ति। (पृ. 203)
(ख) जहाँ पर लिपिकार के प्रमाद या अनवधान से किसी अनर्थक वर्ण का लेखन (=पुनर्लेखन) दिख रहा हो और उसे हटाना आवश्यक लगता है, उस निष्कास्य अंश को { } इस कोष्ठक में रखा गया है। उदाहरण रूप में-सखि, चपलः खल्वेष नूनम्। निवारयितुमेकाकिनी न पारयि{ष}ष्यसि। (पृ. 146)
(ग) किसी अशुद्ध पाठ्यांश के स्थान में सूचित शुद्ध पाठ को प्रदर्शित करने के लिए इस सामान्य ( ) कोष्ठक का विनियोग किया है।। (यहाँ पाण्डुलिपि में जो अशुद्ध मिलता है उसको पहले यथावत् रखते हुए सूचितांश को ही कोष्ठक में दिया गया है।) उदाहरण के रूप में-अत्र तावद् दुःस्व(ष)प्तम् स्मर। यतो राजरक्षितानि तपोवनानि। (पृ. 111)
(घ) किसी शुद्ध पाठ्यांश के स्थान में शुद्ध पाठ की कल्पना करना मुश्किल था उसको इस (?) तरह के निशान से अंकित किया है। उदाहरण रूप में-सोमवन्मनपत्यषे (?)। (पृ. 164)
(ङ) और जब पाण्डुलिपियों में कुछ अंश लुप्त या खण्डित मिलता है (और उसका पुनर्गठन सम्भव नहीं है) तो उसे ........ बिन्दुओं की लकीर से व्यक्त किया गया है।
सारांश यही है कि दोनों पाण्डुलिपियों का विवेक पुरस्सर विनियोग करते हुए प्रस्तुत टीका का पाठ परिष्कृत रूप में सम्पादित करने का उपक्रम रखा गया है। तथा उपर्युक्त विविध प्रकोष्ठों का विनियोग करने के साथ साथ अल्पविराम, पूर्णविरामादि का भी विनिवेश करके मूल पाठ्यांश को सुगम बनाने का भी लक्ष्य रखा है।
दूसरी महत्त्वपूर्ण स्पष्टता यह करनी है कि अकेले चन्द्रशेखर की टीका का पाठ प्रस्तुत करने से नाटक के किस पाठ पर टीका लिखी जा रही है वह तुरन्त नहीं मालूम होता है। अतः पहले नाट्यकृति का मूल पाठ देकर चन्द्रशेखर की तत्सम्बद्ध टीका उसके नीचे ही दी गयी है। यहाँ नाट्यकृति का जो पाठ दिया है वह प्रायः डॉ० रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति का अनुसरण करते हुए रखा है। एवं जहाँ पर भी डॉ० रिचार्ड पिशेल ने किसी श्लोक को
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“मूल पाठ” माना नहीं है, और उसे हटा दिया है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे श्लोक पर टीका लिखी है तो उस श्लोक को यहाँ [ ] इस तरह के प्रकोष्ठ में रखा गया है। ऐसा करने से यहाँ तुलनात्मक दृष्टि से दो बातें ध्यान में आ सकेंगी कि चन्द्रशेखर ने कितने श्लोकोंवाले नाटक का पाठ स्वीकारा है, और चन्द्रशेखर ने जिन प्राकृत उक्तियों का संस्कृत-छायानुवाद दिया है उनमें से डॉ० रिचार्ड पिशेल ने कितनी सहायता प्राप्त की है। यद्यपि डॉ० पिशेल ने ऐसा कहा है कि उन्होंने प्राकृत उक्तियों के पाठ का निर्धारण करने के लिए चन्द्रशेखर की टीका से काफी सहायता ली है, फिर भी यहाँ प्रस्तुत हो रहे नाट्यकृति के पाठ और टीका को पाठ का तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से मालूम होगा कि कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहाँ पर डॉ० पिशेल ने चन्द्रशेखर का अनुसरण नहीं किया है। यहाँ प्राकृत उक्ति के ध्वन्यात्मक स्वरूप-निर्धारण का प्रश्न तो द्वितीय सोपान पर आता है। किन्तु प्रथम सोपान पर तो उस उक्ति का, उसी स्वरूप में मूल नाटक में होना या नहीं होना-यह निश्चित करना ही महत्त्वपूर्ण बात बन जाती है। डॉ० पिशेल के प्राकृत भाषा के तलस्पर्शी ज्ञान को लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता है किन्तु चन्द्रशेखर ने जिस प्राकृत उक्ति को मूल पाठ का अंश माना हो, और डॉ० पिशेल ने उसका त्याग किया हो या कुछ परिवर्तित पाठ को माना हो तो उन दोनों में से प्राचीनतर पाठ क्या हो सकता है? वह विचारणीय बनता है। इस दृष्टि से यहाँ केवल टीका का पाठ न देकर, नाटक के पाठ को (वह भी डॉ० पिशेल-अनुसारी) देकर, ठीक उसके नीचे ही टीका का पाठ देना उपयुक्त समझा है।
5. चन्द्रशेखर का परिचय एवं काल
अभिज्ञानशकुन्तल पर लिखी गयी जिस “सन्दर्भदीपिका” टीका का पाठ यहाँ प्रस्तुत हो रहा है उसके रचयिता बंगाल के चन्द्रशेखर चक्रवर्ती हैं। उन्होंने पुष्पिका में अपने बारे में निम्नोक्त जानकारी दी है:-उनके पिता का नाम श्री विष्णु पण्डित है, जिनको महामहोपाध्याय की उपाधि भी दी गयी थी। इसके अलावा और कोई जानकारी उन्होंने नहीं दी है। संस्कृत साहित्य के अनगिनत रचनाकारों में चन्द्रशेखर नामधारी व्यक्ति भी एकाधिक हैं।³ अतः अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका लिखनेवाले चन्द्रशेखर कौन थे यह निश्चित करना बड़ा मुश्किल कार्य है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने इस विषय में लिखा है कि
- एशियाटिक सोसायटी के कैटलॉग में लिखा है कि एक (1) चन्द्रशेखरपण्डित ने सन्दर्भचिन्तामणि टीका की रचना की है। दूसरे (2) चन्द्रशेखरवाचस्पति ने धर्मदीपिका लिखी थी। तथा तीसरे (3) चन्द्रशेखरशर्मा ने स्मृतिदुर्गमभञ्जनम् एवं तत्त्वचन्द्रिका की रचना की है। यह चन्द्रशेखर शर्मा नवद्वीप में स्थायी बने वारेन्द्र ब्राह्मण थे। महानाटक पर टीका लिखनेवाले एक (4) चौथे चन्द्रशेखर सर्वथा कोई भिन्न व्यक्ति ही हैं। श्रीराजेन्द्र लाल मित्र के मत से “महामहोपाध्याय चन्द्रशेखर” एवं “चन्द्रशेखर वाचस्पति” ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। लेकिन इस अभिप्राय के समर्थन में उन्होंने कोई सबल तर्क नहीं दिया है।
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केटलॉगस केटलॉगोरम में चन्द्रशेखर नामधारी कुल 11 व्यक्ति निर्दिष्ट किये गये हैं। किन्तु अभिज्ञान-शकुन्तल पर “सन्दर्भदीपिका” टीका लिखनेवाला चन्द्रशेखर रङ्गभट्ट का पौत्र और विष्णु पण्डित का पुत्र है। इस विष्णु पण्डित की पहचान निश्चित नहीं है। प्रॉफेसर मोनियर विलियम्स एवं डॉ० ऑटो बोथलिंक के मतानुसार यह चन्द्रशेखर साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ के पिता थे। किन्तु प्रॉफेसर डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) के मतानुसार ऐसा मानना उचित नहीं है। क्योंकि स्वयं चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर साहित्यदर्पण का उल्लेख किया है। अतः वह विश्वनाथ के पुरोगामी या पिता नहीं हो सकते हैं।⁴
चन्द्रशेखर ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका टीका लिखने के उपरान्त 1. शिशुपालवध पर सन्दर्भचिन्तामणि टीका, तथा 2. हनुमन्नाटक पर भी टीका लिखी है। चन्द्रशेखर ने इस सन्दर्भ-चिन्तामणि टीका में एक भावदत्त नामक विद्वान् का नामोल्लेख किया है। इस भावदत्त ने जो तत्त्वकौमुदी नामक ग्रन्थ लिखा है, जिसकी पाण्डुलिपि में लक्ष्मण संवत 572 का निर्देश है। अब लक्ष्मण संवत 572 में “शक संवत 1552” चल रहा था, जिसमें “ईसवीय 1630” चल रही थी। इस के आधार पर चन्द्रशेखर का समय ई. स. 1600 से 1650 के बीच में अनुमित किया जा सकता है।
