अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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स्तर पर बृहत्पाठ में से संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होकर देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का लघुपाठ सम्भूत हुआ है।। यदि इन दोनों पाठ-परम्पराओं की उच्चतर समीक्षा करके मौलिकता कहाँ पर संनिहित है यह निर्णीत नहीं किया जायेगा और दोनों पाठ-परम्पराओं के पक्षधर परस्पर विमुख या उदासीन ही रहेंगे तो अभिज्ञानशाकुन्तल के सही पाठ से और सही सौन्दर्य से हम अभी भी वञ्चित रहेंगे। आशा है कि प्रस्तुत प्रयास से इस दिशा में नया अरुणोदय होगा। इस कार्य में मेरे अनेक प्रिय छात्रों ने निरन्तर परिश्रम किया है। पाण्डुलिपियों का देवनागरी में लिप्यन्तरण करने में श्रीमती भारती पटेल, श्री धमेन्द्र भट्ट साधुवाद के पात्र हैं। श्री सञ्जय दमयन्ती एवं श्रीमती शिप्रा दत्त के प्रति भी सहायता के लिए आभार।
राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की विदुषी निदेशिका प्रो० दीप्ति त्रिपाठी का सादर आभार जिन्होंने प्रकाशिका सिरीज़ में इस ग्रन्थ के प्रकाशन का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया, उसे तुरंत कार्यान्वित भी किया।
सहधर्मचारिणी श्रीमती वृन्दा भट्ट तथा सुपुत्री डॉ० कृष्णा एवं चि० विश्वेश मेरे कार्य में प्रेरणा स्रोत रहे हैं। उन्हें आभार व्यक्त कर उनके महत्त्व को कम नहीं करूँगा। इस कार्य की पूर्ति में विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान करने के लिए निम्नांकित विद्वानों का नाम स्मरण समीचीन होगा। सबसे पहले चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस टीका की दो पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध करवाने के लिए इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के प्रति मैं औपचारिकता निभाते हुए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ जिनके अभाव में यह सम्पादन सम्भव ही नहीं था। एक तीसरी प्रति के रूप में, डॉ० दिलीप कुमार काञ्जीलाल ने जो इस टीका की प्रति अपने हाथों से लंदन में लिखी थी, वह मुझे प्रदान की थी, उसके लिए भी मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ और प्रणाम निवेदित करता हूँ। इस कार्य के प्रति शुभाशंसा प्रदान करने के लिए मैं पूज्यश्री डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी जी, डॉ० राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ० जितेन्द्र शाह, डॉ० बालकृष्ण शर्मा, डॉ० प्रभुनाथ द्विवेदी को सादर प्रणामाञ्जलि निवेदन करता हूँ।
14 जनवरी, 2013
मकरसंक्रान्ति
वसन्तकुमार म० भट्ट
अहमदाबाद