भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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आवश्यकताओं के लिए निर्देशकों की दृष्टि और सुविधा से नियन्त्रित होता है। टीकाकार, रचना के साहित्यिक सन्दर्भों का, उसके गुण-दोषों का एवं पाठ की स्वीकार्यता का तार्किक विश्लेषण कर टीका में अपना मन्तव्य रखता है; इसीलिए शाकुन्तल जैसी प्रचलित एवं लोक प्रसिद्ध कृति के पाठ निर्धारण में टीकाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

शाकुन्तल की शंकरकृत रसचन्द्रिका एवं नरहरिकृत अभिज्ञानशकुन्तल टिप्पणी मिथिला विद्यापीठ में सन् 1957 में प्रकाशित हो चुकी है। उत्कलीय पाठ पर श्री नवकिशोरकर शास्त्री ने आधुनिक काल में एक टीका लिखी है। देवनागरी पाठ पर राघव भट्ट की टीका का नाम अर्थद्योतनिका है। शाकुन्तल की सर्वाधिक टीकाएँ दाक्षिणात्य पाठ पर उपलब्ध होती हैं। इनमें से 'चर्चा' टीका के लेखक का नाम अज्ञात है लेकिन अन्य टीकाओं में काटयवेम की कुमारगिरिराजीया एवं अभिराम की दिङ्मात्रदर्शना उल्लेखनीय हैं। शाकुन्तलव्याख्या श्रीनिवासाचार्य की कृति है। घनश्याम ने संजीवन टिप्पण की रचना की है एवं नारायण पण्डित की टीका का नाम प्राकृतविवृति है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में शाकुन्तल अत्यधिक लोकप्रिय था और लम्बे समय तक समालोचना का विषय बना रहा।

चन्द्रशेखर नामक टीकाकार ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका नामक टीका लिखी है। इसी लेखक की शिशुपालवध पर सन्दर्भ चिन्तनम् टीका उपलब्ध होती है। विभिन्न अंतः साक्ष्यों के आधार पर प्रो० वसन्त भट्ट ने लेखक का समय ईसवी सन् 1600-1650 के बीच अनुमान किया है। 17वीं शताब्दी की यह टीका तत्काल उपलब्ध पूर्व के टीकाकारों की टीकाओं से निश्चय ही समृद्ध हुई होगी।

प्रो० वसन्त भट्ट ने पूर्व में अप्रकाशित टीका के सम्पादन में दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया है। जिनमें से एक को वे मूल एवं दूसरी को इसकी अनुकृति मानते हैं। सिर्फ टीका का सम्पादन करना इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि वह टीका किस पाठ पर आधारित है अतः प्रो० भट्ट ने रिचर्ड पिशेल द्वारा सम्पादित पाठ को मूल आधार बनाया है।

प्रो० भट्ट ने अत्यधिक श्रम एवं निष्ठा से पूर्वापर का सम्यक् विनियोग करते हुए यह श्रम साध्य सम्पादन किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण आगे भी विद्वानों को अभिज्ञानशकुन्तल के कालिदासीय मूल पाठ तक पहुँचने में सहायता करेंगे, ऐसा विश्वास है। साहित्य के इस प्रामाणिक ग्रन्थ-सम्पादन के लिए मिशन प्रो० वसन्त भट्ट का आभारी है। न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन ने इसके सुरुचिपूर्ण प्रकाशन में जो अभिनिवेश किया है उसके लिए मिशन की ओर से साधुवाद। विद्वज्जन की प्रतिक्रियाएँ मिशन के प्रकाशनों को सार्थकता एवं गति प्रदान करेंगी।

प्रथम आषाढ 1935
22 जून, 2013
नयी दिल्ली

दीप्ति त्रिपाठी