प्रॉफेसर रिचार्ड पिशेल के मतानुसार (Die Recension der Śakuntala, p. 7) चन्द्रशेखर अभिज्ञान-शकुन्तल का सर्वोत्तम टीकाकार है। या यों कहें कि सब से बड़ा एवं बुद्धिमान् टीकाकार है। उसमें निष्पक्ष न्यायिक बुद्धि, सतर्क पाठसन्तुलन, उपलब्ध सामग्री का सही मूल्यांकन, परम्परा का समुचित ज्ञान एवं श्रद्धेय पाठ-निर्धारण की क्षमता होने से वह एक अच्छा पाठालोचक बन सका है। यद्यपि उसमें कुत्रचित् ज्यादा आत्मविश्वास दिखता है, एवं वह अपने नजदीक के पुरोगामी शंकर की ओर तीव्र-प्रतिक्रिया भी दिखाता है। बड़ा विद्वान् होने से उसने “महामहोपाध्याय” की उपाधि भी अर्जित की है।।
6. लिपिकार द्वारा दी गयी सूचनायें
चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की अभिज्ञानशकुन्तल नाटक पर लिखी गयी सन्दर्भदीपिका टीका की उपलब्ध की गयी दो पाण्डुलिपियों के लिखने वाले लेखक कौन थे? यह स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। किन्तु उन्होंने इन पाण्डुलिपियों के अन्त में जो पुष्पिका के रूप में दो-चार पंक्तियाँ लिखी हैं उसमें से निम्नोक्त सूचनाएँ मिलती हैं। जैसे कि,
- But Chandrashekhar himself had quoted long passages from the Sahityadarpana and has referred to some of the emendations occuring in the Sahityadarpana, which clearly proves his posteriority to Vishvanatha.-D.K. Kanjilal, preface, p. 24
सप्तमाङ्क-विवरणं समाप्तम्।।
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इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णुपण्डित-तनूज- श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्तिकृतावभिज्ञानशकुन्तलटीकायां (ज्ञान)सन्दर्भदीपिकायां⁵ सप्तमाङ्क-विवरणं समाप्तम्।। श्रीहरये नमः।। श्रीरामय नमः।। शकाब्दाः 1728।। ॐ गङ्गायै नमः।।
इससे यह सूचित होता है कि मातृका 4117 के अनुसार समग्र टीका का नाम “ज्ञानसन्दर्भदीपिका” है और मातृका 4118 के अनुसार “सन्दर्भदीपिका” नाम है। यद्यपि इसके अलावा टीका के आरम्भ में तो इस टीका का नाम केवल “सन्दर्भदीपिका” इतना ही दिया है। चन्द्रशेखर ने शिशुपालवध पर जो टीका लिखी है उसे “सन्दर्भचिन्तामणि” नाम दिया है जिससे सिद्ध होता है कि इस टीका का सही नाम “सन्दर्भदीपिका” ही होगा। प्रथमांक की पूर्ति होने पर दोनों ही पाण्डुलिपियों में ऐसी पुष्पिका दी गयी है-इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णु-पण्डित-तनुजन्म-श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्ति-कृतावभिज्ञान-शकुन्तल-टीकायां प्रथमाङ्क-विवरणम्।। अन्यत्र अङ्कों की समाप्ति पर, संक्षेप में उसे एक अन्य नाम, “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण” से भी घोषित किया गया है तथा कुत्रचित् इतना भी नहीं लिखा है। केवल अमुक अंक समाप्त हुआ इतना ही बताया गया है।।
लिपिकारों के लेखन में कुछ विशेषतायें इस प्रकार दिख रही हैं:-
(क) दोनों पाण्डुलिपियाँ वंगीय लिपि में लिखी हुई हैं। लेकिन दोनों पाण्डुलिपियाँ लिखनेवाले व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं। तथा मातृका 4117 का लेखन-काल शकाब्दाः 1728 है, जो ईसा का 1806 वर्ष होगा। मातृका 4118 की पुष्पिका में लेखनकाल नहीं है।।
(ख) यहाँ कुछ संयुक्ताक्षरों की वर्तनी में प्राचीनता झलक रही है। तद्यथा-अवग्रह, ज्ञ, ङ्क, इत्यादि। इसी तरह से वकार एवं रेफ की वर्तनी में बिन्दी के चिह्न से स्पष्टता लायी जा सकती थी, जो नहीं है।
(ग) पाण्डुलिपि क्रमांक-4117 में प्रायः सर्वत्र “प्रियंवदा” के स्थान में “प्रियम्वुदा” ऐसा शब्द रखा गया है, जो लिपिकार के अज्ञान या अशक्ति का दुष्परिणाम हो सकता है।
7. चन्द्रशेखर द्वारा स्वीकृत बंगाली पाठ का स्वरूप
चन्द्रशेखर की सन्दर्भदीपिका-टीका का सब से पहले जो परिचय देना आवश्यक है वह यह कि उन्होंने अभिज्ञानशकुन्तल पर टीका लिखते समय अपने समक्ष नैरन्तर्येण शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका को रखा है। लेकिन शङ्कर के द्वारा स्वीकृत जो पाठ है उससे अपना साम्प्रदायिक बंगाली पाठ जहाँ जहाँ पृथक् है उसकी ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया ही है। उदाहरण के रूप में देखें तो-
- मातृका 4118 इत्यत्र तु केवलं “सन्दर्भदीपिकायाम्” इति लिखितं वर्तते।
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(क) प्रथमाङ्के में सरसिजमनुविद्धम्० (1-19) श्लोक के बाद “अपि च” से अवतारित, कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपम्० (1-20) ऐसा एक विशेष श्लोक चन्द्रशेखर ने माना है और उस पर व्याख्या की है। किन्तु यह श्लोक मैथिल पाठपरम्परा में नहीं होने से शङ्कर ने उस पर व्याख्या नहीं लिखी है। इस बात की जानकारी दिखाते हुए चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। अर्थात् यह श्लोक केवल बंगाल की पाठपरम्परा में ही प्रचलित है। वह दाक्षिणात्य (याने उत्कलीय-?) एवं तीरभुक्तीय (याने तिरहुत-बिहार) की परम्परा में कहीं पर भी नहीं मिलता है।।
(ख) प्रथमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-अम्मो, नवमालिकामुज्झित्वा वदनं मे मधुकरः अभिलषति। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, शङ्करस्तु सलिलसेकसम्भ्रान्तो मधुकरो वदनं मे अभिलषति पीडयतीति पाठान्तरमाह। अर्थात् चन्द्रशेखर मैथिल पाठ में कुछ प्रक्षिप्त अंश है उसकी जानकारी रखते हैं।
(ग) तृतीयाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-तद्यदि वाम् अनुमतं ततः तथा प्रयतेथाम् यथा तस्य राजर्षेरनुकम्पनीया भवामि। अन्यथा स्मरतं माम्। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-अन्यथा प्रसीदतं, सिञ्चतम् इदानीं मे उदकम्, मामुदकैः सिञ्चतमित्यर्थः इति शङ्करसम्मतः पाठोऽर्थश्च।। यहाँ “स्मरतम्” के स्थान पर “सिञ्चतम् उदकम्” जैसा पाठभेद मैथिल परम्परा में है।
(घ) तृतीयाङ्के में राजा की उक्ति है-सुन्दरि, किमन्यत्। इदमप्युपकृतिपक्षे सुरभि मुखं ते मया यदाघ्रातम्। ननु कमलस्य मधुकरः सन्तुष्यति गन्धमात्रेण।। (3-37) यहाँ पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-ननु निश्चये। न त्विति शङ्करः। तेनालिङ्गनमपि देहीति भावः इति व्याचष्टे दृष्टान्तः। यहाँ उपर्युक्त श्लोक में “ननु” के स्थान में मैथिल परम्परा में “न तु” इतना ही परिवर्तित किया हुआ जो पाठभेद है (और जिसके कारण पूरा वाक्यार्थ बदल जाता है), वह चन्द्रशेखर अच्छी तरह से जानते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है।
(ङ) उसी तरह से चतुर्थाङ्के में प्रियंवदा की उक्ति है-अहो, आभरणार्हं ते रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैः विप्रकार्यते। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, आभरणान्ते अस्य वा रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैर्विप्रक्रियते पीड्यते। विप्रलभ्यत इति शङ्करः पठति।।
(च) पञ्चमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-इदम् अवस्थान्तरं गते तादृशे अनुरागे किं वा स्मारितेन। अथवा, आत्मेदानीं मे शोधनीयः। भवतु। व्यवसिष्यामि। इस पर चन्द्रशेखर लिखते हैं कि, शङ्करस्तु शोचनीय इति पठित्वा, सदसि तादृशं रहस्यप्रकाशनात् त्रपया शोचनीया भविष्यसीति भावः इत्याह। भवतु, व्यवस्यामि रहस्यं वक्तुमिति शेषः। वदिष्यामीति शाङ्करः पाठः।
