अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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से किया है। जिससे इस विवादग्रस्त प्रश्न में पुनरपि नवजागृति लायी गयी है। भूतकाल में कतिपय ऐसे भी विद्वान् आये हैं, जैसे कि - प्रो० श्री बलवन्तराय क. ठाकोर (गुजरात, 1922), जिन्होंने किसी एक वाचना के पाठ का आग्रह नहीं जताया था। किन्तु सभी वाचनाओं के पाठान्तरों का आलोडन करके, इकलेक्टीक प्रिन्सिपल्स का आश्रयण करते हुए, जहाँ से भी अधिक नाट्यक्षमता वाला पाठ मिले उसका चयन करके शाकुन्तल का पाठ पुनर्गठित करने का कहा था। (यह अभिगम ऑल इन्डिया ओरिएन्टल कॉन्फरेन्स के प्रथम अधिवेशन, पूणे, 1912 में “द टेक्स्ट ऑफ शकुन्तला” शीर्षकवाले शोध-आलेख से व्यक्त किया गया था।) तत्पश्चात् श्रद्धेय प्रो० एस. के. बेलवलकर जी (पूणे, 1923)ने अभिज्ञानशाकुन्तल के विभिन्न दृश्यों की उच्चतर समीक्षा करके, काश्मीरी पाठ की ओर अपना पक्षपात घोषित किया था। संक्षेप में कहें तो, विगत शताब्दी में केवल चार-पाँच विद्वानों ने ही इस नाटक की पाठालोचना की है। और अभी भी अभिज्ञानशाकुन्तल की सर्वसम्मत हो सके ऐसी समीक्षितावृत्ति बनाने का कार्य अवशिष्ट है। क्योंकि 1. काश्मीरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का सही समीक्षित पाठसम्पादन अभी तक अवशिष्ट है, तथा 2. बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जैसे महत्त्वपूर्ण टीकाकार की टीका अद्यावधि अप्रकाशित रही थी। किसी भी कृति का समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने में प्राचीन टीकाएँ सहायक-सामग्री की भूमिका निभाती हैं। अतः उसका प्रकाशन परम उपकारक सिद्ध होगा।
अभिज्ञानशकुन्तल की उपलब्ध पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही सब से प्राचीन है ऐसा डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने सिद्ध किया है। लेकिन बंगाली वाचना का पाठ ही सर्वांश में मौलिक भी होगा यह मानना मुश्किल है। अतः चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस सन्दर्भदीपिका टीका का समीक्षित पाठसम्पादन करने के साथ साथ, बंगाली पाठ की उच्चतर समीक्षा करना भी अनिवार्य है ऐसा सोचा गया है। इस तरह की समीक्षा के लिए मौलिकता का दावा करनेवाली देवनागरी एवं बंगाली वाचनाओं का तुलनात्मक परीक्षण अधिक फलदायी होगा इस विचार से प्रेरित होकर यहाँ बंगाली एवं देवनागरी पाठ में प्रक्षेप एवं संक्षेप का तुलनात्मक विवरण भी प्रस्तुत किया गया है। बंगाली पाठ मौलिकता के नजदीक होते हुए भी उसमें कुछ ऐसे अंश दिखते हैं कि जो कृतिनिष्ठ आन्तरिक प्रमाणों से प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। देवनागरी के पाठ में अनेक स्थानों पर कटौती करके पाठ को संक्षिप्त किया गया है यहाँ उस पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। इस चर्चा के दौरान, इस नाटक के पाठ का संचरण-इतिहास भी ध्यान में आया है। चतुर्थाङ्क के आरम्भिक चार श्लोकों के पाठभेद से ऐसा इङ्गित मिला है कि शाकुन्तल की विद्यमान पाण्डुलिपियों में शारदालिपि के पाठ से आरम्भ करके पहले मैथिली वाचना में पाठसंक्रमण हुआ है। तदनन्तर मैथिली से बंगाली वाचना का बृहत्पाठ आकारित हुआ होगा और चतुर्थ