भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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आमुख

संस्कृत साहित्य में ही नहीं विश्व साहित्य में भी अभिज्ञानशकुन्तलम् का स्थान अद्वितीय है। कालिदास का यह अद्भुत नाटक साहित्याकाश का वह जाज्वल्यमान प्रदीप है जिसने समालोचकों, साहित्यप्रेमियों एवं सामान्य पाठकों को भी रसाप्यायित किया है। लेकिन जिस प्रकार इसके रचयिता कालिदास के विषय में ऐतिहासिक प्रमाणों के भाव में मतमतान्तर प्रचलित हैं उसी प्रकार अभिज्ञानशकुन्तलम् को लेकर भी पाठों के विषय में अनेक भेद उपलब्ध होते हैं। सबसे पहले तो नाटक का नाम ही अभिज्ञानशकुन्तलम् एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम् दोनों रूपों में उपलब्ध होता है। पुनः नाटक के आकार, विस्तार तथा उसमें उपलब्ध श्लोकों की संख्या को लेकर भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। इस नाट्यकृति की दो पाठ परम्पराएँ उपलब्ध होती हैं (1) लघुपाठ एवं (2) वृहत् पाठ। लघुपाठ परम्परा में, देवनागरी में लिखित एवं भारत के दाक्षिणात्य प्रान्तों में उपलब्ध पाठ प्रकाशित हो चुके हैं। वृहत् पाठ परम्परा में बंगाली, मैथिली, काश्मीरी एवं उत्कल प्रान्त में उपलब्ध पाठ-भेद विद्वानों के समक्ष मूल पाठ के निर्धारण में समस्याएँ उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं इन पाठ-भेदों पर उपलब्ध टीकाओं की भी लम्बी सूची है। यह विपुल साहित्य कालिदास के मूल पाठ तक पहुँचने में अनेक रूपों में सहायक होता है तो उसके साथ ही अनेक समस्याएँ भी उत्पन्न करता है। यह खेद एवं चिन्ता का विषय है कि अद्यावधि शाकुन्तल की वैसी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं हो सकी है जिसे कालिदास की मूलकृति के सर्वाधिक निकट माना जा सके। यह अनुपलब्धि जहाँ एक ओर सम्पादन का कार्य कठिन बना देता है वहीं दूसरी ओर इस बात का साक्षात् प्रमाण है कि काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एवं बंगाल से लेकर गुजरात तक इस नाटक को कितनी लोकप्रियता प्राप्त हुई थी। डॉ० रिचर्ड पिशेल ने सबसे पहले बंगाल में उपलब्ध पाठ के आधार पर समीक्षित पाठ का प्रकाशन किया था, उसके बाद से अनेक विद्वानों ने विभिन्न पाठों एवं टीकाओं की तुलना कर के मूल पाठ तक पहुँचने का प्रयत्न किया है।

कालिदास की कृतियों का कोई भी मूल पाठ उपलब्ध नहीं होने के कारण समालोचकों के लिए मूल पाठ के निर्धारण में टीकाएँ सहायक सामग्री सिद्ध होती हैं। केवल मूल ग्रन्थ के पाठों के आधार पर किया गया सम्पादन अनेक बार सर्वथा निर्दुष्ट पाठ का निर्धारण नहीं कर पाता क्योंकि मूल ग्रन्थ का पाठ-भेद लिपिकारों और नाटक के सन्दर्भ में मंचीय