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इन उदाहरणों से यह निश्चित होता है कि चन्द्रशेखर ने बंगाली-लिपि में संचरित हुए (साम्प्रदायिक) पाठ का ही अनुसरण किया है। तथा वे, मैथिली पाठ से बंगाली पाठ कहाँ पर भिन्न पाठ परम्परावाला है, यह बहुत बारिकी के साथ दिखाते रहे हैं।
टीकाकार चन्द्रशेखर को बंगाल का परम्परागत (साम्प्रदायिक) पाठ अभिमत है। यह पाठ शङ्कर के द्वारा स्वीकृत मैथिली पाठ से कई स्थानों पर पृथक् ही है। उन्होंने इस मैथिल पाठपरम्परा को “शङ्करधृतः पाठ” के नाम से या “तीरभुक्तीय” (तिरहुत) के नाम से निर्दिष्ट किया है। अब यह भी ज्ञातव्य है कि चन्द्रशेखर ने अपने समय की कुछ और भी पाठपरम्पराओं का निर्देश किया है। जैसे कि-1. विदेशीय, 2. प्राचीनपुस्तक और 3. दाक्षिणात्य पाठपरम्परा। यहाँ विदेशीय पाठ शब्द से सम्भवतः काश्मीर या नेपाल की परम्परा का निर्देश हो सकता है। प्राचीनपुस्तक शब्द से तो केवल किसी प्राचीन काल की हस्तलिखित प्रति का ही उल्लेख करते हैं ऐसा मालूम होता है। लेकिन उन्होंने जो दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का एक स्थान पर उल्लेख किया है वह भ्रम में डालनेवाला है। सामान्य रूप से दाक्षिणात्य शब्द से कोई भी व्यक्ति उसे दक्षिण भारत की पाठपरम्परा मानने को तैयार हो जायेगा। लेकिन चन्द्रशेखर ने जिन श्लोकों को दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का श्लोक कहा है वह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी अभिज्ञानशकुन्तल में नहीं मिलता है। जैसे कि-
अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्॥
\hfill (6–16)
इस श्लोक पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते। अब प्रश्न होता है कि यह दाक्षिणात्य परम्परा कहाँ की है? क्योंकि यह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी टीकाकार, जैसे कि, काटयवेम, अभिराम, घनश्याम, श्रीनिवासाचार्य, नीलकण्ठ, चर्चा आदि के द्वारा किसी भी तरह से निर्दिष्ट नहीं है। अतः ऐसा सूचित होता है कि चन्द्रशेखर यहाँ “दाक्षिणात्य” शब्द से सम्भवतः उत्कलीय पाठ परम्परा का निर्देश कर रहे होंगे। उत्कल प्रदेश बंगाल से दक्षिण में कहा जा सकता है। और उत्कलदेशीय श्रीनवकिशोरकर शास्त्रीजी ने जो अभिज्ञानशाकुन्तल प्रकाशित किया है उसमें यह श्लोक है। इस दृष्टि से सोचने पर चन्द्रशेखर अपनी बंगाल की पाठ परम्परा को जानने के साथ साथ काश्मीर या नेपाल की, तीरभुक्तीय यानि बिहार की मैथिल एवं (बंगाल से दक्षिण में स्थित) उत्कल की पाठपरम्परा को भी जानते थे। चन्द्रशेखर ने चतुर्दिकू फैली पाठ परम्पराओं को जानने के बावजूद उनमें से अपनी बंगाल की पाठपरम्परा की अस्मिता बनाये रखने का जो उपक्रम रखा है उसीमें उसकी मूल्यवत्ता निहित है।
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यद्यपि यहाँ उल्लेखनीय है कि चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से 4 पाठान्तर काश्मीरी पाठ के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. कृतार्थेदानीम् गमिष्यसि। 2. नेदं विस्मरिष्यामि। 3. कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 4. कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
प्रस्तुत चर्चा के उपसंहार में इतना कहेंगे कि चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जिस पाठ को स्वीकार करके टीका लिखी है, वह बंगाल का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरुवल्लभ एवं कृष्णनाथ जैसे सम्पादकों ने अतीत में बंगाली पाठ का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाल का जो पाठ स्वीकारा है वह अधिक पुराना एवं प्रामाणिक है।
दूसरा ध्यातव्य बिन्दु यह भी है कि टीकाकार चन्द्रशेखर जिस बंगाली पाठ को पुरस्कृत कर रहे है वह डॉ० रिचार्ड पिशेल (1876 ई.सन्) द्वारा सम्पादित जो “समीक्षित पाठ” है, उससे कुत्रचित् भिन्न और शायद पुराना पाठ है। इस सन्दर्भ में, विद्वानों के समक्ष कुछ ठोस प्रमाण रखना आवश्यक है:-(क) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने बंगालीलिपि में लिखित पाण्डुलिपियों में प्रत्येक अङ्क की समाप्ति पर उन अङ्कों के जो विभिन्न नाम दिये हैं, जैसे-1. इत्याखेटको नाम प्रथमोऽङ्कः। 2. इत्याख्यानगुप्तिर्नाम द्वितीयोऽङ्कः। 3. इति शृङ्गारभोगो नाम तृतीयोऽङ्कः। 4. इति शकुन्तलाप्रस्थानं नाम चतुर्थोऽङ्कः। 5. इति शकुन्तला-प्रत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽङ्कः। इत्यादि उसे स्वीकृत रखा है एवं उल्लिखित किया है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने तो किसी भी अङ्क के नाम का निर्देश ही नहीं किया है। सम्भव है कि इस नाटक के अङ्कों का नामाभिधान करने का प्रघात चन्द्रशेखर के काल के पश्चात् शुरू हुआ हो। (ख) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने अपने समीक्षित पाठ में (तृतीयाङ्क के एक सन्दर्भ में) शकुन्तला की उक्ति इस तरह दी है: अज्जउत्त, एसा खु मम वुत्तन्तोवलम्भणणिमित्तं अज्जा गोदमी आअदा। ता विडवन्तरिदो होहि। (आर्यपुत्र, एषा खलु मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तम् आर्या गौतमी आगता। ततो विटपान्तरितो भव।) यहाँ पर “समीक्षित पाठ” में, कण्व मुनि के आश्रम में रहनेवाली गौतमी कौन थी? उसकी कोई पहचान नहीं दी गयी है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में उपर्युक्त प्राकृत उक्ति के संस्कृतच्छायानुवाद में लिखा है कि-आर्यपुत्र, एषा खलु तातकण्वस्य धर्म्मभगिनी कनीयसीवार्या गौतमी मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तमागता। तद् विटपान्तरितो भव।। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने अभिज्ञानशकुन्तल की जो पाठ परम्परा है उसमें गौतमी को कण्व मुनि
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की छोटी धर्मभगिनी बताया गया है। (ग) रिचार्ड पिशेल की समीक्षितावृत्ति में कुल मिला कर 222 श्लोकोंवाला पाठ ग्राह्य रखा गया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने 225 श्लोकों पर टीका लिखी है। इसका निष्कर्ष यही है कि चन्द्रशेखर द्वारा पुरस्कृत बंगाली पाठ और “बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ” के नाम से रिचार्ड पिशेल के द्वारा सम्पादित जो पाठ है उन दोनों में जो अन्तर है वह भी अतीव ध्यानास्पद है।
यद्यपि डॉ० रिचार्ड पिशेल ने ऐसा प्रकट शब्दों में कहा है कि उनका समीक्षित पाठ चन्द्रशेखर की टीका पर ही सम्पूर्णतया आधारित है।
Candraśekhara's text is the basis of the present edition- In the Appendix I have added his version of the Prakrit passages, and his various readings as far as they could be ascertained from his commentary.
(Pischel's Preface to the First Edititon p- 10);
Kalidasa's Śakuntala, Ed- Richard Pischel,
Harward University Press, Second ed. 1922
लेकिन अब जब चन्द्रशेखर की टीका का प्रथम बार प्रकाशन हो रहा है तब मालूम होता है कि रिचार्ड पिशेल का पाठ चन्द्रशेखर की टीका में स्वीकृत पाठ के साथ सम्पूर्णतया मिलता जुलता नहीं है। वह तो बहुशः बंगाली पाण्डुलिपिओं पर आश्रित है। अर्थात् उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के समय से अधिक पुराने समय की यह टीका होते हुए भी, (और उसमें बंगाल का साम्प्रदायिक पाठ प्रतिबिम्बित हो रहा है फिर भी) प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद देने के लिए भी उन्होंने सर्वत्र चन्द्रशेखर की टीका का अनुगमन नहीं किया है। एवमेव, संस्कृत उक्तियों का पाठ भी चन्द्रशेखर के द्वारा जो स्वीकृत है वह भी सूक्ष्मेक्षिका से ध्यान में नहीं लिया गया है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण देखने से यह बात और भी स्पष्ट होगी।
(क) तृतीयाङ्क में दोनों सहेलियों की उक्ति है:- अइ अत्तगुणावमाणिणि, को णाम संतावणिव्वाव-इत्तिअं सारदीअं जोण्हं आदवत्तेण वारइस्यदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह से किया गया है: अयि आत्मगुणावमानिनि, को नाम संतापनिर्वापयित्रीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। (3-17 के नीचे), लेकिन चन्द्रशेखर ने उसका अनुवाद इन शब्दों से किया है: आत्मगुणावमानिनि, को नाम सन्तापनिर्वाणकारिणीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। यहाँ निर्वापयित्रीम् के स्थान में निर्वाणकारिणीम् ऐसा अनुवाद है।
(ख) चतुर्थाङ्क में शकुन्तला के सुशोभन के लिए वनस्पति ने जो आभरण, लाक्षारसादि दिये हैं उसको देख कर प्रियंवदा बोलती है कि-कोडरसंभवा वि महुअरी पोक्खरमहुं जेव अहिलसदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद डॉ० रिचार्ड पिशेल ने “कोटरसम्भवापि
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मधुकरी पुष्करमधु एव अभिलषति।" ऐसा दिया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद दिया है उसमें "पुष्करमधु" के स्थान पर "पुष्परसं मधु" ऐसा पाठ है। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने जो प्राकृत उक्ति होगी वह डॉ० रिचार्ड द्वारा स्वीकृत पाठ से भिन्न होनी चाहिए।
(ग) षष्ठाङ्क के आरम्भ में, धीवरक की उक्ति है:-सहये किल ये वि णिन्दिदे ण हु शे कम्म विवव्यणीअके। पशुमालिं कलेदिं दालुणं अणुकम्पामिदुले वि शोणिके।।(6-1), इसका डॉ० रिचार्ड पिशेल ने संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह दिया हैः सहजं किल यद्यपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति दारुणमनुकम्पामृदुलोपि सौनिकः।। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद किया है वह चतुर्थ चरण में बहुशः भिन्न है। जैसे कि-सहजं किल यदपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति कारणात् षट्कर्मा विदुरो श्रोत्रियः।। यहाँ रिचार्ड पिशेल ने बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ की ओर ही ध्यान दिया है, और टीकाकार ने किस पाठ का आदर किया है वह नहीं देखा है। वस्तुतः पाठनिर्धारण के लिए पाण्डुलिपिओं की संख्या को निर्णायक न मान कर, टीकाग्रन्थों में संचरित हुए पुराने जमाने के पाठ का ही समादर करना चाहिए। क्योंकि प्रथम सोपान पर पाठसम्पादक का लक्ष्य तो प्राचीन से प्राचीनतर पाठ को उजागर करना ही हो सकता है।। लगता है कि रिचार्ड पिशेल ने यह नहीं सोचा है कि सौनिक (पशुघातक) को अनुकम्पामृदुल कैसे कहा जा सकता है? अर्थात् किसी अज्ञात ब्राह्मणपक्षपाती व्यक्ति ने ही श्रोत्रिय शब्द को परिवर्तित करके यह सौनिक वाला पाठ प्रस्तुत किया होगा। मतलब की कवि कालिदास के हाथ से तो श्रोत्रिय को ही अनुकम्पामृदु (अथवा षट्कर्मा विदुरः) कहा गया होगा।। यहाँ विशेष रूप से एक ही बात ध्यानार्ह है कि रिचार्ड पिशेल ने, (और इस सन्दर्भ में डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने भी) टीकाकार चन्द्रशेखर के द्वारा दिये गये श्रोत्रिय जैसे प्राचीनतर पाठ की ओर पूर्णतया ध्यान नहीं दिया है।
(घ) षष्ठाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला का चित्र मँगवाता है और उसको देखते हुए एक श्लोक का उच्चारण करता है:-
अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्।।
\hfill 6-16
यद्यपि टीकाकार चन्द्रशेखर ने उस श्लोक की टीका में लिखा है कि "पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते"। (हमारे अनुमान से यह दाक्षिणात्य पाठ
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बंगाल के दक्षिण में आया हुआ उत्कल प्रदेश होगा, क्योंकि काटयवेमादि दाक्षिणात्यादि टीकाकारों ने इस श्लोक को उल्लिखित ही नहीं किया है।) इस लिए डॉ० रिचार्ड पिशेल ने उसको अपने समीक्षित पाठ में स्थान नहीं दिया है। किन्तु रिचार्ड पिशेल ने यहाँ विदूषक की जो उक्ति को मान्यता दी है वह ध्यातव्य है:-भो भावमधुरा रेखा। स्खलति इव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुपवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।। यहाँ विदूषक की दृष्टि चित्रित शकुन्तला की देहयष्टि के निम्न एवं उन्नतप्रदेश पर स्खलन कर रही है-इस प्रकार की अभिव्यक्ति का सम्बन्ध तो स्पष्ट रूप से उपर्युक्त श्लोक के (वर्ण्य विषय के) साथ ही है। अतः रिचार्ड पिशेल को यदि विदूषक की यह उक्ति मान्य है तो फिर उपर्युक्त श्लोक को भी रखना चाहिए था। दूसरी तरह से यह बात कही जाय तो, यह दाक्षिणात्य अर्थात् उत्कलीय परम्परा का श्लोक समीक्षित पाठ के रूप में ग्राह्य नहीं है। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर के अभिप्राय से वह अनतिमधुर श्लोक है। तो फिर इस श्लोक के साथ सम्बद्ध विदूषक की जो उक्ति (भी अनतिमधुर) थी उसको भी निकाल देना चाहिए था। समीक्षित पाठ में से विदूषक की उक्ति को हटाने की आवश्यकता का कारण न केवल उस उक्ति का अनौचित्य ही है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी विदूषक की इस उक्ति का संस्कृत च्छायानुवाद नहीं दिया है। मतलब कि चन्द्रशेखर के सामने विद्यमान जो भी बंगाली पाठपरम्परा होगी उसमें विदूषक की उक्ति होगी ही नहीं, जिसके कारण चन्द्रशेखर ने उसका संस्कृतच्छायानुवाद नहीं दिया है। यह एक ऐसा ठोस कारण है जिसकी वजह से विदूषक की पूर्वोक्त उक्ति प्रक्षिप्त होने का इशारा मिल जाता है।
(ङ) तृतीयाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी द्रष्टव्य है: दुष्यन्त कहता है कि सुन्दरि, जो मधुकर होता है वह कमल की गन्ध मात्र से सन्तुष्ट रहता है (3-37)। तब शकुन्तला प्रश्न करती है कि-असंतोषे पुनः किं करोति। जिसको सुनते ही राजा “इदम् इदम्”, बोलता हुआ शकुन्तला के प्रति प्रेमचेष्टा शुरू करता है। यहाँ पर एक रंगसूचना है:- “इति व्यवसितो वक्त्र ढौकते”। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने इसी स्वरूप में उक्त रंगसूचना को छपवाया है। लेकिन इस रंगसूचना पर चन्द्रशेखर ने जो टीका लिखी है उसको यदि हम देखें तो लगता है कि रिचार्ड पिशेलजी चन्द्रशेखर की बात को समझ ही नहीं पाये हैं। चन्द्रशेखर ने लिखा है कि शकुन्तला वक्त्रं ढौकते गृह्णाति। ......। शकुन्तला कत्री वक्त्रं ढौकते, पिधत्त इत्यर्थः। न तु चुम्बतीत्यर्थः।। अर्थात् इस रंगसूचना में दुष्यन्त को क्या करना है और शकुन्तला को क्या करना है उसकी भिन्न भिन्न दो सूचनायें रखी गयी हैं। और इस लिए रिचार्ड पिशेल को इस रंगसूचना में इति व्यवसितः के बाद एक अल्पविराम का चिह्न रखना अनिवार्य था, (जो उन्होंने नहीं
16 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
रखा है)। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर ने साफ लिखा है कि शकुन्तला के मुख पर दुष्यन्त चुम्बन करता है ऐसा अर्थ नहीं है। अन्यथा आगे चल कर दुष्यन्त जो बोलता है कि "(अस्या मुखं) कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तत्" इस पङ्क्ति से विरोध आयेगा। अतः यहाँ तो ढौकते का अर्थ पिधत्ते, याने शकुन्तला (स्वयं) अपना मुख हाथों से ढकती है ऐसा ही करना चाहिए। और रंगसूचना में पाठसम्पादक को बीच में अल्पविराम का चिह्न जोड़ना चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर बंगाली पाठ का समीक्षित पाठसम्पादन करने में टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका का पूरा अनुगमन नहीं किया गया है यह बात सिद्ध होती है।।
सारभूत बात यही है कि किसी भी कृति के समीक्षित पाठसम्पादन में मूल कृति की पाण्डुलिपियों के साथ साथ, उन पर लिखी गयी टीकाओं का विनियोग भी प्राचीनतर पाठ को उजागर करने के लिये असाधारण महत्त्व रखता है। चन्द्रशेखर की टीका जो अद्यावधि अप्रकाशित रही थी, उसका बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर स्वरूप पुनः संप्राप्त करने के लिए एक सहायक प्रमाण के रूप में महत्त्व अनुपेक्ष्य था।
8. चन्द्रशेखर की टीका का विश्लेषण
चन्द्रशेखर ने अपनी सन्दर्भदीपिका टीका में जिन ग्रन्थों का नाम-निर्देश किया है वह इस प्रकार है:- 1. नाट्यलोचन के रचयिता त्रिलोचन मिश्र, 2. वामदेव, 3. चतुर्भुज मिश्र, 4. भर्तृहरि मिश्र, 5. अमर, 6. शंकर, 7. मेदिनी, 8. भरत, 9. भविष्यपुराण, 10. शाश्वत, 11. अद्भुतसागर, 12. विश्व, 13. यज्ञ नारायण दीक्षित (15 शती के अन्त में) प्रणीत साहित्यरत्नाकर, 14. अनन्तार्णव, 15. दर्पणकार, (विश्वनाथ द्वारा रचित साहित्यदर्पण), 16. त्रिकाण्डशेष, 17. हारावली, 18. अमरटीका, और 19. प्राकृतप्रकाश इत्यादि। इन सब के निर्देशों की गिनती की जाय तो 209 से अधिक है। जब कोई टीकाकार अपनी अभीष्ट कृति पर टीका लिखता है तब वह शब्दार्थ से लेकर वाक्यार्थ एवं काव्य-सौन्दर्य तक की सीमाओं को विशद करने की कोशिश करता है। ऐसे कार्य में यदि विविध ग्रन्थों के सन्दर्भ की दीपिका भी प्रस्तुत की जाय तो वैसी "सन्दर्भदीपिका" टीका अधिक श्रद्धेय सिद्ध होती है। चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर विविध कोषग्रन्थ के उद्धरण, भरतमुनि के विधिविधान, प्राकृतसूत्रों का प्रमाण, अलङ्कारों की पहचान प्रस्तुत करके एक अच्छे टीकाकार की भूमिका निभायी है।
चन्द्रशेखर ने उपर्युक्त जिन जिन ग्रन्थकारों का निर्देश किया है उनमें से एक, अपने पुरोगामी टीकाकार शङ्कर का अनेक स्थानों पर जो उल्लेख किया है वह ध्यानार्ह है। शंकर, जिसने अभिज्ञानशकुन्तल की मैथिली वाचना पर "रसचन्द्रिका" नामक टीका लिखी है, उसका चन्द्रशेखर ने करीब 85 बार नामशः उल्लेख किया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने शङ्कर की टीका से कुत्रचित् प्रेरणा प्राप्त करते हुए भी, अपनी अस्मिता को बनाये रखा है। जैसा
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पहले बताया गया है चन्द्रशेखर ने शङ्कर के मैथिल पाठ से अपना बंगाली पाठ भिन्न है इस बात को केन्द्र में रखा है। अनेक स्थानों पर उन्होंने शंकर के द्वारा स्वीकृत पाठभेद को उल्लिखित किया है या शङ्कर के द्वारा किये हुए शब्दार्थ से मतभेद भी प्रदर्शित किया है। एवमेव, अनेक स्थान पर उसके दिये हुए शब्दार्थ की कड़ी आलोचना भी की है। उदाहरण के लिए—परिग्रहबहुत्वेपि द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य नः। समुद्ररसना चोर्वी सखी च युवयोरियम्।। (3-23) यहाँ पर शङ्कर ने समुद्र-शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, “समुद्र एव रसना मेखला यस्याः सा समुद्रावच्छिन्ना उर्वी मही युवयोरियं सखी शकुन्तला। तत्पक्षे समुद्ररसना सच्छिद्रमेखला। यद्वा समुद्ररसना साङ्गुरीयकमेखला। यद्वा मुदं हर्षं, राति ददाति, मुद्रं हर्षदं यद् रसनं भाषणं, तेन सह वर्तते, समुद्ररसना प्रियभाषिणीत्यर्थः।।” (मिथिलासंस्करण, 1957, पृ. 218) यहाँ समुद्ररसना का अर्थ “प्रियभाषिणी (शकुन्तला)” करने के लिए निर्वचन का जिस तरह से आश्रयण किया गया है, वह पाण्डित्य-प्रदर्शन का उत्तम निदर्श है। और राघवभट्ट भी उसका अनुसरण करने को लालायित हो गये हैं, फिर भी चन्द्रशेखर की दृष्टि में तो वह अग्राह्य ही है। उन्होंने अपनी टीका में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया है कि कुव्याख्या तूपेक्षिता।
इसमें, इन सब के साथ चन्द्रशेखर का मुख्य योगदान है प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद। यहाँ एक स्पष्टता सविशेष करनी है कि शङ्कर ने नाटक की प्राकृत उक्तियों की व्याख्या की है, किन्तु चन्द्रशेखर ने ऐसी उक्तियों का सीधा संस्कृतच्छायानुवाद दिया है। इसी लिए इस नाटक की प्राकृत उक्तियों के पाठनर्धारण में यह टीका अधिक उपकारक सिद्ध होती है। द्वितीयाङ्क के आरम्भ में विदूषक की उक्ति है। यहाँ चन्द्रशेखर के सामने इस उक्ति के अभिनयन की दो विधायें होगी। अतः उनकी टीका में दो पाठान्तरों के साथ विवरण दिया जाता है। जैसे कि, हीमाणेहे-शब्दः प्राकृते खेदे। तदाह भरतः—हीमाणहे भये खेदे इति।। ही ही भोः इति च पाठः। ही ही भोः शब्दो विस्मये। यदाह भरतः—ही ही भो विस्मयार्थे तु प्रयुञ्जीत विदूषक इति।। विदूषक की उक्ति का आरम्भ दो तरह से होता है—यह बात चन्द्रशेखर ठीक तरह से जानते हैं, जिसके लिए भरत मुनि का ही वचन प्रमाण के रूप में विद्यमान है यह भी वे जानते हैं। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने चन्द्रशेखर की प्राकृतभाषा विषयक ऐसी जानकारी को देख कर ही, उसकी टीका को अधिक प्रमाणभूत माना था।
शङ्कर काव्यार्थ-ग्रहण में अलंकार का निरतिशय महत्त्व स्वीकारते हैं, और अनेक जगहों पर विभिन्न अलङ्कारों का अभिज्ञान भी करवाते हैं। चन्द्रशेखर ने जो अनेक स्थानों पर शङ्कर का मत उल्लिखित किया है, इसका एक फायदा यह हुआ है कि शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका का पाठ षष्ठांक के मध्य भाग 6/12 से लेकर सप्तमांक के आरम्भ तक कुछ भाग खण्डित हुआ है। तो लिपिकारों ने इतने खण्डित अंश के स्थान में चन्द्रशेखर की टीका का भाग उठाकर उनकी थीगड़ी लगा दी है! ऐसा करने का मुख्य कारण एक ही था
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कि चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में आरम्भ से लेकर अन्त तक बार बार शंकर का मत उद्धृत किया है। अतः जहाँ पर भी शंकर की टीका खण्डित हुई है उसका कुछ कुछ अन्दाजा चन्द्रशेखर की टीका से मिल सकता था। यह बात रिचार्ड पिशेल (1876) ने लिखी थी कि शंकर की टीका का खण्डितांश चन्द्रशेखर की टीका से पूर्ण किया गया है, लेकिन मैथिली पाठ के सम्पादक श्री रमानाथ झा (1957) को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस लिए उन्होंने ऐसा लिखा है कि किसी लिपिकार ने शङ्कर की विस्तृत टीका का इतने भाग में संक्षेप कर दिया है।⁶ सम्भव है कि रमानाथ झा ने रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति ही नहीं देखी हो।
इनके अलावा चन्द्रशेखर ने नाट्यशास्त्रीय परिभाषाओं को विशद करने के लिए बहुत स्थानों पर भरत मुनि का नामोल्लेखपूर्वक उद्धरण दिये हैं। तथा नाट्यलोचन, कविकल्पलता, साहित्यदर्पणादि का भी विनियोग किया है। चन्द्रशेखर “अन्ये, केचिद्, गुरवः” जैसे शब्दों से किन का निर्देश करना चाहते हैं वह हम नहीं जान सकते हैं। उन्होंने विश्वनाथ के द्वारा अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क के अन्तिम श्लोक में “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तत्” के स्थान पर “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तु” जैसा पाठभेद स्वीकारा गया है, एवं पञ्चम अङ्क के पञ्चम श्लोक में जो नवीन पाठान्तर की उद्भावना की है उसका उल्लेख भी किया है। वे लिखते हैं कि—दर्पणकारेण तु नवीकृतपाठान्तरेण पद्यम् इदमुदाहृतम्। (यहाँ पर वे विश्वनाथ को अपने पिता के रूप में उल्लिखित नहीं करते हैं। टीका की पुष्पिका में तो उन्होंने अपने आप को विष्णु पण्डित का पुत्र कहा है।) एवमेव, गाहन्तां महिषाः (1- 10) श्लोक पर उन्होंने काव्यदोष के सन्दर्भ में जो चर्चा प्रस्तुत की है उसमें “प्राज्ञ” शब्द से महिमभट्ट के मत का निर्देश भी किया है।
अभिज्ञानशकुन्तल एक नाटक होने से उसमें दो चरित्रों के बीच में जो बातचीत होती है, जो संवाद होते हैं, उसमें नाना अव्ययों का विनिवेश बहुशः होता है। अतः इन अव्ययों का सन्दर्भगत अर्थ स्पष्ट करने की जिम्मेवारी टीकाकार की होती है। इस कार्य को शङ्कर ने तो किया ही था, लेकिन चन्द्रशेखर ने उसमें भी कुत्रचित् कुछ विशेष भी जोड़ा है, कुछ अलग भी अर्थ दिखलाये हैं। यह भी एक महनीय सेवा कही जा सकती है। एक उदाहरण देखना आवश्यक हैः प्रथमाङ्क में, न खलु न खलु० वाले (1-10) श्लोक में “क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं, क्व च निशितनिपाताः सारपुङ्खा शरास्ते।” इस पङ्क्ति में दो बार क्व निपात का विनिवेश किया गया है। यहाँ पर शङ्कर ने क्व-द्वय के प्रयोग का
- It is much more reasonable to belive that this protion is an abridgement from the original commentary by a scribe, who had, perhaps, no time to make a complete copy of the manuscript which he was transcribing. See: The Abhijñanaśakuntalam, with the commentaries of Śankara & Narahari, Ed. Ramanath Jha, Darbhanga, 1957, p. 27.
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समाधान देते हुए कहा है कि विस्मय और विषाद प्रदर्शित करने के लिए क्व की पुनरुक्ति दोषजनक नहीं मानी जाती है। लेकिन चन्द्रशेखर के मत में ऐसा व्याख्यान तो कुव्याख्यान है। अतः उसका स्वारस्य स्पष्ट करने के लिए चन्द्रशेखर ने अपने किसी गुरुजी का मत लिखा है। उसमें कहा है कि धनुर्धारी व्यक्ति के लिए दो पौरुष गिने जाते हैं। एक, दुर्भेद्य वस्तु का भेदन करना और दूसरा, दुर्मर व्यक्ति को मारना। लेकिन प्रकृत में तो पुष्प में ऐसा कोई दुर्भेद्यत्व नहीं है और हरिण में दुर्मरत्व नहीं है। इस तरह अत्यन्त असम्भवित बात के लिए क्व-द्वय का प्रयोग होता है। इस तरह से चन्द्रशेखर ने अन्यत्र भी अमर, त्रिकाण्डशेष, अमरटीका, विश्व, मेदिनी, शाश्वत, हारावली, कोष इत्यादि का विनियोग किया है तथा आवश्यकता होने पर अमुक शब्द का देशी भाषा में क्या अर्थ होता है वह भी लिखा है। (इन सभी सन्दर्भग्रन्थों की सूची को परिशिष्ट-2 में रखा गया है।)
चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से कुछ पाठान्तर काश्मीरी वाचना के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. प्रथमाङ्क में, नेदं विस्मरिष्यामि। 2.चतुर्थाङ्क में, कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 3. तृतीयाङ्क के अन्त भाग में, कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जो पाठ स्वीकार कर टीका लिखी है, वह बंगाली वाचना का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरूवल्लभ एवं कृष्णनाथ ने भूतकाल में बंगाली वाचना का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाली वाचना का जो पाठ स्वीकारा है वही अधिक प्रामाणिक लगता है। चन्द्रशेखर ने प्राचीनतम पाण्डुलिपियों में संचरित बंगाल के साम्प्रदायिक पाठ को ही स्वीकारा है। कुछ श्लोकों का पाठ प्राचीन काल से पाण्डुलिपियों में संचरित होते हुए भी उसको प्रक्षिप्त भी बताया है। उदाहरण के रूप में-कठिनमपि० (1-20), तुम्हे .. महिलाः। (5-24), अ(त)स्याः तुङ्गमिव० (6-16) इत्यादि। इसके आधार पर कह सकते हैं कि बंगाली वाचना का जो पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है, वह अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धेय है, और उसमें प्रक्षिप्तांश कम हैं।
बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण
0-0 महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का मूल पाठ कैसा होगा? यह प्रश्न निरतिशय विवादास्पद होते हुए भी विद्वानों के लिये अनुपेक्ष्य है। क्योंकि, किसी भी एक-कर्तृक काव्य के पाठ की मौलिकता जब तक सिद्ध नहीं होती है तब तक उसके काव्यशास्त्रीय गुण-दोष की चर्चा करना, या उसमें से किसी भी तरह का काव्यार्थ निकालना
20 | चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
विवादास्पद एवं कदाचित् अन्यथासिद्ध हो सकता है। अतः काव्य की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा करने से पहले उसके पाठ की आलोचना करना अनिवार्य है।
0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का पाठ मुख्य रूप से दो-लघु और बृहत्-पाठपरम्पराओं में प्रचलित हुआ है। किन्तु, इस नाटक की रचना एक ही कवि ने की है, अर्थात् यह नाटक एककर्तृक है तो उसका मूल पाठ भी एक ही स्वरूप का होना अपेक्षित है। दो तरह का अभिज्ञानश(शा)कुन्तल तो कालिदास ने नहीं लिखा होगा। अतः हमें यह ढूँढना ही चाहिये कि इस नाटक की दो तरह की पाठपरम्पराओं में से किसका पाठ मौलिक होने की सम्भावना ज्यादा है। तार्किक दृष्टि से सोचा जाय तो यहाँ दो तरह की सम्भावनायें दिखायी देती हैं। जैसे कि, 1. कालिदास-प्रणीत मूल पाठ लघु-आकार का, अर्थात् लघुपाठ होगा, और परवर्ती काल में उसी मूल पाठ में नाट्यप्रयोग के दौरान कुछ नये अंश जोड़े गये होंगे। इस तरह शाकुन्तल का बृहत् पाठ कालान्तर में तैयार हुआ होगा। अथवा 2. महाकवि के द्वारा नाटक का बृहत्पाठ ही पहले से लिखा गया होगा और कालान्तर में उसमें से कुछ अंश काट-छाट कर (रंगभूमि की आवश्यकतानुसार और सीमित समय में जिसकी प्रस्तुति हो सके ऐसा) संक्षिप्त (लघु) पाठ तैयार किया गया होगा। अतः यह कहना मुश्किल है कि महाकवि कालिदास ने ही अपने हाथ से लिखा हो ऐसा (मौलिक) पाठ इन दोनों में से कौन सी पाठपरम्परा में सुरक्षित रहा होगा? इस सन्दर्भ में, नाटक की काव्यशास्त्रीय दृष्टि से आलोचना करके विद्वानों ने दो पक्ष बना लिये हैं-देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित लघुपाठ ही अधिक व्यञ्जनापूर्ण है, इसलिए उसीको श्रद्धेय पाठ परम्परा मानना चाहिए। तथा बंगाली और मैथिली पाठ में स्थूल शृङ्गारिक दृश्यावली ज्यादा है,⁷ अतः उसमें मौलिक पाठ का होना संशयग्रस्त है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक विद्वान् ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ तो कालान्तर में बनाया गया है।
बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुआ पाठ ही मौलिक है ऐसा कहनेवालों में सर्वप्रथम कोलकाता के प्रॉफेसर डॉ० श्री दिलीपकुमार काञ्जीलाल (Kanjilal, A reconstruction of the Abhijñānaśakuntalam, 1980) का प्रयास अतीव ध्यानास्पद है। उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों से यह स्थापित किया है कि बंगालीलिपि में संचरित हुआ पाठ ही सर्वाधिक श्रद्धेय है, एवं प्राचीनतम भी है। सम्माननीय विद्वान् डॉ० श्री काञ्जीलाल ने अपने मत के समर्थन में जो प्रमाण दिये हैं वे श्रीहर्ष की नाटिकायें एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के उद्धरणादि रूप बाह्य प्रमाण हैं। अब यहाँ बंगाली पाठ की मौलिकता
- बङ्गीय पाठ में प्रथम मिलन में ही शकुन्तला अठखेलियाँ करती दिखायी गयी है, जो कालिदास की प्रवृत्ति से विरुद्ध है।। कालिदासः अपनी बात (भारतीय दृष्टि) डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्थान, वाराणसी, 2004, पृ० 54
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के सविशेष समर्थक बन सके ऐसे कुछ आन्तरिक प्रमाण, जो सर्वथा कृतिनिष्ठ ही हैं, उसकी ओर सहृदयों का ध्यान आकृष्ट किया जाता है$^8$।
1-1 प्रो. श्री एस. के. बेलवलकर जी ने सब से पहले इस बात की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुए अभिज्ञानशाकुन्तल के (तृतीयाङ्क के) पाठ में समयसम्बन्धी जो सूचना दी गयी है, उनमें अन्तर्निहित एक विसंगति खटकनेवाली है। जैसे कि-तृतीयाङ्क का आरम्भ मध्याह्न में होता है। नायक दुष्यन्त उग्र-आतपवाले मध्याह्न में शकुन्तला को ढूँढ़ने के लिए मालिनी नदी के आसपास लतावलयों में जाता है।$^9$ उसके बाद पुष्पशय्या पर लेटी हुई शकुन्तला रंगमंच पर आती है, उसके साथ दो सहेलियाँ भी है। यहाँ क्रमशः शकुन्तला की शरीरबाधा का कारण उन्मीलित होता है, शकुन्तला मदनलेख लिखती है और राजा प्रकट होकर शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में बताता है। इसको सुन कर आश्वस्त हुई दोनों सहेलियाँ मृगबाल को उसकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बनाकर (नायक-नायिका को एकान्त देने के लिए) वहाँ से चली जाती हैं। अब एकाकिनी शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाने को तत्पर होती है तो राजा उसे कहते हैं कि-"सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदल-कल्पितस्तनावरणम् आतपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः। (3-19) (इति बलादेनां निवर्तयति।)" यहाँ दुष्यन्त ने साफ बताया है कि अभी दिवस परिणत नहीं हुआ है। लतामण्डप से बाहर कड़ी धूप में तुम कैसे जाओगी? किन्तु, देवनागरी वाचना के पाठ में दुष्यन्त के इस वाक्य से सूचित होता है कि यह मध्याह्न का समय चल रहा है। उसके बाद नायक-नायिका के बीच केवल पाँच-छह संवाद ही होते हैं और तुरन्त नेपथ्य से कहा जाता है कि-चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। हे चक्रवाकी, अपने प्रियसहचर से बिदा ले लो, रात्रि का आगमन हो गया है।। इस तरह से देवनागरी पाठ में, मध्याह्न में शुरू हुई एकान्त मिलन की घटना केवल पाँच-छह संवादों में समेट ली जाती है और तुरन्त रात्रि का आगमन होने की सूचना दी जाती है। सुज्ञ प्रेक्षक देख सकेगा कि मध्याह्न एवं रात्रि के बीच में कितना लम्बा अन्तराल पड़ा है और इस समयावधि में पाँच-छह संवाद से कहीं अधिक बातचीत एवं घटना घटित होना अपेक्षित है। लेकिन देवनागरी पाठ में ऐसा कुछ विस्तार है ही नहीं। अतः सिद्ध हो जाता है कि देवनागरी पाठ में अनेक संवादों की भारी कटौती की गयी है।
- डॉ० एस.के. बेलवलकरजी, पूना ने "निसर्ग-कन्या शकुन्तला" (कालिदास-ग्रन्थावली, अनु. सीताराम चतुर्वेदी, अलीगढ़, 1963) शीर्षक वाले आलेख में जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वे आन्तरिक सम्भावना के बलवत्तर उदाहरण हैं।
- क्व नु खलु संस्थिते कर्मणि सदस्यै रनुज्ञातः श्रमक्लान्तमात्मानं विनोदयामि। (निःश्वस्य) किं न खलु मे प्रियादर्शनादृते शरणमन्यत्। यावदेना मन्त्रामयिष्यामि। (सूर्यम् अवलोक्य) इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति। तत्रैव गच्छामि। -अभिज्ञानशाकुन्तलम्, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, 2006, पृ. 87
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इसके प्रतिपक्ष में, बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में मध्याह्न, सायन्सन्ध्या¹⁰ और फिर रात्रि का सन्दर्भ स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है। इससे भी सूचित होता है कि बंगाली पाठ में मौलिकता की सुरक्षा हुई होगी। जिसके कारण देवनागरी अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयाङ्क में जहाँ 24 श्लोक हैं, वहाँ बंगाली अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है। सारतः कहा जाय तो तृतीयाङ्क में संक्षेप या प्रक्षेप का निर्णय समय-संगति को ध्यान में लेकर करना चाहिए, वही एक अकाट्य दृढ़ आन्तरिक प्रमाण है।
2-0 दूसरे प्रमाण के रूप में कवि की नाट्य-शैली को परखना चाहिए। जो नाट्य-शैली समग्र कृति में साद्यन्त व्याप्त है ऐसा दिखता है तो वही एक सबल आन्तरिक प्रमाण है। पाठालोचना में ऐसे ही प्रमाण को पुरस्कृत करते हुए समीक्षित पाठ की उच्चस्तरीय समीक्षा की जाती है। अभिज्ञानशकुन्तल नाटक के वस्तुग्रथन में "एक दृश्य (रूप) के सामने उसी प्रकार का एक दूसरा प्रतिदृश्य (प्रतिरूप)" खड़ा करने की नाट्य-शैली दिखायी दे रही है। जैसे कि, प्रथम अङ्क में शिकारी दुष्यन्त का प्रवेश होता है और "न हन्तव्यो, न हन्तव्यः" ऐसे शब्द सुनायी पड़ते हैं। तो सप्तम अङ्क में जब सिंहशावक को सतानेवाला सर्वदमन भरत का दृश्य शुरू होता है तो वहाँ पर "मा खलु, मा खलु चापलं कुरु" ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। उसी तरह से द्वितीयाङ्क और षष्ठांक की तुलना भी विचारणीय है। वहाँ पर विदूषक राजा के मृगया-व्यसन से क्षुधातुर, तृषातुर और श्रमातुर स्थिति में दयाजनक पीड़ा का अनुभव करता है। लेकिन उसी अङ्क के अन्त में वह राजा को आश्रम में रहने की अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होता है और युवराज होकर रंगभूमि से बिदा होता है। इसी दृश्य के सामने षष्ठांक के प्रवेशक में, धीवर नगररक्षकों के हाथ से मारा-पीटा जा रहा है। निर्दोष मछेरा भी दयाजनक पीड़ा का अकारण अनुभव करता है। लेकिन वह भी राजा के लिए दुःषन्त-नामधेयांकित अंगूठी देता है, जो राजा को शकुन्तला की याद दिलाने में सहायक होती है। अब यह धीवर भी शूली से उतर कर हस्तिस्कंध पर आरोहित होने का संतोष लेकर रंगभूमि से बिदा लेता है। तृतीय अङ्क में विटपान्तरित दुष्यन्त शकुन्तला की मदनावस्था को सुनता है (शाकु. 3/8 के बाद) तब बोलता है "श्रुतं श्रोतव्यम्।" फिर वही दुष्यन्त पञ्चमाङ्क में शकुन्तला को ताना मारता सुनायी पड़ता है कि" श्रोतव्यम् इदानीं संवृत्तम्।" (शाकु. 5/22 के ऊपर)। उसी तरह से प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में, दुष्यन्त भ्रमर के प्रतिस्पर्धी के रूप में "वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर हतास्त्वं खलु कृती" (शाकु. 1/20) कहता है। वही दुष्यन्त षष्ठाङ्क में, चित्रफलक में भ्रमरबाधा प्रसङ्ग का फिर से निरूपण करता है। तब भ्रमर को कहता है कि "एषा कुसुमनिषण्णा तृषतापि सती भवन्तमनुरक्ता। प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति। (शाकु. 6/19)" यहाँ वह भ्रमर को उपदेष्टा के रूप में दिखाया गया है। इस तरह से पूरे नाटक में, आदि से
- त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं न जहासि मे। दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः।। 3-29
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लेकर अन्त तक, एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की योजना से नाट्यकार्य प्रवर्तित किया गया है। इस प्रकार की नाट्य-शैली को आन्तरिक प्रमाण के रूप में आधार बना कर सोचा जाय तो तृतीयाङ्क का पाठ, जो देवनागरी पाठपरम्परा में लघु-आकार का है, और बंगाली पाठपरम्परा में बृहदाकार का है, इन दोनों में से कहाँ पर मौलिकता होगी, इस प्रश्न का समाधान मिल जाता है।
2-1 बृहदाकार की बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क का पाठ लेकर उसकी तुलना षष्ठाङ्क के पाठ की साथ करनी होगी। इससे इन दो अङ्कों में भी रूप-प्रतिरूप की एक लाक्षणिक योजना अन्तर्निहित है। षष्ठांक में, दुष्यन्त ने चित्रफलक में दो सहेलियों के साथ में रही शकुन्तला का चित्र बना लिया है। तब विदूषक पूछता है कि-भोः, अपरं किमत्र लिखितव्यम्। (अब इसमें और क्या चित्रित करना है?) इसके जवाब में दुष्यन्त ने प्रेमाविष्ट होकर एक श्लोक प्रस्तुत किया है जो शाकुन्तल की सभी वाचनाओं में सुरक्षित रहा है:
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निमातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
6/17
अब सोचना यह है कि धीवरप्रसङ्ग के बाद, दुष्यन्त को जब शकुन्तला का स्मरण पूर्ण रूप से हो गया है तब विरहातुर बना दुष्यन्त पूर्वानुभूत (प्रथम एवम् तृतीय अङ्क के) कौन कौन से प्रसङ्गों को चुन चुन कर चित्राङ्कित करना चाहता है (राघवभट्ट, 2006)¹¹। तो उपर्युक्त श्लोक में जो जो कहा गया है उसका ध्यान से परीक्षण करने की आवश्यकता है:
- दुष्यन्त कण्वाश्रम के पास बहती हुई मालिनी नदी को याद कर रहा है। जिसकी सिकता में बैठे हुए हंस-मिथुन को वह चित्रित करना चाहता है।
- मालिनी की पार्श्वभूमि में स्थित पार्वती के पिता अर्थात् हिमालय को वह चित्रित करना चाहता है जिसकी निश्रा में चामरों / हरिणों के यूथ बैठे हो।
- वहाँ एक वृक्ष की शाखाओं पर ऋषिमूनिओं के अथवा शकुन्तला के वल्कल सुखाने के लिये टाँगे गये हों और उस वृक्ष की छाया में, नीचे दो मृग (जिसमें एक मृग हो
- कार्येति। अनेन पद्येनाश्रमस्थं पूर्वानुभूतं तदानींतनम् उद्दीपनं विभावगणं स्मरति। -अभिज्ञानशाकुन्तलम् (राघवभट्टस्य टीकया सहितम्), सं. नारायण राम आचार्य, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, 2006 (पृ. 212)